Wednesday, June 12, 2024
69 से 60
69
जल रहा यहाँ सब उम्मीद करें भी तो कैसे करें
नहीं पहली सी फिजां यकीं करें भी तो कैसे करें
अनुशासन क़ि सीख हमें खुद सभी कानून तोड़ो
ऐसा इंसाफ वहां तस्लीम करें भी तो कैसे करें
खानाबदोश बनाओ हमको हमीं से गिला करो
प्यार क़ि जगह कहाँ दुश्मनी करें भी तो कैसे करें
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68
दूसरे देशों के प्रजातंत्रों की तरह
यदि भारत देश में भी यह छूट
दे दी जाये की तुमाहरे बच्चों की
देखभाल का खर्च सरकार करेगी
तो अस्सी प्रतिशत शादियाँ यहाँ
ये टूटकर बिखर जाएँगी अपने आप
मानवीय सम्बन्ध बचे ही कहाँ हैं
बच्चे बस एक मजबूरी बन कर
खड़े हुए हैं एक पुल की तरह
वर्ना कोई सम्बन्ध नहीं बचा है --
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67
कितने संवेदनहीन हो गये हैं ---
चोट लगकर तड़पता रहे सड़क पर
हम पास से गुजर जाते हैं
हम हत्यारे ही गये हैं ---
अपनी ही संतान को , लड़की को पेट में ही
मारने की आदत हो गयी है हमें
हम सब से बड़े टैक्स चोर हो गये हैं ---
चार करोड़ का समान बेचकर
पचास लाख की राशि की सेल का
इनकम टैक्स भरते हैं हम
हम कामचोर हो गये हैं ---
सरकारी नौकरी को पैसन समझते हैं
और साइड बिजनैस में तन माँ धन से जुटे हैं
भ्रष्टाचार की सभी सीमायें लाँघ दी हैं
जयादा देर तक ऐसा नहीं चल पायेगा
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66
आदमी की चाहत क्या है
क्या चाहता है वह ?
जान देकर भी नहीं मानता
जिस बात के लिए कभी
एक समय में उसी बात को
हंस कर खुसी खुसी मान
जाता है वह क्यूं ?
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65
मुझे पढाया बताया मेहनत और ईमानदारी
ऊंचे मानवीय गुण हैंये हम कहलाते संस्कारी
ठीक उल्टा देख रहा हूँ आजके अपने समाज में
बेईमानी और घोटाले छाये बड़े नए अंदाज में
छः एकड़ जमीं बिकी रूपये तीन करौड़ मिले
दो भाई दो बहन बांट पर रिश्ते बुरी तरह हिले
भाईयों ने दी दोनों बहनों की पाँच लाख की सुपारी
भून डाली गोलियों से भूल गये सब दुनियादारी
बड़े को छोटे ने अपने रास्ते से चाहा हटवाना फिर
सोते हुए का काट कर फैंक दिया नाहर में सिर
तीन करौड़ का मालिक बना खिलाके पैसे बच गया
ईमानदारी का और मेहनत का नया इतिहास रच गया
अपराधीकरण और भ्रष्टाचार आज समाज में छाये
इमानदार चुप बैठे इनके सामने अपना सिर झुकाए
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64
अन्दर और बाहर को समझना जरूरी है
न समझने की भी कईयों की मजबूरी है
अन्दर का मतलब हमारा अपना शरीर
बाहर का मतलब वातावरण की शमशीर
बाहर अन्दर को प्रभावित करता बताते
अन्दर बाहर को प्रभावित करता जताते
अन्दर बाहर का आपसी क्या तालमेल
इसे समझने में हो ही जाता है घालमेल
अंदर बहुत छिपाता हमारी हकीकत को
फिर भी आ जाता बाहर कई मुशीबत को
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63
*दो बेरोजगार (पति -पत्नी)
बहुत आसान है मेरी जिंदगी की
सटीक समीक्षा करना।
बहुत आसान है मेरी जिंदगी की
सही तरफदारी करना।
बहुत आसान है मेरी जिंदगी के
प्रति मन से करुणा दिखाना ।
बहुत आसान है मेरी जिंदगी के प्रति
असल में आंसू बहाना ।
मगर बहुत मुश्किल है
मेरी जिंदगी जीना।
स्कूल से आगे बढ़कर
फिर कॉलेज में जाना होगा
इसके सपने बहुत बार देखे थे मैंने ।
कौन से कॉलेज में दाखिला हो
कई बार सोचा था मैंने यह भी।
एक साल पहले सोचना शुरू किया कि
पहले दिन का पहनावा
क्या होगा मेरा कालेज में ?
हेयर स्टाइल पर भी नजर डाली थी।
सोचा क्या साइकिल पर ही मुझे
कॉलेज जाना होगा हर रोज?
या फिर घरवाले सेकंड हैंड
स्कूटर का जुगाड़ कर देंगे।
घर की हालत जुगाड़बाजी
करने की भी कहां थी।
यह बात नहीं मेरे भेजे के
अंदर घुस रही थी।
इसी उधेड़बुन में पूरा का पूरा दिन
जुगाड़ बाजी के चक्कर में गुजर जाता।
आखिर एक दिन 5 लोग आए थे
हमारे घर में।
उनकी बहुत आवभगत हुई थी।
उन लोगों ने मेरे से भी पूछा- -
'बेटी कौन सी क्लास पास की है?'
दूसरा सवाल था उनका -'कितने नंबर आए'
मैंने धीमी से अपने नंबर बता दिए थे।
उनकी नजरें मुझे घूरती
सी महसूस हुई
जैसे बकरे को उसके
मारने से पहले कसाई
उसे अपनी नजरों में से
निकाल कर देखता है,
उसी तरह का माहौल सा लगा मुझे ।
और इसके बाद कसाई
बकरे को हलाल कर ही देता है।
मुझे क्या पता था कि मेरा भी
हलाल होने का वक्त आ गया है।
और एक महीने के बाद ही
मेरी शादी कर दी गई ।
एक और बेरोजगार के साथ ।
2 बेरोजगारों की दुनिया के सपने क्या
आप सोच सकते हो कि कैसे होंगे?
हमने भी सोचने की कोशिश की थी
खूब आगे का रास्ता देखने की।
पर मैं नहीं देख पाई क्योंकि
अंधेरे के सिवाय कुछ दिखाई
नहीं दे रहा था ।
उनकी 2 एकड़ से भी कम जमीन थी।
'भूखे घर की आ गई।'
'हम क्या करें?'
'यह दिन देखने के लिए क्या
छोरे को जन्म दिया था?'
दाएं बाएं से परिवार वालों से
यह सब सुनने को मिलता था।
तब पता लगा कि सपने
और हकीकत में कितना
फर्क होता है।
प्यार मोहब्बत बेहतर जिंदगी
सब अतीत की बातें थीं।
घर भी तंग से बस दो ही कमरे थे ।
साथ में भैंस व बछिया का भी
सहवास 24 घंटे का।
समझ सकता है कोई भी
के दो कमरों में छह सात
सदस्यों के परिवार का
कैसे गुजारा होता है?
कहां फुर्सत होती है एक दूसरे के लिए ।
चोरों की तरह मुलाकात होती हैं
अपने ही घर में।
बस जीवन तो घिसट रहा है हमारा।
एक दिन सोचा इस नरक से
कैसे छुटकारा मिले?
मगर उसे ताश खेलने से फुर्सत कहां।
घर खेत हाड़ तोड़ मेहनत और तान्ने ।
यही तो जिंदगी है हमारे जैसे
करोड़ों युवक और युवतियों की
भारत में।
कभी-कभी जीवन लीला को
खत्म करने का मन करता है ।
फिर ख्याल आता है कि इससे क्या होगा?
किससे होगा?
यही तो सवाल है सबसे बड़ा
कि सही रास्ता क्या है?
रणबीर
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62
ना इस जन्म में झूठ बोला
ना कभी दुकान पे कम तोला
फिर भी भगवान नाराज हुआ
हार्ट अटैक मुश्किल इलाज हुआ
मैंने पूछा मुझे क्यों कष्ट मिला
बताया पिछले का सिलसिला
इसका कब होगा मेरा हिस्साब
अगले में मिलेगा तुम्हें जवाब
पिछला ना कभी जान पाया
नहीं अगला समझ में आया
आज की बाबत नहीं बताते
अगले पिछले में हमें फँसाते
दम मारो दम मिट जाएँ गम
देवी देवता हमारे इनके हैं हम
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61
सहारे मत बना ए दिल सहारे रूठ जाते हैं
ना किस्मत पेभरोसा कर सितारे टूट जाते हैं
साहिल पर आके ना समझो कि पार आ गए
जरा सी लहर आयी तो किनारे छूट जाते हैं
राज दरबारों में न जाना वहां पे क्या रखा है
पेट की खातिर ही तो वे उनके झूठ गाते हैं
सच कहना अगर बगावत तो हम भी बागी
ज्यादा हवा भरने पर ये गुब्बारे फ़ूट जाते हैं
भगत सिंह के देश का फिर से देखा सपना
आखिरकार लूट के ये शिकारे डूब जाते हैं
अमीर गरीब की खाई बढ़ा विकास करेंगे वो
एक न एक दिन झूठे जनता के बूट खाते हैं।
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60
बेमौसम की बरसात हुई है कैसा कहर ढाया है
गेहूं हुआ खराब खेत में मण्डी ने गुल खिलाया है
मौसम हुआ ठंडा कहते मगर ठंडा हुआ किसान भी
ख़राब पकी पकाई खेती ढह गए सब अरमान भी
मन्दी की मार ने मारा आज बरसात ने हिलाया है
किसान कब तक सहे इसको मान किस्मत का खेल
किस्मत नहीं ये सरमायेदारी ने बनाई उसकी रेल
ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते ये मौसम में बदलाव आया है
क्लाइमेट चेंज के दोषी ज्यादा अमीर देश बताये हैं
फार्म हाउस गैसों के अम्बार उन्ही ने लगाए हैं
बेमौसम बादल हुए तो किसान पे संकट छाया है
किस्मत की बात नहीं सिस्टम का खेल समझ आया
सिस्टम असली दोषी छिपाये झूठ का प्रपंच फ़ैलाया
किसान समझ रहा खेल सड़कों पे आके बताया है
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