Wednesday, June 12, 2024
59 से 50
59
भारत देश है मेरा
जहां डाल डाल पर गरीब जनता का बसेरा
वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा
जहां झूठ और धर्म का पग पग पे अँधेरा
वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा
जहां की धरती पे लुटेरे जपें प्रभु की माला
तीजा बच्चा भूखा मारें जहां चौथी बाला
जहाँ नफरत ने डाला चारों तरफ है डेरा
वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा
जहाँ खड़े ऊंचे ऊंचे ये मंदिर और शिवाले
रोटी खातिर भटकें हैं या बच्चे भोले भाले
जहां जले है गुजरात गऊ नाम पे मरे कमेरा
वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा
बीच लुटेरों की नगरी गरीब दुःख झेल रहे
मन्दिर मस्जिद पे जहाँ खूनी खेल खेल रहे
जहां नफरत की बंशी बजाये है मुरारी मेरा
वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा
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58
बेजुबान पत्थर पे लदे हैं करोड़ों के गहने मंदिरों में
उसी दहलीज पे एक रूपये को तरसते नन्हे हाथों को देखा है
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57
मानव बोम्ब
वह छात्रा डेरा परमुख की हत्या के लिए
मानव बम्ब क्यों बनी ?
मुस्लिम थी इसलिए
अमृतधारी थी इसलिए
किसी के बहकावे में आ गयी
ये नौजवान युवक युवतियां यहाँ तक
क्यों चले आते हैं ?
क्या सोचा है कभी ?
कहाँ फुर्सत है हमें दो पल की
की सोचें जरा जब क्या होगा
जब हमारी अपनी बेटी
डेरा परमुख की हत्या कर देगी
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56
ज़माने में क्यों आये क्या सोचा है कभी
हम क्या हैं कर पाए क्या सोचा है कभी
पैदा हुए मगर खुद में ही महदूद रहे हम
पड़े हैं ये पेट फुलाये क्या सोचा है कभी---
बहोत बुरा जमाना आ गया बैठे कोस रहे
कौन इस को है घुमाये क्या सोचा है कभी---
भाड़ में जाये यह समाज हमारी बला से
क्यों काले बादल छाये क्या सोचा है कभी---
इन्सां और समाज का बहुत पुराना रिश्ता
इसको कौन बचाए क्या सोचा है कभी---
सोचने से ही परहेज तो दोष किसे देंगे
कोहलू के बैल बनाये क्या सोचा है कभी---
खाने के भंडार भरे हैं मगर लाखों भूखे मरते
ये किसने खेल रचाए क्या सोचा है कभी---
हर दरवाजे पर बीमार दवा का मोहताज
वो कैसे सेहत बचाए क्या सोचा है कभी---
अमीरों क़ि गफलत ने इस ज़मीन पर
ये कैसे नाच नचाये क्या सोचा है कभी---
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55
**धरती हमारी हुई है बाँझ**
धरती हमारी हुई है बाँझ
किसान तपस्वी हुआ कंगाल
बणी सणी ख़त्म हो गयी
तथाकथित नेता रहे दंगाल
गाँव गाँव में दारू बिकती
घर घर में औरत पिटती
बैठे ये लोग ताश खेलते
महिला पर मजाक ठेलते
ना किसी से कोई काम है
कहता किस्में जयादा दम है
बदमाशों ने लंगोट घुमाया
राजनेता से हाथ मिलाया
भ्रष्ट पुलिस अफसर मिला है
भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट साथ खड़ा है
चारों क़ि दोस्ती अब तय हैं
एक दूजे क़ि बोलेन जय हैं
लगा रहे हैं जोर पर जोर
चारों तरफ देखो बढ़ा शोर
बेरोजगारी का उठा भूचाल
किसान होते जा रहे बदहाल
ऊपर से नेताजी भी पुकारे
उस पठे को मज्जा चखारे
आगे बढ़के गलघोट लगादे
कहाँ पे पड़ेगी चोट बतादे
आज उसे कल उसे पटकदे
सामने बोले जो उसे झटकदे
याद छटी का दूध दिलाना
मत इसे हमारा नाम बताना
बता रहे दाँव पर दाँव देखो
नेताओं में है कांव कांव देखो
कुरीतियों पर चुप रहे कमान
आनर किलिंग समाज में श्यान
मारना और फिर मरना होगा
नाम गाँव का तो करना होगा
जनता तक रही है सांसें थाम
बताओ यूं चलेगा ये कैसे काम
हम बिना शादी के घूम रहे हैं
वे गोतों के नशे में झूम रहे हैं
वाह निकले हैं नहले पर दहले
कौन बोलेगा वहां सबसे पहले
खूब हुई देखो वहां धक्का पेल
पंचायत ने वहां दिखाया था खेल
अहम् सबका माइक पे टकराया
फैसला खास वहां हो नहीं पाया
पाँच घंटे तक मार पर मार हुई
झड़प आपस में बारम्बार हुई
ना दहेज़ पर बोला कोई वहां
दारू पर बंद रही सबकी जुबाँ
महिला भ्रूण हत्या को भूल गए
बस गोत्र शादी में सब झूल गए
- 24, april , 2010
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54
DUSRI DUNIYA SAMBHAV HAI
फ़ूड के लिए जमीं हो या
फ्यूअल के लिए जमीं हो
सवाल अटपटा सा है यारो
समझ में नही आ रहा है
अपना पेट भरे इस जमीं से
या फिर भूखे मरे सवाल यही है
अपनी करों की टंकी भरने को
अपने पेट पर लात मारना
कहाँ तक सही है इसमें बताओ
समझने या दिशा भर्मित होने की
कोनसी बात है ?
विकास के नाम पर विनास हो
यह एक अहम् सवाल हो गया है
विकास के नाम पर विनास में
हमारा दिल भी कही खो गया है
तभी तो हम भी अपनी आल्टो के
पट्रोल की चिंता ज्यादा करते है
मगर गरीब के पेट की चिंता तो क्या
इसका तो जिकरा भी नहीं सुनते
टिकाऊ विकास हो समाज का
इस पर चर्चा चिंता कुछ तो हो
टिकाऊ विकास का मतलब क्या
यही ना की वातावरण फ्रेंडली
हो यह विकास !
जेंडर फ्रेंडली की भी है आस
असमानता का भी हो विनास
रेपलीकेबल भी हो विकास
सोच ले हमे विकास चाहिए
या फिर विनास ही चाहिए
दूसरी दुनिया संभव है यारो
एक बार उस तरफ अपनी
नजर तो उठाइए !
उस दुनिया में निठल्ला पण
नहीं चलेगा दोस्तों
टीना सिंड्रोम के बारे रोजाना
चर्चा करते हो
कहते हो देयर इस नो अल्टरनेटिव
मगर क्या कभी सुना है
देएर इस पुपलज अल्टरनेटिव
लेटिन अमेरिका ने हमको इस दौर में
दूसरी दुनिया का ट्रेलर दिखाया है
लोगो की पहलकदमी
नए समाजवाद का सपना
हकीकत बन पाया है !
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53
17 अप्रैल 2014
दो हजार बीस तक
गाँव कस्बों को ना देखिये
बड़े बड़े शहरों की फ़ैली गंदी
बस्तियों की तरफ ना देखिये
पाश इलाकों में बनी ऊंची
इमारतों को ही अब देखिये
उनमें रहने वाले लोगों को
देखिये तरक्की ही तरक्की
नजर आयेगी चारों तरफ
हमारा कार्पोरेट सैक्टर देखो
हमारा इन्डस टरी सैक्टर देखो
हमारा बिजनैस सैक्टर देखो
हमारा फ़ौरन एक्सचेंज देखो
कितने आधुनिक हो गये हम
दुनिया की तीजी महाशक्ति की
क्षमता हमारे अन्दर छिपी हुई
बड़ी ताकत के पास अटम बोम्ब
होना चाहिए वह है हमारे पास
चार छः लाख फ़ौज भी है देखो
थोड़ा पैसा और हो और थोड़े से
हथियार और हों तो बड़ी ताकत
अमेरिका की तरह हम फिर बन
ही जायेंगे दो हजार बीस तक तो
तब तक गरीबी बढ़ती है तो वह
बढ़ने से कौन रोक सकता है इसे
अशिक्षा और बेरोजगारी ये तो
देखो बढेंगी यह एक सचाई है
भूख और बीमारी भी दोनों ही
सुनो समझो बढेंगी ही लाजमी
विकास की कीमत तो चुकानी
पड़ती है ना हम सबको मिलके
अपनी अपनी क़िस्मत के मुताबिक
लेकिन इस तर्क में जनता कहाँ है ?
कीमत तो जनता ही देगी और फल
उनकी क़िस्मत में ही लिखे रहते
जो जनतंत्र का ढांचा खून पस्सीना
बहाकर के हमने खड़ा किया था वह
अब और नहीं बच पायेगा यारो
बड़ी ताकत की बलि चढ़ जायेगा
बड़ी ताकत बनने की बजाय हमें
असली जनतांत्रिक बनने का जतन
राज नीतिक और निजी जीवन में
हमें खुशहाल बना सकेगा यारो !!!!
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52
**नोट बंदी और आम जनता **
युद्ध के समय नहीं देखी ऐसी
आपातकाल में नहीं देखी ऐसी
अबकी नोट बंदी ज्यादा खतरनाक
मगर बगावत का माहौल नहीं था
लोग दिन रात लाइनों में खड़े खड़े
दम तोड़ रहे थे
किसानों की खेती चौपट हो गई
और मजदूर खाली हाथ घूम रहे
दुकानदार भी झेल रहे मार इसकी
हुए थे शिकार मंदी के किरयाने वाले
कर्मचारी भी झेल रहे थे इसकी मार
शादियां पोस्टपोन हो रही थी या फिर
करकरा के बस फेरे पूरे किये गए थे
विपक्ष पक्ष को कोस रहा था देखो
तुगलक का अवतार बताया किसी ने
संसद नहीं चल पा रही थी इसके चलते
नितीश कुमार और अखिलेश की भाषा
अपने ही ढंग की लगती थी
उनको लगता था यह सब देश हित में
किया गया काम है सरकार का
ऐसा जनता लाइन में खड़ी सोच रही
थी शायद!
काला धन खत्म करने का
कारगर रास्ता बताया था
आतंक वाद खत्म करने का सही
कदम उठाया था
भ्रष्टाचार खत्म करने का रास्ता
यही दिखाया था
कहा वास्तव में अमीरों पर पहली बार
नकेल कसी जायेगी पहली बार यहाँ
इस नोट बंदी ने काले को सफेद
करने की कला हमको सिखलायी थी
जन धन योजनाओं में पिचहत्तर हजार
करोड़ कोई पूछे कहाँ से आया यह धन?
चार माह की छूट थी काले को सफेद की
पैंसठ हजार करोड़ ही आये थे कहते
जन धन खतों में रोजाना अरबों
आ रहे थे
कोई पूछे क्या मजदूरों के पास
काला धन था?
दो हजार का नोट लाये ही क्यों ?
काले धन की रेल तेजी से दौड़ने लगी
मेरे देश भारत महान में
आखिर यह खेल क्यों और किसलिए
खेला गया था?
सोचना ही होगा बहन और भाईयो!
वो जो कहा वह बिलकुल भी न हुआ
तो हररोज कुछ न कुछ नया जुगाड़
भिड़ाती नजर आयी थी सरकार
हाथ पैर फूल गए थे
जनता लाइनों में खड़ी खड़ी देख रही
थी
किस दिन ये भूचाल बन जायेगा सरकार
भीतर ही भीतर बहुत घबराई हुई थी
बात पक्की है ये यारो दूसरे उन देशों से
भी शिक्षा नहीं ली थी कि जिस देश ने
नोट बंदी की वह बर्बाद ही हुआ कहते
इतिहास इसका गवाह बताया
सोचने की बात तो फिर भारत कैसे बचेगा?
मगर सोचना हमने बन्द कर दिया है
काला धन इस नगदी में तो एक प्रतिशत
ही बताया है बाकी का हिसाब क्या है?
बाकी तो सोने में, जमीन में, उद्योग में, डॉलर में स्विस बैंक में , भगौड़ों के पास, में बताया
इनमें से किसी पर हाथ डालकर तो
दिखाओ जो चिंता काले की सच में
मारो छापे उनके अड्डों पर
नहीं जो इस सब की पोल खोल
रहे हैं छापे उनपर डलवाये जा रहे हैं
आर्थिक संकट घटा नहीं बल्कि बढ़
रहा है
आने वाले दिन , आने वाला दौर और
मुश्किल नजर आ रहा है
जनता को गुमराह करने के तरीके भी
तेज कर दिए हैं
असली मुद्दे आर्थिक संकट के, बेरोजगारी के, महंगाई के, महंगी शिक्षा के, महंगे इलाज के , महिला उत्पीड़न के दलित उत्पीड़न के कावड़ यात्राओं में भुलाए जा रहे हैं ।
असमानताओं का संकट पूरी दुनिया में
बढ़ रहा है?
सोचो मेरे देश भारत महान के बारे
देर होती जा रही है ।
रणबीर
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51
गुर्दे का गुर्दा
किडनी लगवाने वाले विदेशी मूल के
किडनी देने वाले सभी देसी फूल थे
बीच में एजेंट हैं साथ में डॉक्टर उसूल के
जिसके गुर्दे फेल हो गए मरने को है
दूसरा जीवन देना हम सबका फर्ज है
गरीबी के चलते किडनियां फेल न हों
उनको भी बचाना मानवता के खाते दर्ज है
जिसे गुर्दा चाहिए था उसे गुर्दा दिलवाया
भूख के कारण दोनों गुर्दे मरने को थे
उनमें से एक गुर्दा तो बचा ही दिया
दानी गुर्दे से एक और मानव बच पाया
काफी लोगों को रोजगार मुहैया करवाया
एजेंटों का जाल बिछा कर चुपचाप पुण्य किया
गुर्दा लेने और देने का कानून सख्त इतना
इससे बचने का प्रयास करना पड़ता कितना
जरा सोचो तो सही दिमाग पर जोर देकर
विदेशी को अपने ही देश में अपने लिए
महज एक गुर्दा भी क्यों नहीं मिला
भारत देश महान का गुर्दा उसे क्यों भाया
पैसे का खेल है यहां पर मेरे यारों
इसी कारण बदेशी देशी गुर्दा खरीद पाया
इसके लिए नेता अफसर पुलिस के
बिक गए बस कीमत की बात थी यारो।
**********
50
चलते चलते जिन्दगी में मिला एक राहगीर मुझको।।
मिल बैठे कुछ बात हुई मन भाई तासीर मुझको।।
कुछ तो था पर क्या था उसमें अब तक सोच रही
दिमाग लगा कर देखा साफ नहीं तसवीर मुझको।।
उसका हंसना ही था शायद जिसने मुझको बांध लिया
याद आती उसके चेहरे की एक एक लकीर मुझको।।
भले कुछ रोज मिले हम अपने दिलों में झांक सके थे
दरिया दिल इन्सान मिला लगा बहुत गम्भीर मुझको।।
कुछ दूर साथ चले थे जुल्म सितम साथ झेले हमने
सम्ीाल के चलना यारो बता गया ये रणबीर मुझको।।
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