Wednesday, June 12, 2024
100 से 109
109
सोच सोच कर
सोच सोच कर घबरा जाता हूँ मैं
सोच सोच कर
सोच सोच कर घबरा जाता हूँ मैं
अपने आप को अकेला पाता हूँ मैं
एक नयी दुनिया का सपना मेरा है
यहाँ क्या मेरा है और क्या तेरा है
इंसानियत पैदा की है समाज ने
हैवानियत पैदा की है दगा बाज ने
हैवानियत ख़त्म हो है यही सपना
इंसानियत बढे यही लक्ष्य अपना
मनकी शान्ति की खोज में धर्मात्मा
खोजते खोजते खोज लिया परमात्मा
अपनी शान्ति पाई हमारी लूट पर
हमारी शांति भगवन की छूट पर
भगवान भी इंसान की खोज कहते
हम तो भुगतें वो करते मौज रहते
जिस दिन ये चालबाजी भगवान की
समझ आयेगी तो मुक्ति इन्सान की
सोचता हूँ जितना उतना ही भगवान
नजर आता है मुझको तो बस शैतान
मेरे लिए तो मेहन त इमानदारी
उनको लूट की दी उसने थानेदारी
सबसे पहले होगी बगावत मेरी
सामने लायेगी उसकी हेरा फेरी
जग नहीं है सोता उसकी हाँ के बिना
घोटाला कैसे होता उसकी हाँ के बिना
मंदिरों में हजारों टन सोना जमा है
यहाँ भूख से मौतों का लगा मजमा है
लोगो ने चढ़ावा चढ़ाया है मंदिरों में
चढ़ावे तेन मौज उड़ाया है मंदिरों में
महिला को दासी बनाया है मंदिरों में
गरीबों को गया भरमाया है मंदिरों में
मन की शांति नहीं मिली है मंदिरों में
इंसानियत आज हिली है मन्दिरों में
बुद्ध ने नया रास्ता खोजा मन शांति का
भगवान को नाकारा दर तोडा भ्रान्ति का
मार्क्स ने धर्म को अफीम बताया था
गरीब किया आदि हमें समझाया था
पूंजी का खेल सारा है पूंजीवाद में
इसका जवाब तो है समाजवाद में
सोचता समाजवाद कैसा हो आज का
क्या रिश्ता होगा चिड़िया और बाज का
कई सवाल हैं जिनके ढूँढने जवाब
महात्मा ने नहीं हमें ढूँढने जनाब
रंग भरने हैं समाजवादी समाज में
सब की हिस्सेदारी के सही अंदाज में
"रणबीर "
**********
108
dost ki yaad mein
मैं पढ़ा अपने गांव थाने के स्कूल में
तख्ती पर लिखते खेलते वहीं धूल में
दसवीं पास की मैने अच्छे नम्बर पाये
आगे कहां क्या करें पढ़ाई पर हुई चर्चा
सभी के दिल में था कितना होगा खर्चा
हिन्दू कालेज सोनीपत बाहरवीं पास की
मिलेगा मेडीकल में प्रवेष मैंने आस की
दाखिला मिल गया घर में थी खुषी छाई
रोहतक पहुंचा कुछ माहौल बदला भाई
तरह तरह के सवाल रैगिंग हुई मेरी थी
सीनियर का डर बैठा देखी मेरा तेरी थी
चीर फाड़ की षरीर की ज्ञान बढ़ाया था
फिजियोलॉजी रटी तब पास हो पाया था
पैथो और फारमा दोनों मुझे भा गये थे
इम्तिहान में ये नम्बर अच्छे आ गये थे
एसपी एम फोरैंसिक बांए हाथ का खेल
इनकी पढ़ाई पाई छुक छुक करती रेल
फाइनल मुष्किल होगा यही तो बताया
मरीज देखने में पूरा समय मैने लगाया
पास हुआ ठीक नम्बर चिनता थी छाई
नौकरी या करुं मैं आगे की और पढ़ाई
आखिर आगे पढ़ने का मन मैंने बनाया
सर्जरी में फिर जैसे तैसे दाखिला पाया
रुरल और अरबन का एक नजारा था
दलित और स्वर्ण का देखा बंटवारा था
फेल पास का संकट खुला सामने पाया
सेवन्टी ऐट में यह सबके सामने आया
जाट और नोन जाट का घमासान हुआ
लड़ाई उपर की नीचे का नुकसान हुआ
इसी बीच अनुपमा मेरे जीवन में आई
धीरे धीरे दोस्ती रिस्ते का रुप ले पाई
सवाल यही था अब आगे किधर जाउं
सरकारी नौकरी या नर्सिंग होम बनाउं
खरखोदा में किराए पर काम षुरु किया
तन मन धन सब कुछ मैने झोंक दिया
प्रैक्टिस अच्छी चली पैसा खूब कमाया
कुछ साल में अपना नर्सिंग होम बनाया
नन्ही बच्ची षादी के दो साल बाद आई
फिर तीन साल बाद थी थाली गई बजाई
दो साल बाद छोटा बेटा दुनिया में आया
सब तो ठीक ठ्याक था कस्बा मुझे भाया
तभी अनुपमा चली गई हमको छोड़ करके
बीमार हुई चल बसी मुह वह मोड़ करके
बस जिन्दगी में खालीपन छाता चला गया
बच्चों पर ध्यान पूरा लगाता चला गया
कई बार मेहर सिंह समिति वाले आये
अपने विचार मुझसे सांझा थे कर पाये
तभी दारु ने जिन्दगी में दखल बढ़ाया
ज्यादा न पिया करो बच्चों ने समझाया
धीमे से मिकदार बढ़ी फिर आदत बनी
लगा ऐसा मानो षराब मेरी ताकत बनी
ताकत नहीं कमजोरी बाद में समझ पाया
फिर इस दारु ने था अपना रंग खिलाया
नर्सिंग होम फिर दारुमय हो गया मेरा
कर्मचारी भी पीते मरीज खो गया मेरा
बहुत जगह इलाज किया न छुटी भाई
जो षोहरत कमाई सारी तो लुटी भाई
दुख और अफसोस कि कहां आ पहुंचा
कभी सोचा न ये मुकाम वहां जा पहुंचा
अस्पताल में दाखिल मैं जीना चाहता हूं
वहां पर भी मंगवा कर पीना चाहता हूं
कैसी विडम्बना मेरी दिल दिमाग पछताते
आदत बलवान हुई पीछा नहीं छुड़ा पाते
बेटी बेटे बहुत दुखी नहीं है पार बसाती
देखी है बेटी बैठी सीट पे आंसूं बहाती
छोटा बेटा सातवीं तक मेरा पढ़ पाया है
क्या होगा इसका आगे मन भर आया है
एक बड़ा दुष्मन दारु हरियाणे में हो रही
कितने हैं परिवार जहां बोझा पत्नी
षायद अब ज्यादा दिन नहीं मैं चल पाउंगा
आदत जीती सतवीर हारा ये लिख जाउंगा
रणबीर सिंह दहिया......
********
107
अन्दर और बाहर
मैंने अपने अन्दर को ठीक करने का जतन किया
बाहर ने हर बार ही तो मेरे अन्दर का पतन किया
कहते हैं यदि हरेक इंसान अन्दर सुधार करले
पूरा भारत चमक उठेगा नई फिर हूंकार भरले
अन्दर के सुधार के बावजूद मेरा संकट जारी है
बाहर से कैसे निपटूं यारो जिसका दबाव भारी है
*******
106
छोटे शहर बदल रहे
रात के ढाई बज चुके हैं यारो पर
मेरा शहर अब भी जाग रहा है
मेरे युवा भारत की आँखों में नींद
नहीं है
कुछ नौजवान डी जे की धुन पर
थिरक रहे हैं और मस्ती में मस्त हैं
यह सीन किसी मैट्रो शहर का हो
मगर ऐसा नहीं है यह सीन तो अब
लखनऊ बनारस लुधियाना और
रायपुर इंदौर भोपाल गुडगाँव
जैसे शहरों में भी रात का शबाब
अपने पूरे यौवन पर होता है
नौजवान यहाँ के सो कर नहीं बिताते
रातें बिताते है जाग जाग कर यहाँ
कहते जिन्दगी बहुत हसीं हो जाती
माईन्ड रिफरेशमेंट हम सब की हो पाती
इन शहरों का भूगोल तो अब भी
वैसा ही है मेरे ख्याल में
मगर बदल गए युवाओं के मिजाज
दिल्ली मुंबई कोलकता जैसे शहरों
या फिर में यू के या यू एस ए में
कुछ साल के बाद
वापसी हुई है नौजवानों की तो
अपने साथ उन शहरों के लाये हैं
लाइफ़ स्टाइल और मस्ती के नुस्खे
सौगात में
जबर दस्त ललक है इस तरह से
जीने की उनके दिल में आज
इस बदले मिजाज को बाजार ने
बहुत अच्छी तरह पहचान लिया है
इसीलिये छोटे शहरों में भी इसके
शो रूम ,इटिंग पॉइंट्स उभर रहे हैं
और एक मॉल कल्चर विकसित
हो रही है
हमारे में से कुछ बुजुर्ग
युवाओं की इस आजाद ख्याली को
सभ्यता और संस्कृति की राह में
बड़ी रूकावट मान रहे हैं
वे इसको युवाओं की महत्वाकांक्षा और
भोग विलास का नाम दे रहे हैं
पर सामाजिक चिन्तक इस बदलाव का
स्वागत करते नजर आये
********
105
मेरा ना होना तुम बर्दास्त नहीं कर सकते
मेरी ताकत का अहसास है तुम्हें
इसीलिये बाँट दिया मुझे धर्म, जात ,
इलाके, भाषा के नाम पर
मुझे अपनी कमजोरी का जिस दिन
अहसास हो जायेगा उस दिन ये जमाना
बदल जायेगा \\
*******
104
नए और पुराने का हमेशा संघर्ष हुया बताया रै||
पुराने की नींव पर नया महल बनता आया रै ||
पुराने नै ढाह कै नै यो बता नया क्यूकर बनैगा
पुराने की कमी छाँट कै ईमारत नई फेर चिनैगा
रीत घनी पुरानी सै कई बै पुराना घबराया रै ||
जरूरी नहीं नया बी घणा बढ़िया हो सारे का सारा
मनसां बीच खाई बढ़ावै वो नया ना साथी म्हारा
जो सबका भला करै वोहे नया सही ठहराया रै ||
तर्क और विवेक ये परखन के औजार बताये
नियम कुदरत के जाने बिना नए नै दुःख ठाए
कुदरत की गेल्याँ तालमेल तै कमाल दिखाया रै ||
मेरे बीरा क्यों लड़ते हो इस नए और पुराने पै
सोच समझ बढ़ो आगै रणबीर सिंह के गाने पै
संघर्ष तै बनता नया दीखे पुराने की बी छाया रै ||
********
103
आज का दौर
अपने स्वभाव के हिस्साब से ही
साम्राज्यवादी आक्रामकता बढ़ी
उसने ठीक उन्ही भीमकाय से
वितीय खिलाडियों को जो इस
मंदी के संकट को पैदा करने के
सही सही जिम्मेदार हैं इनको
बड़ी रकमों के बेल आउट पैकेज
देने के माध्यम से संकट पे काबू
पाने की कशिश की है |
इसमें कोई शक नहीं है दोस्तों
इन कम्पनीयों को तो फिर से
जीवन हासिल करवा के मुनाफा
बटोरने का फिर मौका दे दिया
देशों की राज्य सरकारों पर कर्जों
का भारी बोझ लाद दिया गया है
कमाल की बात अबतो करदी यारो
नैगम कम्पनीयों के दीवालों को अब
संप्रभु शासनों के ही दीवालों में
तब्दील कर दिया गया है
जिसका असर योरोपीय संघ के
अनेक देशों पर पड़ा और
अमेरिका भी नहीं बच पाया
बचेंगे हम जैसे भी नहीं |
********
102
बात पते की
सुबह होती है फिर श्याम होती है
सुबह रोती है फिर श्याम रोती है
अपनी इज्जत आबर एक महिला
सुबह खोती है फिर श्याम खोती है
दलित जीवन में अमीरीदुख के बीज
सुबह बोती है फिर श्याम बोती है
दबंग और पैसे की दुनिया रंगीन
सुबह होती है फिर श्याम होती है
लगते हैं जो धब्बे काली रातों में
सुबह धोती है फिर श्याम धोती है
सफरिंग दुनिय शाइनिंग दुनिया को
सुबह ढ़ोती है फिर श्याम ढ़ोती है
********
101
असल में जो नंगे हो गये वो अपना नंगा पन छिपाने को
सबको नंगा कहते हैं ताकि हम झिझकें उंगली उठाने को
*********
100
मेहनत कर हमने ताज महल बनाया क्यों नहीं दिखाई देता
ताज महल के साथ सब कोई नाम शाहजहाँ का ही क्यूँ लेता
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment