Friday, June 14, 2024

176 से 188

189 कैसे जांचें कैसे जांचें कि कौन अच्छा है क्या सिस्टम खस्ता है ॥ सबकी अपनी अपनी ढपली विकास का वही रस्ता है ॥ जनता के बल पर ऊँचाई पाने वाले हरेक बादल को मौसम रूख बदले तो फिर पानी पानी होना पड़ता है ॥ जनता का विश्वास बार बार टूटता है यहाँ पर फिर से कमाल की बात है कि यह बार बार से देखो उठता है ॥ आंधी आती है बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं यहाँ पे यारो कई बार पत्ता भी हिलता है तो दिल कांपने लगता है ॥ मेरे अंदर एक मुखालिफ था जो मुझसे भी लड़ता था अब या तो वह चुप ही रहता है या हाँ में हाँ करता है ॥ जनता ने इतिहास रचे हैं वो ये जानते हैं बखूबी ये इसीलिए हमको वो बरगलाने का प्रपंच रचता है ॥ ********* 188 एक घटना को दिमाग ने झकझोर दिया गाँव के ही दो लूंगाडों ने मुझे अँधेरे में जब घेर लिया, अपनी हवस मिटाकर मेरे जीवन में तो अंधेर किया। किसको बताऊँ दुःख अपना कौन सुनेगा मेरी बात, दबंग घरों के दीपक वे तो भला मेरी क्या औकात । गाँव के किसी पंचायती ने नहीं सुनी मेरी अरदास, गुर्गे हैं दोनों ये लूँगाडे गाँव के पंचायतियों के ख़ास। कहते घूमें मिट्टी डालो गाँव की इज़्ज़त उछल रही, एक हाथ कहाँ ताली बजे लड़की भी फिसल रही। वहशी छा गए चारों तरफ बचे आज इंसान कहाँ, भोग की वस्तु मानी औरत अलग है पहचान कहाँ। ******** 187 चोर जार नशेबाज जुआरी चोर जार नशेबाज जुआरी बढ़ते जावैं समाज मैं ॥ इनकी लिखूं कहानी सुणो अपणे ही अंदाज मैं ॥ पहले बात करू चोर की हाथ सफाई दिखावैं ये घने चोर तो ताला तोड़ लें दुष्ट कमाँ कै नहीं खावैं ये घिटी मैं गूंठा देकै मारदें घर साफ़ कर ले ज्यावै ये राह चलती महिला की चेन दो मिनट मैं झपटावें ये चोर बी के करैं और कोए नौकरी ना इस राज मैं ॥ जार आदमी दुष्ट घना पर नारी पै नीत धरै सै रै कुकर्म करता हाँडै वो उसका पेट नहीं भरै सै रै पकड़या जा जब जूत लगैं जूतां तैं बस डरै सै रै नालियां मैं मुंह मारता एक दिन बेमौत मरै सै रै पहर धोले लत्ते यो घूमै दुनिया हवाई जहाज मैं ॥ नशे बाज का के कहना रोज नशा करना उसनै तर तर तर जुबान चलै किसे तैं ना डरना उसनै सुल्फा गान्झा भांग धतूरा पी डूब मरना उसनै अगल बगल मैं झाँकै फेर पाप घड़ा भरना उसनै नशा उतर ज्या तो कहै सुधरना चाहूँ कर इलाज मैं ॥ चोर जार नशेबाज जुआरी सब तैं मानस बताये औढ़न पहरण नहान खान तैं ये बालक तरसाये घाघरे टूम तक ना बक्शी चोरी कर नशे चढ़ाये गाम मैं आतंक फैलाया सरीफ मानस घबराये रणबीर समझाया चाहवै समाज सुधर की खाज मैं ********* 186 कार्बन से पैदा हुए और मर कर कार्बन बन जाना है । अंतहीन है यह कहानी जिसका कोई छोर नहीं है। ******** 185 एक लड़की ने साहस किया और आवाज उठाई बदतमीज गुरु जी ने अपनी बदनीयत दिखाई कुछ लडकीयों ने साहस किया और भीड़ गयी गुरु जी की सरेआम की सबने मिल कर पिटाई केस दर्ज होने जा रहा था उस गुरु के खिलाफ लड़की के बाप ने बीच में आकर के खेल रचाई पैसे लेकर केस बिगड़ दिया गुरु छुट गया साफ़ यह कहानी नही हकीकत है आप तक पहुंचाई कहाँ जा रहे हैं हम समझ नहीं पा रहा दोस्तों एक घटना नहीं है ऐसी घटनाओं की बाढ़ आयी ********** 184 बुड्ढाबुड्ढीकी कहानी एक बुड्ढाआया साथ में एक बुढिया लाया होटल में जाकर वेटर को बुलाया दोनों ने अपना अपना आर्डर मंगवाया पहले बुड्ढ़े ने खाया बुढिया ने बिल चुकाया फिर बुढिया ने खाया बुड्ढ़े ने बिल चुकाया ये देख वेटर का सिर चकरायावो उनके पास आया और बोला जब तुम दोनों में इतना प्यार है तो खाना एक साथ क्यूँ नहीं खाया? इस पर बुड्ढ़े ने फरमाया "जानी तेरा सवाल तो नेक है पर हमारे पास दांतों का सेट सिर्फ एक है !!!! ******** 183 पुराना दौर तेरी कलम तो चली यही बहुत है मेरे लिए तकरार अभी तो टली यही बहुत है मेरे लिए तेरे अंदर का गुस्सा बरकरार है अभी भी मेरी एक ना चली यही बहुत है मेरे लिए मुझे मालूम है तेरा इंसां मर नहीं सकता बात है कितनी भली यही बहुत है मेरे लिए दो पल का साथ नहीं ये मालूम हम तुमको सुबह हुई सांझ ढली यही बहुत है मेरे लिए मेरी चाहत मेरी इबादत है यही चाहत तुमको फिर भी तुमको खली यही बहुत है मेरे लिए कमी लाख सही आखिर इंसां हैं खुदा तो नहीं मुरझाये ना खिलती कली यही बहुत है मेरे लिए हमें मुआफ़ करो या न करो अखितयार तुम्हारे है तुम्हारी आँखों में नमी यही बहुत है मेरे लिए कुछ तो है जो बांधे है हमको आज तलक भी आबाद रहे तेरी गली यही बहुत है मेरे लिए पत्थर दिल माँ से बना ये है मालूम मुझको पिंघली मोम की डली यही बहुत है मेरे लिए 29-08-1992 ******* 182 सहारे मत बना ए दिल सहारे रूठ जाते हैं ना किस्मत पेभरोसा कर सितारे टूट जाते हैं साहिल पर आके ना समझो कि पार आ गए जरा सी लहर आयी तो किनारे छूट जाते हैं राज दरबारों में न जाना वहां पे क्या रखा है पेट की खातिर ही तो वे उनके झूठ गाते हैं सच कहना अगर बगावत तो हम भी बागी ज्यादा हवा भरने पर ये गुब्बारे फ़ूट जाते हैं भगत सिंह के देश का फिर से देखा सपना आखिरकार लूट के ये शिकारे डूब जाते हैं अमीर गरीब की खाई बढ़ा विकास करेंगे वो एक न एक दिन झूठे जनता के बूट खाते हैं। ******** 181 बेचैनी जनता की बढ़ती जा रही समझौता संघर्ष करती आ रही डायलैक्टिस इसी को कहते हैं आज बेचैनी दुनिया पर छा रही डेमोक्रेसी ने आगे कदम बढाया है जनता ने कुछ अधिकार पाया है कितना ही भ्रष्टाचार बढ़ गया हो इसके खिलाफ विरोध जताया है उठती बैठती जीवण बिता रही है कई बार घन घोर अँधेरा हटाया है लूट के हथियार बदल लिए जाते हैं जनता ने एकता हथियार बनाया है ******** 180 डेमोक्रेसी ने आगे कदम बढाया है जनता ने कुछ अधिकार पाया है कितना ही भ्रष्टाचार बढ़ गया हो इसके खिलाफ विरोध जताया है उठती बैठती जेवण बिता रही है कई बार घन घोर अँधेरा हटाया है लूट के हथियार बादल लिए जाते जनता ने एकता हथियार बनाया है ********* 179 मंदी के दौर में भी एक नया दौर लायेंगे आतंक का अंधेरा ये मिलकर के मिटायेंगे नंगेपन के नाम पर नंगापन छाता जा रहा है इंसानियत बाजार में हरेक खोता जा रहा है परचम इंसानियत का हम फिर फैरायेंगे भीमकाय बाजार फिर संरक्षण मांग रहा है छिपा अपनी कमजोरी यह झूठ छांग रहा है जनता करे कंट्रोल बाजार ऐसा संसार रचायेंगे हाशिए पर फेंके गए जो उनका जमाना आएगा अपना हक पाने खातिर नागरिक समाज बनाएगा बड़े कदम नए साल में बस आगे बढ़ते जाएंगे नौजवानों का प्यार यहां फांसी चढ़ाया जाता है जात-पात गोतनात क्यों अपने रंग दिखाता है नए साल की आशा से निराशा से लड़ पायेंगे ******** 178 आर्थिक मंदी के दौर ने सताया हमको जेब ढीली करदी इसने रुलाया हमको बहुत सी जगह इसने करतब दिखाए आ ई टी के कई योधा इसने मार गिराए सरकारी कंट्रोल बता न था जिनको उसी से भीख मंगनी पड़ रही उनको पड़ सकता दिल पेय बुरा असर बताया चिकत्सकों ने हाल मे ऐसा भी फ़रमाया दिल के दौरे से आज कैसे बचा जाएगा पूंजीवादी मंदी का दौर कहाँ पहोंचायेगा ******** 177 1986 के दौर की रचना अब मैंने रटना छोड़ दिया है मैं कुछ कुछ सोचने लगा हूं भगवान के भक्तों का असली चेहरा थोड़ा पहचान में आने लगा है मेरे दिमाग में भगवान के वजूद पर भी एक सवालिया निशान लग गया है; वह होता तो सरसों के पीले फूल उगाने की एक सच्चे प्यार की कीमत उन्मादी गोली या त्रिशूल का निशाना न होती। कुछ और सोचना और देखना शुरु किया यूं लगा भगवान है इंसान का बनाया हुआ तभी तो वह अपने मालिकों की जेल में कैद है आज तक वह जनता के दुख-दर्द बढ़ाने तो बाहर निकला है कभी कम करने नहीं शायद यही कर सकता है 'वह' आगे कुछ नजर दौड़ आता हूं तो पाता हूं कि आज भी कुछ बहादुर लोग सरसों के पीले फूल उगाने की जी तोड़ कोशिशें कर रहे हैं अपने खून से खेत को सींच रहे हैं मुझे इंसान की इंसानियत पर फिर भरोसा होने लगा है और यह विश्वास बनता जा रहा है सरसों के फूल भगवान नहीं लगा पाएगा यह बहादुर इंसान ही फिर लगाएगा और यकीं है वह दिन अवश्य आएगा जब सरसों के पीले फूल फिर से उगेंगे शशि पुन्नू के बीच की दीवारें 176 आर्थिक मंदी के दौर ने सताया हमको जेब ढीली करदी इसने रुलाया हमको बहुत सी जगह इसने करतब दिखाए आ ई टी के कई योधा इसने मार गिराए सरकारी कंट्रोल बता न था जिनको उसी से भीख मंगनी पड़ रही उनको पड़ सकता दिल पेय बुरा असर बताया चिकत्सकों ने हाल मे ऐसा भी फ़रमाया दिल के दौरे से आज कैसे बचा जाएगा पूंजीवादी मंदी का दौर कहाँ पहोंचायेगा ढह जाएंगी चारों तरफ सरसों के फूल लहलाने लगेंगे

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