158
मजदूर और बारिश
ए बारिश अभी जरा थम के बरस
मेरा पेट भर जाए तो जम के बरस
न बरसी तो भी बरसी तो भी मेरा
निवाला तो खतरे में कैसे भी बरस
फिर भी तमन्ना है कि बरस तो सही
खेत खलिहान के लिए कैसे भी बरस
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157
संकट था खूब घर लेकिन हम खोए नहीं
दर्द बहुत था दिल में लेकिन हम रोए नहीं
साहब को क्यों फिक्र हो हमारी भूख का
उनको क्या पता तीन दिन से सोए नहीं
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156
गरीबी का लंबा सफर कटता ही नहीं
भूखे पेट कुछ भी अच्छा लगता ही नहीं
कोई नहीं जो पूछे इस दर्दे दिल का हाल
महज वादों से यह दिन चलता ही नहीं
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155
आज अपने हकों की खातिर लड़ती देखी जा सकती है औरत ।।
घर से बाहर निकल कर बढ़ती देखी जा सकती है औरत ।।
दबती पिसती रहती है फिर भी मासूमियत है बाक़ी उसकी
अपने अपने घरों में आज पढ़ती देखी जा सकती है औरत।।
नई जंजीरें और बेड़ियां आज क्यों उसको डाली जा रही हैं
फिर से अंगड़ाई लेकर के उठती देखी जा सकती है औरत।।
शैतान सभी चौकन्ने हो गए औरत की जरा सी हरकत पर
उनकी छाती पर दिनों दिन चढ़ती देखी जा सकती है औरत।।
औरत को खिलौना मत समझो वह भी आखिर एक इंसान है
डुबो कलम खूने जिगर में लिखती देखी जा सकती है औरत ।।
कितने रूप दिए औरत को असली इंसान का रूप छीनकर
इंसानियत की खातिर अब लड़ती देखी जा सकती है औरत।।
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154
प्रदूषण और हम
उम्र कम दिल्ली 6 साल
देश का दम तीन साल कम
बिहार 5 साल कम
प्रदूषण फल फूल रहा
मौत का झूला झूम रहा
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153
तरक्की
हमने तरक्की की है किस कीमत हमारी बला से
ऊंची ऊंची इमारतें फिर चाहे गरीबी बढे या
पाश इलाकों में जहाँ 90 करोड़ के मकान
5 या 10 बरसात में टपकते रहें
करोड़ लोग रहते हैं
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152
वे बचपन के दिन
जब कंचों का और
खत्ता खुलिया का खेल ही
जिंदगी थी।
लाभ हानि के सवाल
दूध में पानी का मिलाना
फिर लाभ प्रतिशत बताना
फ्रांस की क्रांति का तराना
औरंगजेब के पतन का फसाना
तोते की तरह रट लेना ही
जिंदगी थी।
रटने की प्रक्रिया ने सोचने की
प्रक्रिया पर जादू किया
सोचना शुरू ही नहीं हो पाया
मैं खुश था मगर मेरे से ज्यादा
वो खुश थे।
स्कूल के बाद कॉलेज में पहुंच जाना
मेरे सनम फिल्म की ट्रेचडी पर रोना
रुलाना इसको
हकीकत मानकर मातम मनाना
और फिर इस बात का गिला उठाना
इतना भी नहीं मालूम था
धत तेरे की।
और इस प्रकार अंधेरी में भटकता रहा
भगवान पर भरोसा किया मैंने
इस उम्मीद को जिया मैने
कि कभी तो असली पड़ाव पर
पहुंच जाऊंगा एक दिन।
इसी बीच मैंने देखा कि
हीर और रांझे के बीचों-बीच
लीलो-चमन के दरमियान
शशि पन्नू के आमने-सामने
नफरत और दहशत की
इतनी ऊंची दीवार खड़ी कर दी गई कि
वे एक दूसरे को देखने भर को
तरस गए
वो सर सरसों के पीले खेत
उनमें उमड़ता वह अनोखा प्यार
आज दूर कहीं
हैवानियत के खूनी पंजों में जकड़ा
बार बार चीख रहा है
है कोई माई का लाल जो
फिर से काले पड़े खेतों में
सरसों के पीले पीले फूल उगादे?
लगता है आज
उन खेतों में पीले फूल उगाना
चमन का लीलो को बुलाना
इतना आसान नहीं रह गया है
क्योंकि आज इस सब की कीमत
उन्माद से लबोलब बंदूक की गोली है
मैं आसमान की ओर देखकर
पुकार उठता हूं
हे भगवान तू कहां है?
1993
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151
नई दुनिया - प्यार की दुनिया
नई दुनिया का सपना हम दोनों ही देख रहे हैं।।
सोचा अपने अपने ढंग से कहते हुए झेंप रहे हैं।।
1
झेंप मिटी साथ चले सोचा जीवन सफल हो गया
अलग अलग जातें हमारी जिनका मतलब खो गया
ब्यां नहीं कर सकते सब हम पर उंगली टेक रहे हैं।।
2
प्रेम विवाह को समाज में देखा क्या दर्जा मिलता
खूंखार हो जाता है समाज देख कर ही दिल हिलता
बिना बात की बात में निकाल मीन मेख रहे हैं।।
3
तुम्हारी जिद प्यार का विरोध तो जिद हमारी भी है
प्यार को परवान चढ़ायेंगे इसमें इज्जत तुम्हारी भी है
जात के तवे पर देखो ठेकेदार रोटी सेंक रहे हैं।।
4
जातें अलग अलग हमारी मगर मानवता है भरपूर
जाति की सीमा मालूम है इसके बन्धन नहीं मंजूर
एक अपना सा घर बनाएं यही इरादे नेक रहे हैं।।
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150
2008
स्कूल से आगे बढ़कर फिर
कॉलेज में जाना होगा
इसके सपने
बहुत बार देखे थे मैंने
कौन से कॉलेज में दाखिला हो
कई बार सोचा था मैंने
यह भी 1 साल पहले सोचना शुरू किया
पहले दिन का पहनावा क्या होगा ?हेयर स्टाइल पर भी नजर डाली थी
क्या साइकिल पर ही मुझे
कॉलेज जाना होगा हर रोज ?
या फिर स्कूटर का जुगाड़ करेंगे
घर की हालत जुगाड़ की भी कहां
इसी उधेड़बुन में गुजर जाता है
पूरा का पूरा दिन मेरा जुगाड़ पर आखिर एक दिन पांच सात लोग आए आव भगत हुई मेरे से भी पूछा
कौन सी क्लास पास की है बेटी
दूसरा सवाल था कितने नंबर आए नंबर बताएं मैंने धीमे से ही सही
नजरें मुझे घूरती सी महसूस हुई
जैसे बकरे को घूरती हैं मारने से पहले हर कसाई की नजरें और फिर
हलाल कर दिया जाता है बकरा
मुझे क्या पता था कि मेरा भी
हलाल होने का वक्त आ गया है
और एक महीने बाद ही मेरी शादी
कर दी गई एक और बेरोजगार के साथ 2 बेरोजगारों की दुनिया के सपने
मैं नहीं देख पाई क्योंकि अंधेरे के सिवाय कुछ दिखाई नहीं दे रहा था भूखे घर की आ गई हम क्या करें ?
यह दिन देखने के लिए क्या छोरे को जन्म दिया था?
प्यार मोहब्बत बेहतर जिंदगी
यह सब अतीत की बातें थी
घर भी तंग सा दो ही कमरे
साथ में भैंस व बछिया का भी
सहवास रहता था 24 घंटे
समझ सकता है कोई भी कि
दो कमरों में 6 सदस्यों के
परिवार का कैसे गुजारा होता है?फुर्सत ही नहीं है एक दूसरे
के लिए !
चोरों की तरह मुलाकातें होती हैं
अपने ही घर में
बस जीवन के घिसट रहा है हमारा
एक दिन सोचा इस नरक से कैसे छुटकारा मिले ?
मगर उसे ताश खेलने से फुर्सत
कहां ?
घर खेत हाड़ तोड़ मेहनत
और ताने!
यही तो है जिंदगी हमारी
हमारे जैसे करोड़ों युवक और
युवतियां है भारत में
कभी-कभी जीवन लीला को
खत्म कर लेने का दिल करता है
फिर ख्याल आता है
इससे क्या होगा ?
इससे आगे नहीं सोच पाती !!
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