Wednesday, June 12, 2024
130 से 139
139
आसान है
बहुत आसान है हमारी जिंदगी की
सटीक समीक्षा करना
बहुत आसान है हमारी जिंदगी की
सुंदर सी तस्वीर बनाना
बहुत आसान है हमारी जिंदगी की
तरफदारी करते रहना
बहुत आसान है हमारी जिंदगी की
नुमाइश दिखाते रहना
मगर बहुत मुश्किल है इस जिंदगी को
हकीकत में जी सकना
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138
नैना देवी
नैना देवी में हादसा हुआ
डेढ़ सौ लोगों की मौत हो गई
तीन सौ घायल हो गए
कहते हैं पुलिस ने भांजी लाठियां
मची भगदड़ तो फिर
कोहराम मचा
हर तरफ चीख पुकार थी
मंदिर में खौफ पसर आया
रास्ता बहुत ही संकरा सा था
लोग भाग भी नहीं पाए और कुचले गए
आठ दस करोड़ का चढ़ावा आता है
सवाल उठ रहे हैं वह कहां जाता है
सुविधाएं तो चाहिएं भक्तों को
मगर कौन मांग करे और किससे?
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137
किसान ने अपनी मेहनत से
जो गेहूं अपने खेत में
उगाया
उसका भाव भी उसे
उसकी मेहनत के मुताबिक
ना मिल पाया
मंडी में आढती ने भी
अपना पूरा करतब
दिखलाया
मंडी में जब वही गिहूं
खुले में रखा गया और
बरसात में भीग गया
यह देख किसान का जी
बहुत दुख पाया
पूरे 6 महीने की मेहनत
जब यूं खुले में बर्बाद हो
तो गम तो होगा ही
यह बात अलग है कि
हम उस मेहनत की
कीमत से वाकिफ ही
नहीं हैं?
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136
क्वालिटी
क्वालिटी का जमाना है
कीमत का क्या मायना है
फल विक्रेता की भी
खूब चांदी हो रही है
ग्राहक ज्यादा मूल भाव भी
नहीं करते मगर
देसी आम और तरबूज
साथ में है खरबूजा
इनका संगी ना बदेशी दूजा
लीची भी है देसी अपनी
सबसे बढ़िया देसी फलों का
अपने ही बाजार में यूं पिटना
सोचो तो सही
क्या यह सही बात है?
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135
पता नहीं
पता नहीं आज का जमाना किधर को जा रहा है
सुबह कहीं शाम कहीं अगली सुबह कहीं पा रहा है
नई तकनीक ने कब्जा जमाया पूरे इस इंसान पर
आदमी आदमी को दिन दिहाड़े नोच नोच खा रहा है
दूसरों के कंधों पर पैर रखकर आसमान छू रहे हैं
गंदी फिल्मों का फैशन आज नई पीढ़ी पर छा रहा है
दारू समाज के हर हिस्से में सत्यानाशी बनती जा रही
अच्छा खासा हिस्सा आज दारु पी गाने गा रहा है
लालच फरेब धोखाधड़ी का दौर चारों तरफ छाया
नकली दो नम्बर का इंसान हम सबको भा रहा है
बाजार व्यवस्था का मौसम है मुट्ठी भर हैं मस्त इसमें
बड़ा हिस्सा दुनिया का आज नीचे को ही आ रहा है
भाई भाई के सिर का बैरी कत्लोगारत बढ़ रही है
पुलिस अफसर कोई बाएं दाएं से खूब पैसे बना रहा है
पूरे के पूरे सिस्टम को दीमक खाती जा रही देखो
आज भ्रष्टाचार चारों तरफ डंक अपना फैला रहा है
एक तरफ
मॉल खड़े हुए दूजी तरफ टूटी हुई सड़कें देती दिखाई
तरक्की का यह मॉडल देखो दूरियां बहुत बढ़ा रहा है
अपने बोझ तले एक दिन मुश्किल होगा सांस लेना
तलछट की जनता जागेगी रणबीर उसे जगा रहा है
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134
विदेशी फल
विदेशी फलों का स्वाद
चखें अपने देसी शहर में ही
दिल्ली मुंबई और कलकत्ता
भागकर जाने की जरूरत नहीं
हमारे शहर का बाजार भी
विदेशी फलों से सजा हुआ है
शहर की रेहड़ियों पर तरतीब से
टिके हुए हैं विदेशी फल
चाहे देसी से विदेशी की कीमत
ज्यादा क्यों न हो
कीमत की किसे चिंता है
फल विदेशी हमारे घर में है
यह बात दीगर है कि हमारे
पिताजी देसी की लड़ाई
लड़ते-लड़ते दम तोड़ गए
थाईलैंड का अमरूद
मिलता है ₹200 किलो
कैलिफोर्निया का हरा सेब
क्या कहने हैं सब के
चाइनीज सेब भी आ टपक
थोड़ा सस्ता है कैलिफोर्निया से ऑस्ट्रेलिया का बब्बू गोसा
अमीर को क्या परवाह महंगे की
मध्यम वर्ग भी देखा देखी
भरने लगा अपने फ्रिजों को
विदेशी फलों से
स्वाद तो बेहतर है
देसी में वह स्वाद कहां
जो विदेशी में है।
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133
सुरक्षित कौन
रोहतक में करोड़ों रुपए का
व्यापार रोजाना होता
5 महीने में शहर में
व्यापारियों की
दो हत्याएं हो चुकी है
चार व्यापारियों को
लूटा जा चुका है
एक पर जान लेवा हमला
किया गया दिन दहाड़े
यदि व्यापारी ही है सुरक्षित हैं
तो सीएम सिटी में
फिर कौन सुरक्षित है ?
कई साल पहले की रचना
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132
दोगलापन दुनिया का
बेजुबान पत्थर पर लदे हैं करोड़ों के गहने मन्दिरों में
उसी दहलीज पे एक रूपये को नन्हें हाथों को तरसते देखा है
सजे थे छप्पन भोग और साथ में मेवे मूरत के सामने यारो
बाहर एक फकीर को भूख से तड़प कर मरते देखा है यारो
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131
साइनिंग इंडिया सफरिंग इंडिया
ये महज शब्दों का खेल नहीं है
ये हैं दो दुनिया इसी जमीन पर
एक तरफ एयर कंडीशन्ड कोठी
उधर बरसात में टपकती झोंपड़ी
करोड़ों के को वह भी नहीं नसीब
एक तरफ एयर कंडीशन्ड कारें हैं
उधर कई कोश नँगे पांव चलना है
एयर कंडीशन्ड पांच सितारा होटल
उधर दो रुपये की चाय का ढाबा है
एयर कंडीशन्ड अपोलो फोर्टिस हैं
उधर बिना दवाई के सीएचसी हैं
एयर कंडीशन्ड मॉल सब मिलता
उधर खुदरा छोटी छोटी दुकानें हैं
एयर कंडीशन्ड स्कूल आलिसान
उधर बिना पंखे के कमरे के स्कूल
एक तरफ ऐयासी की दुनिया छाई
दूसरी तरफ मेहनत से फुरसत नहीं
दोरंगी दुनिया नजर नहीं आती हमें
इस अंधेपन को क्या कहूँ?शब्द नहीं
आपके पास हैं तो इंतजार इनबॉक्स में
रणबीर
15.03.08
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130
पृथ्वी अपना संकट ये आज सबको सुनाती है
चारों तरफ से हमला अस्तित्व बचाना चाहती है
हरियाणा की धरती से गिद्ध खत्म हुए जा रहे
मोर भी जगह-जगह पर आज मरे हुए हैं पा रहे
कैंसर बढ़ते जा रहे आज हमें समझ ना आती है ।
जमीन हमारे खेतों की बांज होती जा रही आज
फसल सब कुछ करके भी नहीं बढ़ पा रही आज
बीमारी क्यों छा रही आज जमीन भी बिक जाती है। बाजारू विकास के तले टिकाऊ विकास खो गया
कैसा दोहन कुदरत का देखो चारों तरफ हो गया
बीज बिघन के बो गया धरती की हद छाती है।
सामाजिक सूचक हमारे बहुत हो गए खराब
आर्थिक सूचक से काम नहीं चलेगा जनाब
लिख रहे हैं ऐसी किताब जो सब भेद बताती है
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