Monday, July 8, 2024

251- 275

275 मेरा स्वतंत्र वो वजूद मेरे से किसने पूच्छा था कि वहां पैदा होना भी चाहता हूँ मैं कि नहीं वो घर वो गाओं वो जिला वो प्रदेश वो देश वो मजहब चिपक से गए बिना कभी पूच्छे मेरे वजूद के साथ बहुत बार अहसास करवाया जाता मेरे इस प्रकार के अनचाहे वजूद का मेरी मानवता मेरा स्वतंत्र वो वजूद पता नहीं कहाँ खो गया ढूंढ रहा हूँ ढूंढ नहीं पाया अभी तक तो शायद कभी इसे ढूंढ भी पाऊंगा कि नहीं ********** 274 एक नया ट्रेंड आज की मोहब्बत फेसबुक और व्हाट्सअप हो गई हैं बताते धीरे - धीरे दोस्ती और फिर मोहब्बत का अहसास हैं जताते फिर नम्बरों का आदान प्रदान होता पूरी रात जागके बिताते मोहब्बत के पाठ पढ़े जाते हैं ,वादों का सिलसीला है चलाते और फिर मॉल में मुलाकातें शुरू हो हाँ में हाँ कुछ रोज मिलाते कुछ दिन का सिलसिला फिर किसी बात पर तकरार बनाते और फिर अन्फ्रेंड का बटन दब जाता है सब कुछ फिर भुलाते और फिर एक नया चेहरा उस पर लाइक कर नया प्यार रचाते सिलसिला जारी है चार के बाद पांचवें प्यार से फेरे फिर घुमाते दो तीन साल चलता मगर फिर तलाक का परचम उठाते ********* 273 गाँव जो टिका था अन्याय पर एक दिन उसे ढहना ही था ना बराबरी के गाँव भक्तों को एक दिन यह सहना ही था बिगड़ गया गाँव का माहोल महिला सुरक्षित नहीं वहां नशाखोरी बढती जा रही ढूढ़ दही का था सेवन जहाँ ********* 272 प्यार का नाम लेकर कम से कम इसको बदनाम तो मत करो तुम आज की दुनिया में प्यार की दुकानें हर गली हर मोड़ पर खुल गयी हैं सम्भल के खरीदना ए मेरे दोस्त काश प्यार ख़रीदा भी जा सकता !!!! *********** 271 खुदा को खुद इन्सान ने बनाया है वक्त वक्त पर उसका स्वरूप बदला इंसान की जरूरत के रूप में आया है अग्नि देवता बनी वायु देवता बनी जब भी इन्सान क़ि कुदरत से ठनी एक और देवता वजूद में पाया है कुदरत के खेल में खुदगर्जों ने ही खुदा को इन्सान और कुदरत के बीच जान बूझ कर के फंसाया है आज तक इन्सान मूलभूत में वही कोई बदलाव नहीं है सदियों से पर खुदा के रूप बदलते ही रहे और आगे भी खुदगर्ज इंसान और भी भगवान घड़ेगा अपनी जरूरत से ********* 270 अच्छा जीवन क्या है ??? अच्छी जिंदगी क्या है सवाल चारों और घूमता है मानवजाति का शाश्वत प्रश्न कानों में खूब गूंजता है सभ्यता और संस्कृति के साथ अर्थ बदल जाते हैं पुराना बदलता नए में सामने कई सवाल आते हैं यह बात साफ़ है कि अच्छी जिंदगी की परिभाषा अर्थशाश्त्र बाजार या वस्तु इसका बना देते हैं तमाशा इसकी परिभाषा का संस्कृति ही आधार हो सकती है जो प्रगति के अलग पड़ाव पर आगाह हमें करती है जीवन का लक्ष्य क्या है और कौन से मूल्य मददगार या फिर कौनसे नए मूल्यों की है सभ्यता को दरकार साफ़ है की अच्छी जिंदगी कोई हवाई चीज नही है परलोक , पुनर्जन्म स्वर्ग या मोक्ष से ना जुडी कहीं है इसका सम्बन्ध भौतिक जीवन से जुड़ा हुआ बताया अतः उसकी प्राप्ति केवल मूल्यों और आदर्शों नहीं है बल्कि भौतिक सुख सुविधाओं तथा उनको पैदा करने वाले संसाधनों से ही हो सकती है यह रास्ता दिखाया और यह राजनैतिक शाश्त्र का विषय ही बताते हमको मग़र यह राजनैतिक शाश्त्र नैतिक या सांस्कृतिक अनुशासन में रहना चाहिए वर्ना अनर्थ में धकेलेगा सबको एक तरफ बाजारूपन के और दूसरी तरफ बर्बरता के मुहाने में धकेल रहा है और आने वाले वक्त में और धकेलेगा अच्छा जीवन नहीं मिलेगा घुमते रहो बाबाओं के पास !!! ******** 269 हमारे ही रक्षक बने फिरते ऐसे शातिर ये ख़िलाड़ी हमारे सिर पर ही चलाते हमने बनाई जो कुल्हाड़ी -- भक्षक को रक्षक मानके करते हैं हम उनके गुणगान देखे कहाँ छिपा बैठा हमारा मालिक वह भगवान ---- भगवान की सच्चाई से उठ रहा है विस्वास हमारा भगवान की दया उसी पे जो लेता बुराई का सहारा ---- भगवान कहते अपने आप अपना अन्दर ठीक करले इन्नर की खोज करके अपने जीवन में रंग भरले ------ अन्दर की बात चीत सभी गुरु और बाबाजी करते बाहर की दुनिया का ये ज़िकर करने से भी डरते ********** 268 प्रकृति का अपना एक अलग अंदाज़ है... जब देती है तो... *अहसान* नहीं करती और...।। जब लेती है तो... *लिहाज़*नहीं करती... ********* 267 मेरा जनाजा निकाल कर कितने दिन जी पाओगे ।। तुम मेरी मेहनत बिना कैसे शक्कर घी खाओगे।। कई ढंग से बांट रहे हैं एक दूजे के दुश्मन बनाए ये चाल तुम्हारी समझी तो दस के एक बांटे आओगे।। हमारे वास्ते जो गढ़े खोदे इनका पता जल गया तो याद रखना इन्हीं गढ़ों में मूंधे मूंह गिरते जाओगे।। ये संकट बढ़ता जा रहा हमारा निवाला खोसते हो यूं कितने दिन जालिमो दुनिया को ठेके पे दौड़ाओगे।। तुमसे ज्यादा शातिर कौन पैदा करते हो आतंकवादी पालते पोसते हो इन्हें सच कब तक छिपाओगे।। *********** 266 खुदा की क़िस्मत की आड़ बेकारों को चाहिए कालाधन को चाहिए भ्रष्टाचार को चाहिए ठेकेदार को चाहिए गुनाहगार को चाहिए मेहनतकश अपनी क़िस्मत खुद लिखता है खुदा वाले उसको बहकाते रहते है तथाकथित खुदा की क़िस्मत के नाम से चल रहा है धंधा सदियों से ********* 265 यह साफ़ हो गया है कि एक समय और एक स्तर के बाद "सफलता" और "अनैतिकता " सिक्के के दो पहलू हो जाते हैं ******** 264 आज का लक्ष्य समूची जनता को खाद्य सुरक्षा , पूर्ण रोजगार और शिक्षा , स्वास्थ्य तथा आवास तक सर्वभोम पहुँच मुहय्या करना | इसका अर्थ है मजदूरों , किसानों तथा अब तक हाशिये पर पड़े रहे तबकों की जीवन स्थितियों में भारी सुधार लाकर , जनता का आर्थिक व राजनितिक शक्तिकरण करना | ************ 263 अहसास------------------ मेरा ना होना तुम बर्दास्त नहीं कर सकते मेरी ताकत का अहसास है तुम्हें इसीलिये बाँट दिया मुझे धर्म, जात , इलाके, भाषा के नाम पर मुझे अपनी कमजोरी का जिस दिन अहसास हो जायेगा उस दिन ये जमाना बदल जायेगा *********** 262 चुप रहे फिर भी बहुत कुछ कह गये अब कोई ना समझे तो क्या करे कोई --------- 261 असल में जो नंगे हो गये वो अपना नंगा पन छिपाने को सबको नंगा कहते हैं ताकि हम झिझकें उंगली उठाने को पत्थर तोड़ कर ताज महल बनाया क्यों नहीं दिखाई देता ताज महल के साथ सब कोई नाम शाहजहाँ का ही लेता ******** 260 कैसा अजीब नजारा कैसा अजीब नजारा देह मेरी पर हल्दी बीरू के नाम की कैसा अजीब नजारा हथेली मेरी मेहंदी बीरू के नाम की कैसा अजीब नजारा सिर मेरा पर चुनरी बीरू के नाम की कैसा अजीब नजारा मांग मेरी पर सिन्दूर बीरू के नाम की कैसा अजीब नजारा माथा मेरा पर बिंदी बीरू के नाम की कैसा अजीब नजारा नाक मेरी पर नथनी बीरू के नाम की कैसा अजीब नजारा गला मेरा मंगल सूत्र बीरू के नाम की कैसा अजीब नजारा कलाई मेरी चूड़ियाँ बीरू के नाम की कैसा अजीब जमाना ऊँगली मेरी अंगूठी बीरू के नाम की कैसा अजीब जमाना कुछ भी तो नहीं है मेरा मेरे नाम का चरण वन्दना करूँ सदा सुहागन आशीष बीरू के नाम का करवा चौथ व्रत मैं करूँ पर वो भी तो बीरू के नाम का बड़मावस व्रत मैं करती पर वो भी तो बीरू के नाम का कोख मेरी खून मेरा दूध मेरा और नीरू बीरू के नाम का मेरे नाम के साथ लगा गोत्र भी मेरा नहीं बीरू के नाम का हाथ जोड़ अरदास सबसे बीरू के पास क्या मेरे नाम का रणबीर 6.7.2015 ********* 259 अगले पिछले का चक्कर अगले पिछले के चक्कर में अबका हिसाब बिगाड़ लिया टिकवा पथरों पर माथे हमारे भक्तों ने बिठा जुगाड़ लिया इसमें भोगा वो पिछले का अब किया वो मिलेगा अगले में इसकी कोई जगह नहीं है सार सोच कर लिकाड़ लिया कर्म करो फल की चिंता ना करो कभी से इसे मानते आये अडानी अम्बानी जैसों ने गीता से क्यों खिलवाड़ किया अन्धविश्वाशों का हुआ है क्यों बहुत प्रचार प्रसार यहाँ पर विज्ञान ने अंधविश्वासों का आज पूरा नकाब उघाड़ दिया ******** 258 अध्यापक कामचोर डॉक्टर कामचोर कर्मचारी कामचोर किसान भी कामचोर मजदूर कामचोर अडानी अम्बानी कर्मठ तभी तो विकास दर बढ़ रही है । अबकी बार तो कुछ पॉजिटिव कहा कि नहीं ********** 257 होंश में आना होगा अब नए संगठन को हमें अपनाना होगा ।। जो भाई नहीं आएं उनको बुलाना होगा ।। संगठन बनायें जो रजके रोटी खाना चाहते अपने बच्चों को हम शिक्षा दिलाना चाहते सब बराबर हों ऐसा समाज बनाना चाहते अब हमें क्रांति के गीतों को गाना होगा ।। जो भाई नहीं आएं उनको बुलाना होगा।। वो क्यों अमीर हो गए इस पर विचार करें हम क्यों गरीब ही रहे इस पर ध्यान धरें अलग अलग बंटे हम एक दूजे से ही डरें जात पात भूलके एक मंच पर आना होगा।। जो भाई नहीं आये उनको बुलाना होगा ।। हरियाणा बुरी तरह जलवाया देख लिया जातों को आपस में भिड़वाया देख लिया फूट डालो राज करो आजमाया देख लिया मेहनतकश को मानवता को बचाना होगा।। जो भाई नहीं आये उनको बुलाना होगा ।। महंगाई बढ़ती जा रही देखो आज यहाँ बेरोजगारी हमें खा रही देखो आज यहाँ प्याज भाव नहिं पा रही देखो आज यहाँ इन मुद्दों को मिलकर के उठाना होगा ।। ************ 256 ranbir dahiya - October 4, 2009 दोहरापन दोहरा पन जीवन का हम को अन्दर से खा रहा | एक दिखे दयालु दूसरा राक्षस बनता जा रहा | चेहरों का खेल चारों तरफ दुनिया में फैल रहा मुखौटे हैं कई तरह के कोई पहचान ना पा रहा | सफेद मुखौटा काला चेहरा काम इनके काले हैं, बिना मुखौटे का तेरा चेहरा नहीं किसी को भा रहा | कौनसा मुखौटा गुजरात में करतब दिखा रहा ये जनता को बहला धर्म पे कुरसी को हथिया रहा | धार्मिक कट्टरता का चेहरा प्यारा लगता क्यों है मानव से मानव की हत्या रोजाना ही करवा रहा | कौन धर्म कहता हमें कि घृणा का मुखौटा पहनो, खुद किसकी झोंपड़ी में आग खुदा जाकर लगा रहा | राम भी कहता प्यार करो दोहरेपन को छोड़ दो अब रणबीर सिंह भी बात वही दुजे ढंग से समझा रहा | CHALE KHETON KI AUR *********** 255 क्या कुछ नहीं बदला --------------------- उखल कहाँ अब मुस्सल कहाँ अब गौजी कहाँ अब राबडी कहाँ अब बाजरे की खिचडी बताओ कहाँ अब गुल्गले कहाँ अब पूड़े कहाँ अब सुहाली कहाँ अब शकर पारे कहाँ अब पीहल कहाँ अब टींट कहाँ अब हौले कहाँ अब मखन का टींड कहाँ दिखता अब छोटी सी बात आलू ऊबाल कर आलू के परोंठे कहाँ चले गये पौटेटो चिप्स आये बीस गुना महंगे छद्म आधुनिकता पौटेटो चिप्स खाना फैशन बन गया बहुत कुछ बदला लम्बी फहरिस्त है | ********* 254 बेचैनी जनता की बढ़ती जा रही समझौता संघर्ष करती आ रही डायलैक्टिस इसी को कहते हैं आज बेचैनी दुनिया पर छा रही डेमोक्रेसी ने आगे कदम बढाया है जनता ने कुछ अधिकार पाया है कितना ही भ्रष्टाचार बढ़ गया हो इसके खिलाफ विरोध जताया है उठती बैठती जीवण बिता रही है कई बार घन घोर अँधेरा हटाया है लूट के हथियार बदल लिए जाते हैं जनता ने एकता हथियार बनाया है ******* 254 एकतरफ़ा मोहब्बत का भी एक अंदाज होता है उपर से कहता है कोई बात नहीं अंदर से रोता है प्यार तो दोतरफ़ा होना है लाजमी यही सुना है एक तरफ़ा आसिक क्यूँ गल्त फ़हमी में सोता है ********** 253 रुकना नहीं निराश मतना होईये बेटी दिखा दे आज बन कै नै चिंगारी पाछै मतना हटियो जंग तैं छोरियो निगाह थारे पर हमारी हरयाणा मैं महिलावाँ नै आजादी का बिगुल बजा दिया खेलां मैं चमकी दुनिया मैं शिक्षा मैं आगै कदम बढ़ा दिया तेरे इस कदम नै पूरा हरयाणा एक बै तो आज डरा दिया कुछ दकियानूसों नै विरोध मैं यो अपना झण्डा उठा दिया नम्बर वन नहीं सै पर इसनै जरूर नम्बर वन बनावेंगे हम अपने नौजवान भाइयां गैल्यां मिलकै कदम बढ़ावैंगे हम ********* 252 नब्बे और दस की लड़ाई नब्बे को समझ नहीं आई दस ने अपनी पूरी ताकत न समझें इसपे है लगाई मगर दस का जो पैसा आज ताकत है बेलगाम ये एक दिन कर ही देगा इसकी भी नींद खूब हराम ये तब अपनी असल शकल लेगी दस नब्बे की लड़ाई इतिहास गवाह है मानवता का पलड़ा आखिर जीता झूठ का संसार फले कितना सच बन जाती है कविता इंसान की इंसानियत की वही झूठ भी देती है दुहाई *********** 251 शादी की अल्बम शादी वह मौका है जब दो दिल दो ख़ानदान अपने सुख के पलों को पूरे भरपूर अंदाज में जीते हैं यारो इसके गवाह होते हैं कई परिवार बहुत से मेहमान दूर से आते यारो वे सब अपनी हाजरी दर्ज करवाते कैमरे की जद में सब कैद हों जाते जब भी शादी का अल्बम पल्टा जाता यादों के हम सब के दरीचे खुल जाते पुरानी खुसबूएं फिर महकने लगती हैं धुंधले पड़ गए चेहरे साफ दिखाई देते तभी तो हम तुम सब अपनी अल्बम देखकर मुस्कुरा उठते हैं मन ही मन हर तस्वीर एक कहानी कहती है जाने क्या क्या यादें तजा होती फूफा बुआ ताऊ ताई सब आये कुछ लोगों के बीच नई शादी का आगाज भी बनता इन शादियों में आप भी देखना एक बार फिर आज अपनी शादी की एल्बम और लीख देना अपने दिल की बात अपनी डायरी के किसी पन्ने पर

227 से 250

250 कीमत यह सच है कि किसान घोलते हैं हमारे व्यंजनों में मिठास अपनी मेहनत से लेकिन बेहद कडवा है इसका दूसरा पहलू गन्ना पैदा करता मगर नहीं मिल पाती वाजिब कीमत उसे अपनी मेहनत की आखिर ऐसा क्यों ? *********** 249 मेरा कस्सूर मेरा कसूर हमने दोनो ने मिलकर सोचा जिन्दगी का सफ़र तय करेंगे बहुत सुन्दर सपने संजोये थे प्रेम का पता नहीं ये हरयाणा क्यों पुश्तैनी दुश्मन बन गया यह सब मालूम था हमको पर प्यार की राहों पर बढ़ते गए मेरे परिवार वाले खुश नहीं थेa क्यों मुझे पता नहीं चला है न तो मैंने एक गोत्र में की है न ही एक गाँव में शादी मेरी न ही दूसरी जात में की मैंने तो भी सब के मुंह आज तक फुले हुए हैं हम दोनों से देखो प्यार किया समझा फिर शादी ससुराल वाले भी खुश नहीं हैं शायद मन पसंद गुलाम नहीं मिल सकी जो रोजाना उनके पैर छूती पैर की जूती बनकर सुघड़ सी बहु का ख़िताब लेती दहेज़ ढेर सारा लाकर देती ना प्यार का खुमार काम हुआ अब जनाब की मांगें एकतरफा बढ़ी मैं सोचती हूँ नितांत अकेली अब क्या हमारा समाज दो प्रेमियों के रहने के लायक बन पाया यहाँ \ चाहे कुछ हो हम लोड उठाएंगे मगर घुटने नहीं टिकाएंगे यारो वो सुबह कभी तो आयेगी की इंतजार में ये संघर्ष जारी रखेंगे झेलेंगे इस बर्बर समाज के सभी नुकीले जहरीले तीर छाती पर ही जिद हमारी शायद यही है कसूर ******* 248 TO OPPOSE कहना बहुत आसान है मुश्किल चलना सच्चाई पर लहर के उल्ट तैर कर ही पहुंचा जाता अच्छाई पर बुराई की ताकत को यारो देख कर डर जाते हम इसके दबाव में बहुत सी गलती भी कर जाते हम आका बैठ के हँसते रोजाना फिर हमारी रुसवाई पर मेहनत हमारी की अनदेखी रोजाना हो रही यारो चेहरे की लाली हम सबकी रोजाना खो रही यारो कहते वो हमको बेचारा जो जीते हमारी कमाई पर बीज है खाद और खेत भी इससे फसल नहीं उगती फसल उगती है तब यारो जब मेहनत हमारी लगती महल बने ये सभी तुम्हारे हम सब की तबाही पर ******** 247 गुनाह उनका सजा हमें उनके गुनाहों की हमको किसलिए सजा मिले ऐसा इंसाफ क्यों हो किसलिए ऐसी क़ज़ा मिले नाहक ही हम बेकसूरों की क्यों जान चली जाये कैसे हम जैसों को जीने की यहाँ फिजा मिले तुम्हारे सताने से हम रोये बहुत कई बार ही मग़र अब ना रोयेंगे ताकि तुम्हें ना मजा मिले तुम लूट कर हमें रहो सुख चैन से आबाद बताओ तो कसूर क्यों उल्टा हमें खिजा मिले हमारी मेहनत पर रणबीर वे ऐश करते हैं न्याय देखो हमें सुखी रोटी उनको पिज्जा मिले *********** 247 घूंघट में छात्रा वधु पन्द्रह सोलह बरस की छात्रा दर्जे दस की बालिका वधु बनी ससुराल में है पढ़ रही हमें पास से देख रही है बड़ी आस से देख रही है शायद मिट जाए सन्ताप सदियों से जो लगा हुआ है असूर्यपश्या का अभिशाप और हम हैं कि दौड़ रहे हैं परम्पराओं की गाड़ी में खड़े हैं मर्यादाओं की अगाड़ी में घूंघट का झँडा फहरा रहे हैं कल्चर के गीत गा रहे हैं लेकिन उसकी नंगी आँखों से आँखें नहीं मिला सकते कितने कमजोर हैं हम सीधे बातें नहीं चला सकते पर्दा गिराया हुआ है जो झीनी चुनरी का बीच में अंटा पड़ा है व्यक्तित्व पूरा एक इन्सान का जिसे थाह खोजना है ऊंचे आसमान का पढ़ने की जो मिली इजाजत नहीं रुकेगी बात यहाँ ससुराल और मायके से आगे भी जानेगी जहाँ पंख फैला कर शिक्षा के वो आसमान को लांघेगी और घूंघट की चुनरी का बना के परचम थामेगी मंगतराम शास्त्री 10/3/03 ********** 246 नौंजवानों का हाल सुनाऊं, साच्ची बात ना झूठ भकाऊं, बिना नौकरी दुखी दिखाऊं , के होगा इस हरियाणे का।। बेरोजगारी बढ़ती जावै सै, शिक्षा महंगी होंती आवै सै, युवक युवती हाँडै खाली, खत्म हुई चेहरे की लाली, नशे नै कसूती घेरी घाली, के होगा इस हरियाणे का।। छोटा मोटा ठेके का काम यो, ठेकेदार खींचै म्हारा चाम यो, तनखा मिलती घणी थोड़ी, मालिक बणे हाँडै करोड़ी, काम नै म्हारी कड़ तोड़ी, के होगा इस हरियाणे का । बेरोजी नै युवा रूआया रै, संकट सिर ऊपर छाया रै नशे का पैकेज ल्याये देखो , युवा इसमें फँसाये देखो, अंधविश्वासी बनाये देखो, के होगा इस हरियाणे का। मजबूत संगठन बनाना हो संघर्ष मिलकै चलाना हो सोचां युवा युवती सारे रै, कैसे क्लेश मिटेंगे महारे रै, छोड़ जात पात के नारे रै , फेर कुछ होगा हरियाणे का । ********* 245 सब कुछ बहता जा रहा है एकाध खड़ा रम्भा रहा है सफेद धन ढूंढें मिलता यहाँ काला धन सब पे छा रहा है गंभीरता शिकार हुई उतावलेपन की मानवता शिकार हुई शैतानियत की इमानदारी शिकार हुई बेईमानी की वो शिकारी हैं और हम शिकार उनके खेल पूरे यौवन पर है जीत उनकी है पर डर सता रहा है उनको क्योंकी जीत कर भी हारेंगे ही अम्बानी जी हार कर भी जीत तो हमारी ही होगी क्योंकी मानवता इंसानियत गंभीरता ये तो हमारे पास ही हैं और रहेंगी भी ********* 244 प्यार का तोफा एक लड़की ने एक लड़के से प्यार किया लड़के ने उसे बलात्कार का उपहार दिया इतने मेंभी सबर नहीं उस वहसी को आया अपने चार मुसटन्ड़ों को था साथ में लाया उन्होंने भी बारी बारी मुंह किया था काला गिरती पड़ती ताऊ के घर पहुँची थी बाला ताऊ को बाला ने सारी हकीकत बताई थी ताऊ ने भी वह हवस का शिकार बनाई थी माँ बाप ने जाकर बाला को छुड वाया था पुलिस में हिम्मत कर केस दर्ज कराया था गाँव के कुछ नौजवानों ने आवाज उठाई थी पाँचों की और साथ ताऊ की जेल कराई थी आज भी जेल में पैर पीट रहे हैं सारे के सारे क्या हुआ समाज को हवस ने हैं पैर पसारे ********** 243 अभी तो शुरुआत है लालच खुदगर्जी ये हमें शैतान बनायेंगी जरा संभल के !!!!! हमारी इंसानियत को हवानियत में तब्दील करने के अथक प्रयास किये जा रहे हैं दोस्तों अबतोसंभलना ही होगा जितना समझा दुनिया को उतना दुःख बढ़ता गया मेरा कि इतना भेदभाव क्यूं है क़िस्मत का ये जुमला तेरा मुझे सबसे बड़ा हथियार लगता इस भेदभाव के असली कारणों को छिपाने का !!!!!!!!!!!! ******** 242 एक लड़की ने साहस किया और आवाज उठाई बदतमीज गुरु जी ने अपनी बदनीयत दिखाई कुछ लडकीयों ने साहस किया और भीड़ गयी गुरु जी की सरेआम की सबने मिल कर पिटाई केस दर्ज होने जा रहा था उस गुरु के खिलाफ लड़की के बाप ने बीच में आकर के खेल रचाई पैसे लेकर केस बिगड़ दिया गुरु छुट गया साफ़ यह कहानी नही हकीकत है आप तक पहुंचाई कहाँ जा रहे हैं हम समझ नहीं पा रहा दोस्तों एक घटना नहीं है ऐसी घटनाओं की बाढ़ आयी ********* 241 दलित महिला से गैंग रेप हिसार में अपराधी खुले घूमें वहां बाजार में दलित ही नहीं यह महिला का सवाल ताकतवर दबंग और पैसे का बबाल कमजोर की बहू सबकी जोरू कहते गरीब ही सबसे ज्यादा जुलम सहते ********** 240 झाँसी क़ि रानी की गंभीर की फिलहाल जरूरत है भारत देश की सही तस्वीर की फिलहाल जरूरत है कुरुक्षेत्र के मैदान मैं कहते सच की जीत हुई थी द्रोपदी चीर हरण हुआ कलंकित ये रीत हुई थी एकलव्य वाले तीर की फिलहाल जरूरत है बुराई फैलती जा रही थी इस भारत के समाज मैं ज्योतिबा फुले रमाबाई उभरे थे नए अंदाज मैं दोहों वाले उस कबीर की फिलहाल जरूरत है अंड वंड पाखंड खिलाफ जमके लड़ी लड़ाई देखो सत्य की खोज में तयार करे बहन भाई देखो उस दयानंद से फकीर की फिलहाल जरूरत है ठारा सो सतावन में लाखों फंसी फंदा चूम गए राजगुरु सुखदेव भी आजादी की खातिर झूम गए उस भगतसिंह से रंधीर की फिलहाल जरूरत है जलियाँ वाले बाग़ का बदला दिल में ज्योति जलाई जालिम डायर की लन्दन में जाके थी भया बुलाई उस उधम सिंह बलबीर की फिलहाल जरूरत है जवाहर गाँधी रविन्द्र देश आजाद करना चाहया अनगिनत लोग थे जिन्होंने था अपना खून बहाया अंहिंसा पुजारी गाँधी पीर की फिलहाल जरूरत है मजदूर किसान की खातिर जिंदगी ही न्योछार दई मार्क्स ने दुनिया के बारे में एक नई सी विचार दई उस मार्क्सवादी शूरवीर की फिलहाल जरूरत है महिला दलित का दोस्त आज चाहिए समाज इसा पूंजीवाद राज अन्यायी ख़त्म हो मंदी का राज इसा तोड़ने की जुल्मी जंजीर की फिलहाल जरूरत है ********** 239 सच छिपाए न छिपे एक बार भोपाल से ग्वालियर ट्रेन से अपने घर जा रहा था मैं उसी ट्रेन में उसी डिब्बे में एक लड़की पास की सीट पर बैठी थी थोड़ी बातचीत शुरू हुयी तो पूछा मेरे घर परिवार के बारे में उसने बताया पिता हाई कोर्ट में जज मेरे मम्मी सुप्रीम कोर्ट की वकील हैं लड़की मन ही मन में हंसने लगी समझ नहीं सका मैं उसका हँसना अपनी सीट पर लेट सो गया मैं घर पहुंचा तो देखा वही लड़की मेरे घर पर मेरे से पहले पहुंची थी देख मुझे बहुत जोर से हँसी लड़की असल में मेरी मौसी की बिटिया मैंने सफ़र में पहली बार देखा उसे उसकी हँसी ने शर्मशार किया मुझे क्योंकि ट्रेन में जो बताया था मैंने सभी कुछ झूठा था था कथन मेरा उस दिन के बाद मैंने कसम खाई अब के बाद झूठ नहीं बोलूँगा मैं बहुत हद तक कसम मैंने है निभायी कभी कभी झूठ बोलता हूँ मैं तो ट्रेन का नजारा जरूर याद आता एक बार फिर मुझे याद दिला जाता ******* 238 इम्तिहान हमारा इम्तिहान लिया हर बार पास हुए सब कुछ तुम्हारे पास फिर भी उदास हुए पता है तुम्हारा तुम एक अमर बेल हो रब राखा क़िस्मत का रचा रहे खेल हो तुम्हारा अहम् और ये अहंकार दिखाता अन्दर का पूरा अंधकार अंधी गली में तुम बढ़ते जा रहे अपनी मौत के श्लोक पढ़ते जा रहे ******** 237 कारोबार नया साल हुआ आज नए साल का मनाना भी एक कारोबार हो गया बनावटी पन लटके झटके मस्त हमारा घरोबार हो गया कैटरिना मलायका के ठुमके कैसी इन्तहा ये बेहयाई की देखके पूरा हिंदुस्तान ख़ुशी से कितना ये सरोबर हो गया एक फुटपाथ पर बैठा हुआ वह यह सब देख रहा है दो चार लकड़ी इकठी करके हाथ अपने सेक रहा है सामने दुकान पर देखी ठुमकों की झलक थोड़ी सी घरवाली ने देख लिया तो सच मुच ही झेंप रहा है नए साल का जश्न मनाकर आज मुंबई छाई देखो ठिठुरे बचपन और जवानी ये गाँव की रुसवाई देखो लड़की मांरके पेट में हमने लूटी है वाह वाही देखो शराब नशा और मस्ती ठुमकों की ये बेहयाई देखो गला काट मुकाबला आज दुनिया में है छाया देखो भाई का भाई दुश्मन इसने यहाँ पर है बनाया देखो आखिर कहाँ जा रहे है हम जरा देर सोचो तो यारो इंसानियत का चेहरा यहाँ पर किसने है चुराया देखो ************ 236 क्या कहूं सौ बार मरना चाहा आँखों में डूबकर के हमने हर बार निगाहें झुका लेते हमें मरने नहीं देते तुझे देखे बिना तेरी तस्वीर बना सकता हूँ मैं तुझसे मिले बिना तेरा हाल बता सकता हूँ मैं दिल में क्या है तेरे सब तो जता सकता हूँ मैं क्या सोचते रहते दिन भर गिना सकता हूँ मैं ********* 235 मेरी शादी से पहले मेरी शादी से पहले परिवार ने खूब पूछताछ छानबीन की थी बहुत गुणवान लड़का है कोई मांग नहीं हैं उनकी सीधे सादे सैल पर दो एक बार बात की सपनों के संसार में खो गए हम बस झट मंगनी और पट ब्याह महीना दो महीना बहुत यादगार गुजर गया वक्त पता नहीं चला फिर असली जिन्दगी से सामना हुआ मेरा तो बस धडाम से गिरी सोचा यह सब किससे साँझा करूँ ? या फिर घुट घुट के मैं यूं ही मरूं उसकी शिकायत कि माँ को मैं बिल्कुल खुश नहीं रख पा रही हूँ बहुत देर बाद समझ आया कि खुश ना रहने का दिखावा करती माँ मुझे प्रताड़ित करना फितरत ये माँ की बनता चला गया समझो बहुत कोशिश की मैंने तो दिल से मगर तीन साल में परिवार पूरा कलह का अखाडा सा बन गया मेरी माँ (सास) तीन साल हुए हैं मुझसे बोलती ही नहीं है कभी पूरा परिवार बायकाट पर उतरा ऐसे में पति देव भी अब तो छोटी छोटी बात के बहाने ही मुझ में कमियां देखने लगे हैं मेरे परिवार की विडम्बना पर मुझे रोना आता है कई बार मैंने तो लव मेरेज भी नहीं की न ही एक गौत्र कि गलती की है न ही एक गाँव में बसाया घर दहेज़ जैसा बना वैसा तो लाई मैं मैं जीन भी नहीं पहनती कभी भी नौकरी भी करती हूँ और घर भी पूरी तरह सम्भालती हूँ फिर भी यह सब क्यों हों गया बताओ तो हमारे बीच कोई लगाव न बचा बस ये लोग क्या कहेंगे हमको इस अदृश्य भय के कारण ही तो हम एक छत के नीचे जी रहे छत एक है मकान एक है पर घर नहीं है यह हमारा बंद करती हूँ यहीं पर मैं किस्सा वर्ना अब खुल जायेगा पिटारा पूरा आज का दौर नाज्जुक दौर है मैं दुखी हूँ तो पति खुश है ऐसी बात नहीं मानती हूँ मैं दुखी वे भी बहुत जानती मैं मगर क्या समाधान है इसका ? एक साल मैं अपने पीहर रही वहां भी बोझ ही समझी गयी सासरे में दूरियां और बढ़ी मेरी कई बार सोचा अलग हों जाऊं अलग होंकर क्या हांसिल होगा शायद पति के बिना नहीं रह सकती मैं अकेले अकेले कहीं पर तलाक का लोड सोच कांप जाती समझौता कर के जीने की सोची पता नहीं ठीक हूँ या गलत मैं !!! ************ 234 तीर सच्चाई के हम तीर सच्चाई के रूक रूक के चलाते हैं दीवाने हैं इसके औरों को दीवाना बनाते हैं हम रखते हैं ताल्लुक सफरिंग दुनिया से उसके तस्सवुर में हम खवाब जगाते हैं रहना होशियार उनके छलकते जामों से ये मय के बहाने से बस जहर पिलाते हैं चलना सही राहों पर रख जान हथेली पर लूटेरे है धर्म की आड़ में खूब लूट मचाते हैं साईनिंग जाल साजी रचते रचते हम पर हम हैं की अपने से दीवाने बनाना चाहते हैं ********* 233 कोई खेल रहा है कोई रो रहा है यारो कोई छा रहा है कोई खो रहा है यारो कोई ताक में है किसी को है गफ़लत कोई जागता रहा कोई सो रहा है यारो कहीँ असफलता ने बिजली गिराई कोई बीज उम्मीद के बो रहा है यारो इसी सोच में मैं तो रहता हूँ अक्सर मैं यह क्या हो रहा क्यों हो रहा है यारो ************ 232 कम उमर के बच्चे होते हैं बहोत सच्चे उमर ही ऐसी है करे ऐसी की तैसी है उलटी सीधी बात मिलें दोस्तों के हाथ हारमोन का कसूर आकर्षण का दस्तूर माँ बाप भी चुप हैं ये तो अँधेरा घुप है नासमझी नादानी नहीं सिर्फ हिन्दुस्तानी दुनिया में ऐसा होता नासमझ इसे ढोता इतने जालिम न बनो हद से आगे न तनों ******* 231 Naya beej पितृ सत्ता की ताकत हमारी नाक जरूर डबोवेगी नया बीज बोवेंगे तो ही नई फसल की खेती होवेगी हरयाणा की बुरी छवि पूरे जगत में खिंची रहेगी पुत्र लालसा जब तलक हमारी सोच मैं बची रहेगी मिलके हटे काली स्याही सरतो सुख से रोटी पोवेगी सामाजिक सुरक्षा का घटना महिला का बैरी हो गया पूरा समाज होगा जगाना पढ़ा लिखा आप्पा खो गया नहीं तो हमारी अगली पीढ़ी ये माथा पकड़ के रोवेगी महिला विरोधी रीत पुराणी छांट के निकाल बगानी होँ महिला के हक़ मैं जो भी हैं हमको वे रीत बचानी होँ महिला पुरुष बराबर होँ कमला सुख से फिर सोवेगी काम जमा आसान नहीं नया समाज सुधार चाहिए वंचित दलित महिला को यो पूरा अधिकार चाहिए रणबीर सिंह की कलम हमेशा ये सही छंद पीरोवेगी ********* 230 आज का दौर विनाशकारी कदम ताबड़ तौड़ हम पर थोंप दिए पैट्रोल के बाद डीजल के दाम नियंत्रण मुक्त किये खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से नहीं डरे देश भर में व्यापक विरोध हुआ फिर भी लागू करे लूट खसोट उत्पीडन मुनाफाखोरी पर व्यवस्था टिकी दिवालियेपन और संकट से बचने को ये नीतियाँ दिखी सुधारों की आड़ में बिगाड़ पूरे देश पर थोंपे जा रहे इनके विनाश कारी परिणाम हमारे सामने आ रहे उदारीकरण निजीकरण की नीतियाँ लागू की गयी बड़े बड़े साहूकारों को मुनाफे बढ़ने की छूट दी गयी दूसरी तरफ रोटी रोजी को तरस रहे मजदूर किसान छोटे मोटे कर्मचारी भी हो रहे इन नीतियों से परेशान खादय सुरक्षा रोटी रोजी शिक्षा स्वास्थ्य और आवास पढ़ाई महंगी इलाज महंगा बिन आयी मौत से मरते अपनी जमीं मकान बेचकर इलाज का खर्च ये भरते लाखों पढ़े लिखे योग्यता प्राप्त युवा ढूढ़ते हैं रोजगार लाखों नौकरी पद खाली रखे बैठी है हमारी सरकार अस्थायी नौकरियां देकर स्थाई नौकरियों पे लगाते आर्थिक शोषण उत्पीडन करने में बिलकुल न घबराते महिला कमजोर तबके मान सम्मान से नहीं जी पाते बलात्कार और घरेलू हिंसा कदम कदम पर हैं सताते दलित महिला सबसे ज्यादा उत्पीडन का शिकार होती दबंग लोग शामिल होते असफल गरीब की पुकार होती जातिवादी आकराम्कता को दबंग बढ़ावा दे रहे हैं देखो सामाजिक सद्भाव बिगाड़ के दबंग दरव दे रहे हैं देखो कब तक आखिर यह सब हम और आप सहते रहेंगे एक नयी जंग की शुरुआत देखो तो हो चुकी है दोस्तों जात पात से ऊपर उठ कर लड़ो जो भी दुखी है दोस्तों *********** 229 Tuesday, March 12, 2013 आज के विकास की परिभाषा असमानता और विषमता को बढ़ावा देने वाला पर्यावरण के संतुलन को ख़राब करने वाला बेरोजगारी को बढ़ावा देने वाला एक राष्ट्र को दुसरे राष्ट्र द्वारा दबाने वाला स्त्रियों को हासिये पर डालने वाला स्त्रियों की अस्मिता को खत्म करने वाला बच्चों का बड़े पैमाने पर शोषण करने वाला महिला का बड़े पैमाने पर कोमोड़ीफिकेशन करने वाला सभी को बाजार हवाले छोड़ने वाला प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करने वाला मनुष्य की मानवीय जरूरतों के आधार की बजाय मुनाफे पर आधारित उत्पादन का समर्थन करने वाला जनसँख्या के बड़े हिस्से की जीवन गुणवत्ता को ध्यान में रखकर न चलने वाला -- मसलन शिक्षा ,स्वास्थ्य व् सांस्कृतिक क्षेत्रों का धयान न रखने वाला पुरुष सत्ता का प्रतीक विकास ज्ञान विज्ञान को तकनीक में बदलकर सूचना पर कब्ज़ा करके चलने वाला विकास विज्ञानं को मानव के खिलाफ खड़ा करने वाला मनुष्य जाति को युद्धों में धकेलने वाला सामाजिक असुरक्षा पैदा करने वाला यांत्रिक ढंग से किया जा रहा विकास मूल रूप से स्त्री विरोधी , प्रकृति विरोधी विकास एक उप्भोग्तावादी अपसंस्कृति विकसित करने वाला विविधता की बजाय एकरसता की हिमायत करने वाला हिंसक और विनासकारी प्रवर्तियों को बढ़ावा देने वाला जनता के बड़े हिस्से के श्रम के शोषण पर टिका रहने वाला विज्ञानं की मरदाना अवधारणा व्याख्यायित करने वाला मनुष्य की संज्ञान क्षमताओं को घटाने वाला चीजों को उनके सन्दर्भों से काटकर देखने वाला अलगाव,गैर बराबरी व् गई भागीदारी पर आधारित वैधता की कसौटियों वाला क्षेत्रीय असमानता बढ़ने वाला ऐसे विकास से तौबा !!! ************ 228 *मोमबती के अंदर पिरोया गया* *धागा मोमबती से पूछता है.. ..* "" *जब मैं जलता हूं तो तू क्युं* *पिघलती (रोती) है ।* *मोमबती ने सुंदर जवाब* *दिया ....* *कहा कि-----* *जब किसी को दिल के अंदर* *जगह दी हो और वो ही छोड़के* *चला जाये तो रोना तो आयेगा* ही...* ********* 227 नई नवेली दुल्हन जब ससुराल में आई तो उसकी सास बोली :बींदणी कल माता के मन्दिर में चलना है। बहू ने पूछा : सासु माँ एक तो ' माँ ' जिसने मुझ जन्म दिया और एक ' आप ' हो और कोन सी माँ है ? सास बडी खुश हुई कि मेरी बहू तो बहुत सीधी है । सास ने कहा - बेटा पास के मन्दिर में दुर्गा माता है सब औरतें जायेंगी हम भी चलेंगे । सुबह होने पर दोनों एक साथ मन्दिर जाती है । आगे सास पीछे बहू । जैसे ही मन्दिर आया तो बहू ने मन्दिर में गाय की मूर्ति को देखकर कहा : माँ जी देखो ये गाय का बछड़ा दूध पी रहा है , मैं बाल्टी लाती हूँ और दूध निकालते है । सास ने अपने सिर पर हाथ पीटा कि बहू तो " पागल " है और बोली :-,बेटा ये स्टेच्यू है और ये दूध नही दे सकती। चलो आगे । मन्दिर में जैसे ही प्रवेश किया तो एक शेर की मूर्ति दिखाई दी । फिर बहू ने कहा - माँ आगे मत जाओ ये शेर खा जायेगा सास को चिंता हुई की मेरे बेटे का तो भाग्य फूट गया । और बोली - बेटा पत्थर का शेर कैसे खायेगा ? चलो अंदर चलो मन्दिर में, और सास बोली - बेटा ये माता है और इससे मांग लो , यह माता तुम्हारी मांग पूरी करेंगी । बहू ने कहा - माँ ये तो पत्थर की है ये क्या दे सकती है ? , जब पत्थर की गाय दूध नही दे सकती ? पत्थर का बछड़ा दूध पी नही सकता ? पत्थर का शेर खा नही सकता ? तो ये पत्थर की मूर्ति क्या दे सकती है ? अगर कोई दे सकती है तो आप ......... है " आप मुझे आशीर्वाद दीजिये " । तभी सास की आँखे खुली ! वो बहू पढ़ी लिखी थी, तार्किक थी, जागरूक थी , तर्क और विवेक के सहारे बहु ने सास को जाग्रत कर दिया ! अगर मानवता की प्राप्ति करनी है तो पहले असहायों , जरुरतमंदों , गरीबो की सेवा करो परिवार , समाज में लोगो की मदद करे । "अंधविश्वास और पाखण्ड को हटाना ही मानव सेवा है " । बाकी मंदिर , मस्जिद , गुरुद्वारे, चर्च तो मानसिक गुलामी के केंद्र हैं ना कि ईश्वर प्राप्ति के ........ मानव का सफर पत्थर से शुरु हुआ था। पत्थरों को ही महत्व देता है और आज पत्थर ही बन कर रह गया -

Wednesday, June 26, 2024

साक्षरता आंदोलन के नारे

16 खेती करो चाहे मजदूरी पढ़ाई लिखाई सबसे जरूरी 17 पढ़ो लिखो खुद को पहचानो जाग उठो मजदूर किसानो 18 पढ़ने में कोई शर्म नहीं पढ़ने की कोई उम्र नहीं 19 बच्चा बुढ़ा और जवान पढ़ा लिखा हो हर इंसान 20 भूख गरीबी नहीं मिटेगी जब तक जनता नहीं पढेगी 21 खुशहाली खात्तर लड़ां लड़ाई अनपढ़ सारे करां पढ़ाई 22 गांम-गांम मैं समिति आई पढ़ ल्यो चाची पढ़ ल्यो ताई 23 ज्ञान विज्ञान में आना होगा बिना पढ़े पछताना होगा 24 नर नारी की ये आवाज पढ़ा लिखा हो आज समाज 25 व्यापार नौकरी लिया करो दुकान सबसे पहले अक्षर ज्ञान 26 आओ मिलकर पढ़े पढ़ाएं अपने ज्ञान को और बढ़ाएं 27 आधी बाजी जीत चुके अब बाकी बाजी जीतेंगे 25 मिटे गरीबी और अज्ञान पढ़ा लिखा हो हर इंसान 29 जरा सी पढ़ाई ढेर सी भलाई 30 जगह देश की क्या पहचान पढ़ा लिखा मजदूर किसान

Tuesday, June 25, 2024

203 से 226

226 राज दरबारी क्या कहते सुनते हैं यारो पेट की खात्तर बेचारे झूठ गाते हैं सच कहना गर बगावत तो हम बागी हैं दिल दुखता जब नाकारे लूट मचाते हैं अमीर गरीब की बढ़ा खाई समता लाएंगे झूठ के एक दिन ये शिकारे डूब जाते हैं ******** 225 छक्का हिंदुस्तान जलन लागरया बूझा लियो मिल करकै रै आंख मींच कै क्यूँ बैठे थाम बजर का दिल करकै रै आजादी रूपी फूल मुर्झाग्या जो आया था खिल करकै रै देश का किसान फांसी तोड़या किसनै मुश्किल करकै रै साम्प्रदायिकता चढ़ती आवै नफरत के या बिल करकै रै अडानी और अम्बानी नै धरया देश आज छिल करकै रै *********** 224 पेट मैं छाला गुड़ का राला खर्च कुढ़ाला दुख देज्या आंख मैं जाला भीत मैं आला दिल मैं काला दुख देज्या पोह का पाला खेत रिहाला कपटी रूखाला दुख देज्या ********* 223 मेरा कसूर हमने दोनो ने मिलकर सोचा जिन्दगी का सफ़र तय करेंगे बहुत सुन्दर सपने संजोये थे प्रेम का पता नहीं ये हरयाणा क्यों पुश्तैनी दुश्मन बन गया यह सब मालूम था हमको पर प्यार की राहों पर बढ़ते गए मेरे परिवार वाले खुश नहीं थे क्यों मुझे पता नहीं चला है न तो मैंने एक गोत्र में की है न ही एक गाँव में शादी मेरी न ही दूसरी जात में की मैंने तो भी सब के मुंह आज तक फुले हुए हैं हम दोनों से देखो प्यार किया समझा फिर शादी ससुराल वाले भी खुश नहीं हैं शायद मन पसंद गुलाम नहीं मिल सकी जो रोजाना उनके पैर छूती पैर की जूती बनकर सुघड़ सी बहु का ख़िताब लेती दहेज़ ढेर सारा लाकर देती ना प्यार का खुमार काम हुआ अब जनाब की मांगें एकतरफा बढ़ी मैं सोचती हूँ नितांत अकेली अब क्या हमारा समाज दो प्रेमियों के रहने के लायक बन पाया यहाँ चाहे कुछ हो हम लोड उठाएंगे मगर घुटने नहीं टिकाएंगे यारो वो सुबह कभी तो आयेगी की इंतजार में ये संघर्ष जारी रखेंगे झेलेंगे इस बर्बर समाज के सभी नुकीले जहरीले तीर छाती पर ही जिद हमारी शायद यही है कसूर ********* 222 हमारी बर्बादी हमें बर्बाद करके उनको पता नहीं क्या मिल गया ईमानदारी का दामन थामा हमारा निवाला छिन गया आदमी से आदमी की मोहब्बत कहाँ काफूर हो गयी मेहनत हमने की मगर पता नहीं कहाँ ये खो गयी दर्द हद से गुजर गया है सीना हमारा तो छिल गया मोहब्बत के गीत गाएँ कैसे चिंता हमें बीमारी की यकीं कौन करेगा इस पर मोहब्ब्त गरीब भिखारी की देख के उनके ढंग निराले मुंह हमारा है सिल गया मरने वाले हथियार लिए बैठे साधा निशाना हम पर मार न पाना मजबूरी उनकी टिका जमाना हम पर हमारे वजूद का तस्सवुर कीचड में गुलाब खिल गया तूफ़ान जो उठा समुन्द्र में अब नहीं टाला जायेगा पड़ाव अब ये हमारा मंजिल पर ही डाला जायेगा भगवन का आसरा किया पर भरोसा सारा हिल गया आर पार की जंग शुरू करना होगा स्वीकार हमें फूंक फूंक के चलना है रहना होगा होशियार हमें देख देख जुल्म उनके कलेजा हमारा छिल गया मानवता का औढ़ा मुखोटा लिया धर्म का सहारा है जात पात का जहर फैलाया निचौड़ा खून हमारा है रणबीर आज रो उठा हो छलनी उसका दिल गया ********** 221 आंधी चल रही ये नहीं थमीं यारो रात की गर्द मेरे चेहरे पे जमीं यारो कुछ ठूंठ खड़े हैं कहीं कहीं मेरे जैसे कुछ उखड़े पड़े हैं कहीं तुम्हारे जैसे हम सब बचें हैं इसके थपेड़े खाकर तुम बैठ गये अपने महलों में जाकर यह आंधी आज किसे साल रही देखो झोंपड़ी इधर उधर उछाल रही देखो धर्म की आँधी चलने ही वाली यारो क्या गुल खिलेंगे उजड़ेगा माली यारो ******** 220 Please React इस बेवफा सिस्टम से वफ़ा मांग रहे हैं | हमें क्या मालूम है हम खता मांग रहे हैं | ये क़िस्मत का खेल रचाया है इसी ने तो--- इसी से हम क़िस्मत क़ि दुआ मांग रहे हैं| पूरा सच छिपा ये आधा सच बताते हमको -- जहर घोला उसीसे साफ हवा मांग रहे है| रोजाना जो खेलता हमारे जज्बात के साथ-- सुख क़ि राही का उससे पाता मांग रहे हैं |-- सुरग क़ि कामना में छिपी हुयी रणबीर-- अपने खुद क़ि ही हम चिता मांग रहे हैं | ********* 219 SUN JARA AUR KAH JARA किसी पर भी तूं एतबार न कर| भावुकता में बर्बाद घरबार न कर| बात हैं बात का भरोसा क्या है -- जाँ किसी पर निस्सार न कर| अमीर क़ि नजरें जाँ लेलेंगी-- इनसे कभी कोई करार न कर| बेवफा से वफ़ा नहीं होती है -- जाने दे दिल को बेक़रार न कर | अमीर गरीब क़ि दुनिया है यह -- झूठे वायदे हैं स्वीकार न कर | रणबीर एक दिन टूट जायेगा-- ख्वाब है ख्वाब से प्यार न कर | ********* 218 पूजा पूजा अपने आप में खोयी लेकिन बिल्कुल सुलझी हुई शक्शियत ! जो भी उससे मिलता उसकी सादगी और आत्मितीयत्ता से प्रभावित हुए बिना न रहता | हर किसी की मदद के लिए हर समय तैयार विचारों से परिपक्व दिल से इमानदार और सच्ची जिन्दगी भर समाज और दुनिया को बदलने में लगी एक अनोखी लड़की पूजा !! ********* 217 आज का दौर *** एक कविता के माध्यम से ** दुनिया की क्या हालत हो गई बाजार चारों ओर छाया।। भैंस बंधी है घर घर में पर दूध ढोलों के अंदर पाया।। 1 दूध बेच भैंसों का लोग गांव के करते हैं आज गुजारे लुप्त हो गए घरों से आज घी के जो हुआ करते बारे थोड़ा साँस आया करता आज घूटन मानते हैं सारे महिलाओं के अनीमिया ने फिर से जोर के डंक मारे बाजरे की खिचड़ी गौजी का आज जोड़ा तोड़ बगाया।। 2 पहले भाई चारा था छोरे बहू लेने आया करते जिब रोटी जिम्मन बैठते खांड बूरा खाया करते पड़ौसी दूध के बखौरे बटेऊ वास्ते ल्याया करते दूजे का बटेऊ पड़ौसी आंखों पे बिठाया करते बैठे रहते फूंक बुढ़िया सी अब अपना ही बटेऊ ना भाया।। 3 आबो हवा मैं जहर घुला कीटनाशक छागये हैं युवा के नर्वस सिस्टम पे दोष गुस्से का लागये हैं पेट को पकड़े घूम रहे डॉक्टर भी हाथ ठागये हैं हमारी कष्ट कमाई को ये अमीर क्यों खागये हैं टैस्ट क्यों नहीं होते मैडीकल मैं नहीं किसी ने कष्ट उठाया।। 4 किलो दूध मिले पचास का उसमें आधा पानी पावे महंगाई के क्या कहने कोई क्या खाएं क्या नहीं खावे कुपोषण बालकों में आज दिन दिन क्यों बढ़ता जावे बाजार व्यवस्था दोषी है पर दोष क्यों कोई नहीं लावे राम की इच्छा कैहकर रणबीर हमारा क्यों मोर नचाया।। ********** 216 हमारा हरियाणा दो तरह से आज दुनिया में छाया है।। आर्थिक उन्नति बहुत की पर लिंग अनुपात ने खाया है।। 1 छांट के मारते लड़की पेट में समाज के नर नारी समाज अपने कसूर की मां के लगावे जिम्मेदारी जनता हुई है हत्यारी पुत्र लालसा ने ही राज जमाया है ।। 2 औरत औरत की दुश्मन है जुमला बहुत चलता आदमी आदमी का दुश्मन समाज को न खलता समाज ढांचा इसपे पलता यह हरियाणा बदनाम कराया है।। 3 वंश की पुरानी परंपरा पुत्र को चिराग बताते हैं लड़का जरूरी होना चाहिए लड़की को मराते हैं जुल्म रोजाना बढ़ते जाते हैं सुनकर के कांपती काया है।। 4 अफरा तफरी फैली महिला कहीं महफूज नहीं जो पेट से बच गई है उनकी समाज में बूझ नहीं आती हमको क्यों सूझ नहीं रणबीर सिंह बहुत घबराया है।। **************/ 215 दो हजार तेरा का आधा बरस बीत गया सुधार कहाँ मंहगायी का दानव जीत गया भारत की अर्थ व्यवस्था चली गयी खाई मैं विकास दर बीते दस साल की नीची इकाई मैं औद्योगिक विकास दर की क्या बात बताऊं पिछ्ले बीस साल में सबसे नीचे गई दिखाऊँ बजट घाटा हमारी आज की चुनौती बड़ी है मोदी के बसकी नहीं आई सी यू में पड़ी है राजनीति दिशाभ्रम इसका कारण हैं बताते पूंजीवादी विकास दोषी ये बात क्यों छिपाते ********* 214 ढाई लाख किसान देश के पाछले दिनों मैं फांसी खागे एफ डी आई तैं छोटे दुकानदारों के बुरे दिन आगे आर्थिक सुधारों के ना पै कार्पोरेट सैकटर छाया अंबानी अदाणी टाटा बिड़ला देश के चौखा चूना लाया सरकार कारपोरेट की बांदी ये गरीब घने दुख पागे नब्बे के दशक तैं देश मैं लागू ये सुधार हुए देखो ये भूख बीमारी बधगी घने बेरोजगार हुए देखो आवारा पूंजी उधम मचाया ये काले धन आले छागे | विश्व बैंक ड्ब्ल्यू टी ओ आई एम एफ नकेल थामरे तीसरी दुनिया के देशों के ये कसूती लगाम घालरे ये म्हारी घी घी बांध रहे विकसित देश फयदा ठागे| मन मोहन जी मोह लिए बिल्कुल नहीं समझ रहे इन आर्थिक सुधारों मैं क्यों और भी घने उलझ रहे ये आर्थिक सुधार तो सबकै चपत घनी कसूती लागे| ********* 213 अभी बहुत कुच्छ बाकी है इस तुम्हारी खुश्क दुनिया में हमारी मेहनत हमारी सच्चाई हमारी इंसानियत हमारी कुर्बानी हमारी मोहब्बत हमारी शर्मो लिहाज हमारी भूख मरी -------------- -------------- लंबी फहरिश्त है इस दुनिया को तबाह नहीं होने देंगे रणबीर ******** 212 साइनिंग इंडिया सफरिंग इंडिया अंतर आज बढ़ता जाता है।। कैसे पाटें इस अंतर को नहीं कोई हमको आज समझाता है।। 1 ये शाइनिंग इंडिया बहोत ज्यादा आगे जा लिया बताऊँ गुड़गामा नया और पुराना देखलो नहीं मैं झूठ भकाऊं नए और पुराने का अंतर क्यों ना जनता को उलझाता है।। 2 पुराने ढांचों से जन बहुत दुखी हो लिए हिंदुस्तान के कई पुरानी सोच ये ओछी जूती काटें पैर मजदूर किसान के नए ढांचे नहीं मिटा पा रहे ये भ्रष्टाचार घूमे दनदनाता है।। 3 इन हाल में नई इबारत जनता लिखनी चाहती जरूर जात पात से ऊपर उठ चाहवे भ्रष्टाचार मिटाती जरूर लड़ाई लम्बी संघर्ष मांगती समों जन को समझ आता है।। 4 सिस्टम एक रात में बदले एसा इतिहास ना टोहया पाए सिर धड़ की कुर्बानी मांगे जब खून खरोंच इसको आए जनता का दिल अंतर कम करने को पूरी तरह चाहता है।। 5 बहोत सी उपलब्धियां अब पूरे साल ये गिनाई जाएंगी पर नाकामियां इतनी ज्यादा हैं बिल्कुल न छिप पाएंगी आने वाले समय में मुझे जो दिखे आम जन ना देख पाता है।। 6 फासिज्म नए ब्रांड का आज हमारे सिर पै आ खड़ा भाई तरल पूंजी ने डिजाइन पूंजी से भर दिया है ये घड़ा भाई रणबीर पड़े जूझणा कट्ठे होकर के ये सही छंद बनाता है।। ******** 211 साइनिंग इंडिया सफरिंग इंडिया ये महज शब्दों का खेल नहीं है ये हैं दो दुनिया इसी जमीन पर एक तरफ एयर कंडीशन्ड कोठी उधर बरसात में टपकती झोंपड़ी करोड़ों के को वह भी नहीं नसीब एक तरफ एयर कंडीशन्ड कारें हैं उधर कई कोश नँगे पांव चलना है एयर कंडीशन्ड पांच सितारा होटल उधर दो रुपये की चाय का ढाबा है एयर कंडीशन्ड अपोलो फोर्टिस हैं उधर बिना दवाई के सीएचसी हैं एयर कंडीशन्ड मॉल सब मिलता उधर खुदरा छोटी छोटी दुकानें हैं एयर कंडीशन्ड स्कूल आलिसान उधर बिना पंखे के कमरे के स्कूल एक तरफ ऐयासी की दुनिया छाई दूसरी तरफ मेहनत से फुरसत नहीं दोरंगी दुनिया नजर नहीं आती हमें इस अंधेपन को क्या कहूँ?शब्द नहीं आपके पास हैं तो इंतजार इनबॉक्स में रणबीर 15.03.08 ******** 210 बढ़ रहे मीलों के फासले हमारा प्यार नहीं कम होगा लोंग डिस्टेंस रिलेशनशिप को निभाने का दम होगा जरूरी पक्ष है इसका आपसे में बातचीत करते रहना इसका मतलब यह नहीं चौबीस घंटे ही खपते रहना समय-समय पर बात करना ही ये सही कदम होगा बात करते समय भविष्य या रिश्तों की बात नहीं जरूरी सकारात्मक मुद्दों पर बात कम करती है हमारी गरूरी विवाद की बातचीत का फिर नहीं हमारा मन होगा उनकी सुने अपनी सुनाऐं अनदेखी ठीक नहीं होती अनदेखी खटास लाती है आपस का विश्वास खोती इसलिए जीवनसाथी की बात पर जरूर चलन होगा रिश्ते पासके या दूरके नींव आपस का भरोसा बताया मिलने का प्रयास रहे जब भी मिलने का मौका पाया प्यार और सम्मान रिश्ते में खूबसूरत ये चमन होगा ********** 209 राखी का त्यौहार मन में उल्टा सवाल उठाता यारो ना बराबरी का मसला लगता कहीं ये छिपाता यारो करवा चौथ रख कर महिला लम्बी उम्र मांगती है रक्षा करवाने को आपकी कलाई पर राखी बांधती है कितना इमोशनल ब्लैक मेल सवाल उठाते डरता हूँ मन में उठे सवाल पूछने की न मैं हिम्मत रखता हूँ महिला का शोषण है इस जगह से सोच कर देखो पुरुष प्रधान व्यवस्था को यारो खोल कर तो देखो ********* 208 यही रफ़्तार रही ज़माने की ताऊ तो इंसानों की जगह होंगे ये हाऊ खुदगर्जी चुगलखोरी खुसामद की मौज होगी हर चीज यहाँ बिकाऊ अमेरिका और कोर्पोरेट छाया देखो भारत बनाया इन्होंने बैल हिलाऊ ******** 207 गरीब परिंदा उड़ान में है तीर अमीर की कमान में है है डराने को मारने को नहीं मरा तो अमीर नुकसान में है जिन्दा रख कर लहू चूसना अमीरों के दीन ईमान में है खौफ ही खौफ है जागते सोते लूट हर खेत खलिहान में है मरने न देंगे न जीने देंगे साजिश पूंजी महान में है ******** 206 आम जनता के लिए बेरोजगारी है घरों से बेदखली है बड़े पैमाने पर समाज कल्याण के प्रावधानों में कटौतियां बखूबी से जारी यारो सरकारी खजाने की कीमत पर बैंकों और वितीय कम्पनियों को फिर बड़ा मुनाफा बटोरने का ये मौका मिल रहा है भारत देश में मेहनतकश की कीमत पर ही तो मग़र कब तक एक दिन हिस्साब तो माँगा जायेगा पाई पाई का ******* 205 बड़ी मुश्किल से ये आंसू छिपाए हमने हँसना चाहा झूठे ठहाके लगाये हमने तुमको मालूम ये शायद हो के ना हो तुम्हारे जाने के बाद आंसू बहाए हमने प्यार किया हमने नहीं छुपाया कभी दिल के तराने थे तुमको सुनाये हमने तेरे साथ इन्कलाब के जो नारे लगाये यारो अब तलक नहीं हैं भुलाये हमने राह में साथ छोड़ गये अफ़सोस तो है पल याद हैं वो जो संग बिताये हमने जानते हैं आप हमें नहीं भूल सकेंगे एक अनुभव बस बिंदु दिखाए हमने हादसा नहीं एक सच्चाई है ये प्यार अफ़सोस है क्यों ये रास्ते भुलाये तुमने ************* 204 किसानों मजदूर का संघर्ष तेज करने का समय आया।। दूसरे कमेरे तबके साथ ले चाहिए देश में बिगुल बजाया ।। इस पार्टी उस पार्टी का नहीं ये मामला कहते हैं कॉरपोरेट सांप्रदायिकता की मार हम सहते हैं सिस्टम का मालिक कॉरपोरेट यह लुटेरा असल बताया ।। शिक्षा बेची स्वास्थ्य बेचा सब कुछ बेच रहे आज निजीकरण की लहर फैलाई झूठ को सच कहे आज आमजन के जीवन पर संकट आज गहरा है छाया ।। अमेरिका से दोस्ती देश की मीडिया पूरा उछाल रहा असल मातहेती अमेरिका की छुपाने का कर कमाल रहा बातों बातों में देश को आज आसमान पर देखो पहुंचाया।। बहु विविधता देश हमारे की पूरी दुनिया करे बड़ाई एक देश एक पहचान इस पर छेड़ी रणबीर क्यों लड़ाई बहु विविधता हार नहीं मानेगी संघर्ष का बिगुल बजाया।। ********* 203 हरेक चीज आज देखो आनलाइन मिल जाती है बाजार की छोटी दुकानो को जम्हाई दिलाती है कूरियर की सेवा मध्यमवर्ग को आज भाती है गरीब जनता ही अब छोटी दुकानो पे आती है सिले सिलाए कपड़ों की दुकान आज ये छाती है खेती में ट्रैक्टर की कमाई किसान को खाती है बिहारी मजदूरों की लाइन चौराहों पर पाती है पार्कों में महिलाओं की टोली बैठी गीत गाती है घंटों टीवी देखने की चाहत बच्चों को भरमाती है बदल रहा शहर और गांव कंपकंपी सी आती है

Thursday, June 20, 2024

189 से 202

202 कैसे जांचें कैसे जांचें कि कौन अच्छा है क्या सिस्टम खस्ता है ॥ सबकी अपनी अपनी ढपली विकास का वही रस्ता है ॥ जनता के बल पर ऊँचाई पाने वाले हरेक बादल को मौसम रूख बदले तो फिर पानी पानी होना पड़ता है ॥ जनता का विश्वास बार बार टूटता है यहाँ पर फिर से कमाल की बात है कि यह बार बार से देखो उठता है ॥ आंधी आती है बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं यहाँ पे यारो कई बार पत्ता भी हिलता है तो दिल कांपने लगता है ॥ मेरे अंदर एक मुखालिफ था जो मुझसे भी लड़ता था अब या तो वह चुप ही रहता है या हाँ में हाँ करता है ॥ जनता ने इतिहास रचे हैं वो ये जानते हैं बखूबी ये इसीलिए हमको वो बरगलाने का प्रपंच रचता है ॥ ************/ 201 आज के राज में महिलाओं के खिलाफ अपराध बढती जा रही राष्ट्रीय अपराध रिपोर्ट ब्यूरो(एनसीआरबी) ये हमको बता रही दो हजार चोदा में यह अपराध दर 52.5 प्रति लाख दिखा रही । 2021 तक बढ़ कर 64.5 प्रति लाख पर यह दर जा रही । 2021 तक, दैनिक बलात्कार की संख्या भी बताई देखो यह संख्या प्रतिदिन 90 बलात्कार से ऊपर है दिखाई देखो 2017 में अपराध के 315215 से अधिक संख्य जताई देखो 2022 में यह बढ़कर 365300 से अधिक पहुंचाई देखो ************ 200 ये कमरसियेलाइजेशन देखो तेज रफ़्तार से आया पुराने की सड़ांध ने आज नई सड़ांध से हाथ मिलाया पुराने कबीलाई रिश्ते नाते आज भी हम पे हावी देखो नैतिकता को पढने बिठाया मद मस्त पीढ़ी भावी देखो ऑनर किल्लिंग की चारों तरफ पड़ रही काली छाया || फ्री लौंस यौनिक सम्बन्ध आज इस समाज में छाये रहे लीलो चमन के प्यार को ये अँधा प्यार बतलाये रहे आज यहाँ तो काल वहां बस घुमंतू जीवन अपनाया || पैसा पैसा और साथ में बदनाम मुन्नी यहाँ मशहूर हुयी दो दो पैसे को मोहताज भुखमरी यहाँ का दस्तूर हुयी शीला को बीच बाजार में है अधनंगी करके नचवाया || दोनों सड़ांध के मेल से अधखबड़ा इन्सान बना दिया सिविक समाज सभ्य समाज सपना कहके भका दिया रणबीर देख के सड़ांध मानव बहुत ज्यादा घबराया || ********* 199 कुछ नए बन रहे कुछ पुराने बने हर कदम पर यहाँ कैदखाने बने किस तरफ से चली गोलियां क्या पता किन्तु हर बार हम ही निशाने बने था क्या हमने सोचा ये क्या हो गया हमें क्यों इस चमन से गिला हो गया दिया जिसकी खातिर था हमने लहू वही मौसमें गुल क्यों खफा हो गया ******* 198 मारें जाओ धोक पत्थरों की गरीबी दूर नहीं होवे नाबराबरी और बढ़ेगी किसान जोर जोर से रोवे शिक्षा और स्वास्थ्य का भार अपनी जेब से ढोवे सरहद ऊपर जवान फौजी ज्यान यो अपनी खोवै ******** 197 पता है सामने वाला बहुत अत्याचारी है पूरी दुनिया में लूट की ये कमाई भारी है अभी संकट के दिन और बढ़ेंगे दुनिया में फिर भी संघर्ष की ये जंग जारी हमारी है *********** 196 हमारे शरीरों पर कपड़े कम से कमतर होते जा रहे हैं फिर चाहे कोई बिना कपड़े नंगा घूम रहा है तो हमारी बला से एटम बम है हमारे पास मिसाइल है दूर मार की अच्छी खासी फौज है हमारे पास फिर चाहे सामाजिक असुरक्षा बढ़ती है तो हमारी बला से पांच सितारा अस्पताल हैं सुहाने भारत देश में मैडिकल टूरिज्म फल फूल रहा है फिर चाहे लोग बिना इलाज के मरते हैं तो मरें प्लेग फैलता है तो फैले एडस दनदनाता है तो दनदनाए वेश्यावृत्ति बढ़ती है तो बड़े हमारी बला से आर्थिक स्तर पर गोवा के बाद है हरियाणा ' सेक बिछाई जा रही है तेजी से फिर चाहे लिंगानुपात में सबसे नीचे है तो क्या हमारी बला से कुछ हथियार और हों कुछ पैसा और हो गौ रक्षा हमारा धर्म है फिर शायद दलितों के घर जलाएं जाते हैं तो क्या मनुष्य मरते हैं तो मरते रहे हमारी बला से हम 2020 तक दुनिया की महाशक्ति बन सकते हैं विकास की कीमत तो अदा करनी ही पड़ेगी ऑडियोलोजी का जमाना गया क्वालिटी जीवन का जमाना आया है हमने तरक्की की है किस कीमत पर हमारी बला से कुछ साल पहले की रचना ********** 195 आज बाजार व्यवस्था की चारों तरफ गूंज बताते हैं हीरो विलेन और विलेन ये हीरो कैसे यह बन जाते हैं एंटी हीरो एंग्री हीरो का जमाना खत्म हुआ जताते हैं अब तो हीरो विलेन बन गया ऐसा फिल्मी सीरियल दिखाते हैं कल तक जो राम थे यहां रावण बनकर इतराते हैं भीतर से रावण बन गए मुखौटा राम का लगाते हैं हम भी रावण की कर पूजा दिवाली हर साल मनाते हैं। ******** 194 अब सीख लिया तुमसे मैंने नया तराना सीख लिया औरों के कन्धों पर रख के बन्दूक चलाना सीख लिया सच को झूठ झूठ को सच तुरंत बनाना सीख लिया अपनी ही तस्वीर से मैंने तो ऑंखें चुराना सीख लिया अब सीख लिया तुमसे मैंने नया तराना सीख लिया || पैसे के दम पे दुनिया में अब इठलाना सीख लिया धर्म के नाम पर जनता को खूब लड़ना सीख लिया अब सीख लिया तुमसे मैंने नया तराना सीख लिया || भूल कर गाम अपना झूठे सपने सजाना सीख लिया जीणा है तो भूलो अपने को नया फ़साना सीख लिया अब सीख लिया तुमसे मैंने नया तराना सीख लिया || सब कुछ दांव पर लगाकर पैसा कमाना सीख लिया जैसा मौसम हो मैंने वैसा बजा बजाना सीख लिया अब सीख लिया तुमसे मैंने नया तराना सीख लिया || ********* 193 शराब नहीं पीते तो क्यों इस संसार में आए तुम।। तुमने छेड़छाड़ भी न की तो क्यों न पछताए तुम ।। मारो खाओ हाथ ना आओ जीवन का दर्शन यही इस दस्तूर को दोस्त मेरे क्यों ना निभा पाए तुम।। चोरी जारी नहीं करना सीखा तो क्या खाक जवानी जेल की सजा नहीं काटी ना शाहिद भी कहलाए तुम।। दो-तीन लड़कियां नहीं भकाई रहे कोरे के कोरे क्यों समय से पीछे क्यों रहे ना अखबारों में ही छाए तुम।। एचआईवी एडस से क्यों वंचित रहे घूम रहे तुम संवेदनशील मानव को फिरते गले लगाए तुम।। ********* 192 AGLA PICHHLA अगला पिछला और वर्तमान ना इस जन्म में झूठ बोला ना कभी दुकान पे कम तोला फिर भी भगवान नाराज हुए हार्ट अटैक मुश्किल इलाज हुए मैंने सोचा मुझे क्यों कष्ट मिला मिला बताया पिछले का सिला वर्तमान का कब होगा हिस्साब अगले में मिलेगा इसका जवाब पिछला ना कभी समझ आया ना अगले बारे ही जान पाया आज की बाबत नहीं बताते वो अगले पिछले में फँसाते हैं वो दम मारो दम मिट जाएँ गम देवी देवता हमारे इनके हैं हम सवाल उठाने वाले कौन हो तम ? ******** 191 मेरा कस्सूर मेरा कसूर हमने दोनो ने मिलकर सोचा जिन्दगी का सफ़र तय करेंगे बहुत सुन्दर सपने संजोये थे प्रेम का पता नहीं ये हरयाणा क्यों पुश्तैनी दुश्मन बन गया यह सब मालूम था हमको पर प्यार की राहों पर बढ़ते गए मेरे परिवार वाले खुश नहीं थे क्यों मुझे पता नहीं चला है न तो मैंने एक गोत्र में की है न ही एक गाँव में शादी मेरी न ही दूसरी जात में की मैंने तो भी सब के मुंह आज तक फुले हुए हैं हम दोनों से देखो प्यार किया समझा फिर शादी ससुराल वाले भी खुश नहीं हैं शायद मन पसंद गुलाम नहीं मिल सकी जो रोजाना उनके पैर छूती पैर की जूती बनकर सुघड़ सी बहु का ख़िताब लेती दहेज़ ढेर सारा लाकर देती ना प्यार का खुमार काम हुआ अब जनाब की मांगें एकतरफा बढ़ी मैं सोचती हूँ नितांत अकेली अब क्या हमारा समाज दो प्रेमियों के रहने के लायक बन पाया यहाँ \ चाहे कुछ हो हम लोड उठाएंगे मगर घुटने नहीं टिकाएंगे यारो वो सुबह कभी तो आयेगी की इंतजार में ये संघर्ष जारी रखेंगे झेलेंगे इस बर्बर समाज के सभी नुकीले जहरीले तीर छाती पर ही जिद हमारी शायद यही है कसूर ********* 190 जिंदगी से महज मशीन बनी देखी जा सकती है औरत घर के अंदर और बाहर भी दबती देखी जा सकती है औरत विज्ञान ने बहुत कुछ दिया खुले हाथ है जमाने को भारत में हर रोज ही मरती देखी जा सकती है औरत गाड़ी के दो पहिए कहते औरत और मर्द दुनिया के दोनों को ही ढोती रहती देखी जा सकती है औरत दोनों ही सजाते हैं महल मगर जब ढह जाता है तब निशाना सिर्फ ये बनती देखी जा सकती है औरत कोई बदलाव नहीं मुमकिन एक पहिया की गाड़ी से चीख चीख कर क्यों कहती देखी जा सकती है औरत जमाना भी बहरा हो गया कभी सुनता ही नहीं है सुनाते सुनाते ही बस थकती देखी जा सकती है औरत जब भी समाज बदला है वह औरत की बदौलत ही पता नहीं क्यों पीछे रहती देखी जा सकती है औरत मर्द का करिश्मा देखो औरत है औरत की दुश्मन सास बहू में ये बंटती देखी जा सकती है औरत भाग्य कभी तो बदलेगा इसी उम्मीद पर जीती है ता उमर भगवान को पूकती देखी जा सकती है औरत ******** 189 कैसे जांचें कैसे जांचें कि कौन अच्छा है क्या सिस्टम खस्ता है ॥ सबकी अपनी अपनी ढपली विकास का वही रस्ता है ॥ जनता के बल पर ऊँचाई पाने वाले हरेक बादल को मौसम रूख बदले तो फिर पानी पानी होना पड़ता है ॥ जनता का विश्वास बार बार टूटता है यहाँ पर फिर से कमाल की बात है कि यह बार बार से देखो उठता है ॥ आंधी आती है बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं यहाँ पे यारो कई बार पत्ता भी हिलता है तो दिल कांपने लगता है ॥ मेरे अंदर एक मुखालिफ था जो मुझसे भी लड़ता था अब या तो वह चुप ही रहता है या हाँ में हाँ करता है ॥ जनता ने इतिहास रचे हैं वो ये जानते हैं बखूबी ये इसीलिए हमको वो बरगलाने का प्रपंच रचता है ॥

Friday, June 14, 2024

176 से 188

189 कैसे जांचें कैसे जांचें कि कौन अच्छा है क्या सिस्टम खस्ता है ॥ सबकी अपनी अपनी ढपली विकास का वही रस्ता है ॥ जनता के बल पर ऊँचाई पाने वाले हरेक बादल को मौसम रूख बदले तो फिर पानी पानी होना पड़ता है ॥ जनता का विश्वास बार बार टूटता है यहाँ पर फिर से कमाल की बात है कि यह बार बार से देखो उठता है ॥ आंधी आती है बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं यहाँ पे यारो कई बार पत्ता भी हिलता है तो दिल कांपने लगता है ॥ मेरे अंदर एक मुखालिफ था जो मुझसे भी लड़ता था अब या तो वह चुप ही रहता है या हाँ में हाँ करता है ॥ जनता ने इतिहास रचे हैं वो ये जानते हैं बखूबी ये इसीलिए हमको वो बरगलाने का प्रपंच रचता है ॥ ********* 188 एक घटना को दिमाग ने झकझोर दिया गाँव के ही दो लूंगाडों ने मुझे अँधेरे में जब घेर लिया, अपनी हवस मिटाकर मेरे जीवन में तो अंधेर किया। किसको बताऊँ दुःख अपना कौन सुनेगा मेरी बात, दबंग घरों के दीपक वे तो भला मेरी क्या औकात । गाँव के किसी पंचायती ने नहीं सुनी मेरी अरदास, गुर्गे हैं दोनों ये लूँगाडे गाँव के पंचायतियों के ख़ास। कहते घूमें मिट्टी डालो गाँव की इज़्ज़त उछल रही, एक हाथ कहाँ ताली बजे लड़की भी फिसल रही। वहशी छा गए चारों तरफ बचे आज इंसान कहाँ, भोग की वस्तु मानी औरत अलग है पहचान कहाँ। ******** 187 चोर जार नशेबाज जुआरी चोर जार नशेबाज जुआरी बढ़ते जावैं समाज मैं ॥ इनकी लिखूं कहानी सुणो अपणे ही अंदाज मैं ॥ पहले बात करू चोर की हाथ सफाई दिखावैं ये घने चोर तो ताला तोड़ लें दुष्ट कमाँ कै नहीं खावैं ये घिटी मैं गूंठा देकै मारदें घर साफ़ कर ले ज्यावै ये राह चलती महिला की चेन दो मिनट मैं झपटावें ये चोर बी के करैं और कोए नौकरी ना इस राज मैं ॥ जार आदमी दुष्ट घना पर नारी पै नीत धरै सै रै कुकर्म करता हाँडै वो उसका पेट नहीं भरै सै रै पकड़या जा जब जूत लगैं जूतां तैं बस डरै सै रै नालियां मैं मुंह मारता एक दिन बेमौत मरै सै रै पहर धोले लत्ते यो घूमै दुनिया हवाई जहाज मैं ॥ नशे बाज का के कहना रोज नशा करना उसनै तर तर तर जुबान चलै किसे तैं ना डरना उसनै सुल्फा गान्झा भांग धतूरा पी डूब मरना उसनै अगल बगल मैं झाँकै फेर पाप घड़ा भरना उसनै नशा उतर ज्या तो कहै सुधरना चाहूँ कर इलाज मैं ॥ चोर जार नशेबाज जुआरी सब तैं मानस बताये औढ़न पहरण नहान खान तैं ये बालक तरसाये घाघरे टूम तक ना बक्शी चोरी कर नशे चढ़ाये गाम मैं आतंक फैलाया सरीफ मानस घबराये रणबीर समझाया चाहवै समाज सुधर की खाज मैं ********* 186 कार्बन से पैदा हुए और मर कर कार्बन बन जाना है । अंतहीन है यह कहानी जिसका कोई छोर नहीं है। ******** 185 एक लड़की ने साहस किया और आवाज उठाई बदतमीज गुरु जी ने अपनी बदनीयत दिखाई कुछ लडकीयों ने साहस किया और भीड़ गयी गुरु जी की सरेआम की सबने मिल कर पिटाई केस दर्ज होने जा रहा था उस गुरु के खिलाफ लड़की के बाप ने बीच में आकर के खेल रचाई पैसे लेकर केस बिगड़ दिया गुरु छुट गया साफ़ यह कहानी नही हकीकत है आप तक पहुंचाई कहाँ जा रहे हैं हम समझ नहीं पा रहा दोस्तों एक घटना नहीं है ऐसी घटनाओं की बाढ़ आयी ********** 184 बुड्ढाबुड्ढीकी कहानी एक बुड्ढाआया साथ में एक बुढिया लाया होटल में जाकर वेटर को बुलाया दोनों ने अपना अपना आर्डर मंगवाया पहले बुड्ढ़े ने खाया बुढिया ने बिल चुकाया फिर बुढिया ने खाया बुड्ढ़े ने बिल चुकाया ये देख वेटर का सिर चकरायावो उनके पास आया और बोला जब तुम दोनों में इतना प्यार है तो खाना एक साथ क्यूँ नहीं खाया? इस पर बुड्ढ़े ने फरमाया "जानी तेरा सवाल तो नेक है पर हमारे पास दांतों का सेट सिर्फ एक है !!!! ******** 183 पुराना दौर तेरी कलम तो चली यही बहुत है मेरे लिए तकरार अभी तो टली यही बहुत है मेरे लिए तेरे अंदर का गुस्सा बरकरार है अभी भी मेरी एक ना चली यही बहुत है मेरे लिए मुझे मालूम है तेरा इंसां मर नहीं सकता बात है कितनी भली यही बहुत है मेरे लिए दो पल का साथ नहीं ये मालूम हम तुमको सुबह हुई सांझ ढली यही बहुत है मेरे लिए मेरी चाहत मेरी इबादत है यही चाहत तुमको फिर भी तुमको खली यही बहुत है मेरे लिए कमी लाख सही आखिर इंसां हैं खुदा तो नहीं मुरझाये ना खिलती कली यही बहुत है मेरे लिए हमें मुआफ़ करो या न करो अखितयार तुम्हारे है तुम्हारी आँखों में नमी यही बहुत है मेरे लिए कुछ तो है जो बांधे है हमको आज तलक भी आबाद रहे तेरी गली यही बहुत है मेरे लिए पत्थर दिल माँ से बना ये है मालूम मुझको पिंघली मोम की डली यही बहुत है मेरे लिए 29-08-1992 ******* 182 सहारे मत बना ए दिल सहारे रूठ जाते हैं ना किस्मत पेभरोसा कर सितारे टूट जाते हैं साहिल पर आके ना समझो कि पार आ गए जरा सी लहर आयी तो किनारे छूट जाते हैं राज दरबारों में न जाना वहां पे क्या रखा है पेट की खातिर ही तो वे उनके झूठ गाते हैं सच कहना अगर बगावत तो हम भी बागी ज्यादा हवा भरने पर ये गुब्बारे फ़ूट जाते हैं भगत सिंह के देश का फिर से देखा सपना आखिरकार लूट के ये शिकारे डूब जाते हैं अमीर गरीब की खाई बढ़ा विकास करेंगे वो एक न एक दिन झूठे जनता के बूट खाते हैं। ******** 181 बेचैनी जनता की बढ़ती जा रही समझौता संघर्ष करती आ रही डायलैक्टिस इसी को कहते हैं आज बेचैनी दुनिया पर छा रही डेमोक्रेसी ने आगे कदम बढाया है जनता ने कुछ अधिकार पाया है कितना ही भ्रष्टाचार बढ़ गया हो इसके खिलाफ विरोध जताया है उठती बैठती जीवण बिता रही है कई बार घन घोर अँधेरा हटाया है लूट के हथियार बदल लिए जाते हैं जनता ने एकता हथियार बनाया है ******** 180 डेमोक्रेसी ने आगे कदम बढाया है जनता ने कुछ अधिकार पाया है कितना ही भ्रष्टाचार बढ़ गया हो इसके खिलाफ विरोध जताया है उठती बैठती जेवण बिता रही है कई बार घन घोर अँधेरा हटाया है लूट के हथियार बादल लिए जाते जनता ने एकता हथियार बनाया है ********* 179 मंदी के दौर में भी एक नया दौर लायेंगे आतंक का अंधेरा ये मिलकर के मिटायेंगे नंगेपन के नाम पर नंगापन छाता जा रहा है इंसानियत बाजार में हरेक खोता जा रहा है परचम इंसानियत का हम फिर फैरायेंगे भीमकाय बाजार फिर संरक्षण मांग रहा है छिपा अपनी कमजोरी यह झूठ छांग रहा है जनता करे कंट्रोल बाजार ऐसा संसार रचायेंगे हाशिए पर फेंके गए जो उनका जमाना आएगा अपना हक पाने खातिर नागरिक समाज बनाएगा बड़े कदम नए साल में बस आगे बढ़ते जाएंगे नौजवानों का प्यार यहां फांसी चढ़ाया जाता है जात-पात गोतनात क्यों अपने रंग दिखाता है नए साल की आशा से निराशा से लड़ पायेंगे ******** 178 आर्थिक मंदी के दौर ने सताया हमको जेब ढीली करदी इसने रुलाया हमको बहुत सी जगह इसने करतब दिखाए आ ई टी के कई योधा इसने मार गिराए सरकारी कंट्रोल बता न था जिनको उसी से भीख मंगनी पड़ रही उनको पड़ सकता दिल पेय बुरा असर बताया चिकत्सकों ने हाल मे ऐसा भी फ़रमाया दिल के दौरे से आज कैसे बचा जाएगा पूंजीवादी मंदी का दौर कहाँ पहोंचायेगा ******** 177 1986 के दौर की रचना अब मैंने रटना छोड़ दिया है मैं कुछ कुछ सोचने लगा हूं भगवान के भक्तों का असली चेहरा थोड़ा पहचान में आने लगा है मेरे दिमाग में भगवान के वजूद पर भी एक सवालिया निशान लग गया है; वह होता तो सरसों के पीले फूल उगाने की एक सच्चे प्यार की कीमत उन्मादी गोली या त्रिशूल का निशाना न होती। कुछ और सोचना और देखना शुरु किया यूं लगा भगवान है इंसान का बनाया हुआ तभी तो वह अपने मालिकों की जेल में कैद है आज तक वह जनता के दुख-दर्द बढ़ाने तो बाहर निकला है कभी कम करने नहीं शायद यही कर सकता है 'वह' आगे कुछ नजर दौड़ आता हूं तो पाता हूं कि आज भी कुछ बहादुर लोग सरसों के पीले फूल उगाने की जी तोड़ कोशिशें कर रहे हैं अपने खून से खेत को सींच रहे हैं मुझे इंसान की इंसानियत पर फिर भरोसा होने लगा है और यह विश्वास बनता जा रहा है सरसों के फूल भगवान नहीं लगा पाएगा यह बहादुर इंसान ही फिर लगाएगा और यकीं है वह दिन अवश्य आएगा जब सरसों के पीले फूल फिर से उगेंगे शशि पुन्नू के बीच की दीवारें 176 आर्थिक मंदी के दौर ने सताया हमको जेब ढीली करदी इसने रुलाया हमको बहुत सी जगह इसने करतब दिखाए आ ई टी के कई योधा इसने मार गिराए सरकारी कंट्रोल बता न था जिनको उसी से भीख मंगनी पड़ रही उनको पड़ सकता दिल पेय बुरा असर बताया चिकत्सकों ने हाल मे ऐसा भी फ़रमाया दिल के दौरे से आज कैसे बचा जाएगा पूंजीवादी मंदी का दौर कहाँ पहोंचायेगा ढह जाएंगी चारों तरफ सरसों के फूल लहलाने लगेंगे

Wednesday, June 12, 2024

169 से 175

175 सच के रास्ते पर चलना सीख लो त्याग क़ि आग में जलना सीख लो आगे बढ़ते रहो इस अंधी तूफान में और अंगारों पर उतरना सीख लो भगवान क़ि दया ने यहाँ पहुँचाया गिर गए खुद ही संभालना सीख लो रणबीर अनुभव चाहिए प्रकाश का आज अँधेरे से गुजरना सीख लो ******* 174 पहले वाले गाँव नहीं बीरा पहले वाले बीर नहीं रसायनिक हथियार आये पहले क़ि शमशीर नहीं वक्त के साथ बदलती इस दुनिया का दस्तूर यही कबीर रैदास सूफी संतों ने घुमा फिर ये बात कही रोहतक जो छप्पन में था बची वाह तस्वीर नहीं खाना पीना बादल गया अब ज्वर बाजरे बचे कहाँ हरयाणा नंबर वन हुआ डिस्को डांस में फ़सा जहाँ बथुआ राबड़ी खिचड़ी गौजी बची खाने में खीर नहीं कडुआ सच है बदलाव का इसे समझना जरूरी देखो देखनी होगी दिशा इसकी इसको परखना जरूरी देखो बदलाव कई तरह के होते कुछ को माने जमीर नहीं जनता हक़ में बदलाव के ये नारे बहोत उछाले हैं जनता बहकावे में आई मुंह से ये दूर हुए निवाले हैं पैनी नजर ये जनता क़ि बणी प्रहरी रणबीर नहीं ******* 173 हर एक कदम पर हादसा होना सोचो तो यारो हमारे सिस्टम में क्यों है रोना सोचो तो यारो जो कुछ कमाया हमने छीन लिया चालाकी से किसी ने नहीं समझाया ये सब खेल बेबाकी से कहते तुम्हारी क़िस्मत में खोना सोचो तो यारो क़िस्मत का खेल मान कर हमने इसको ढ़ोया अपने हाथों से खुद हमने बीज कीकर का बोया क़िस्मत क़ि मार को क्यों ढ़ोना सोचो तो यारो दिलो दिमाग पर मेरे तो यही सब तो छाया है आज जो कुछ भी हूँ मैं मेरे नसीब ने बनाया है औरों के खेलने का ये खिलौना सोचो तो यारो बात समझ में आ गयी क़िस्मत का खेल नहीं बिना इन्सां के चल सकती यह देखो रेल नहीं ********* 172 महम चौबीसी बदल रही देखो नहीं पुराणी चौबीसी वही देखो महम परंपरागत खेती में मशहूर आज परंपरा छोड़ने को मजबूर गेहूं जवार बाजरा उगाते रहे धान गरीब अमीर सब यहाँ के किसान फल व सब्जी की खेती आई देखो अपार संभावनाएं गयी बताई देखो परंपरागत खेती ख़तम होती जा रही परासंगिकता अपनी है खोती जा रही भूजल स्तर कहीं पर तो है बढ़ रहा कहीं पर भूजल स्तर ये घट रहा बेर के बाग़ महम में दिखाई ना देएँगे किन्नू की खेती ये किस्सान भाई लेंगे तीतरी गाँव टमाटर बहोत उगाता है अमरुद के बाग़ विभाग लगवाता है परंपरागत खेती क्यों छोड़ता किसा न रूढ़िवादी सब कहाँ गए फरमान -- ********* 171 कई बार सोचता हूँ तो बस सोचता ही रह जाता हूँ मैं सड़क पर रहने वाले बचों की बेमिशाल हिम्मत संकट का दौर फिर भी हंसी के पल चुरा लेना इन बचों से ही सीखे कोई उनका साहस उनकी जीवटता देखकर अचरज होता है मुझे कई बार सोचता हूँ तो बस सोचता ही रह जाता हूँ मैं ******* 170 तुममें शिकश्त और जिल्लत का अहसास बाकी पता हमें तुममें अभी नफरत का अहसास बाकी कितना ही दिखावा करो अपनी सादगी का तुम खूब तुममें देखा है हिमाकत का अहसास बाकी मुहब्बत से कहते हैं दौलत का कोई वास्ता नहीं तुम्हारे दिल में अपनी दौलत का अहसास बाकी कितना ही अपमान करो तुम बार बार ये हमारा रहेगा हममें फिर भी कयामत का अहसास बाकी हमारी शराफत को करदो बिल्कुल तार तार तुम रणबीर को रहेगा ही शराफत का अहसास बाकी ********* 169 हमारी बर्बादी हमें बर्बाद करके उनको पता नहीं क्या मिल गया ईमानदारी का दामन थामा हमारा निवाला छिन गया आदमी से आदमी की मोहब्बत कहाँ काफूर हो गयी मेहनत हमने की मगर पता नहीं कहाँ ये खो गयी दर्द हद से गुजर गया है सीना हमारा तो छिल गया मोहब्बत के गीत गाएँ कैसे चिंता हमें बीमारी की यकीं कौन करेगा इस पर मोहब्ब्त गरीब भिखारी की देख के उनके ढंग निराले मुंह हमारा है सिल गया मरने वाले हथियार लिए बैठे साधा निशाना हम पर मार न पाना मजबूरी उनकी टिका जमाना हम पर हमारे वजूद का तस्सवुर कीचड में गुलाब खिल गया तूफ़ान जो उठा समुन्द्र में अब नहीं टाला जायेगा पड़ाव अब ये हमारा मंजिल पर ही डाला जायेगा भगवन का आसरा किया पर भरोसा सारा हिल गया आर पार की जंग शुरू करना होगा स्वीकार हमें फूंक फूंक के चलना है रहना होगा होशियार हमें देख देख जुल्म उनके कलेजा हमारा छिल गया मानवता का औढ़ा मुखोटा लिया धर्म का सहारा है जात पात का जहर फैलाया निचौड़ा खून हमारा है रणबीर आज रो उठा हो छलनी उसका दिल गया *******

9 से 1

9 था क्या हमने सोचा ये क्या हो गया हमें क्यों इस चमन से गिला हो गया दिया जिसकी खातिर था हमने लहू वही मौसमें गुल क्यों खफा हो गया ********* 8 गुनाह उनका सजा हमें उनके गुनाहों की हमको किसलिए सजा मिले ऐसा इंसाफ क्यों हो किसलिए ऐसी क़ज़ा मिले नाहक ही हम बेकसूरों की क्यों जान चली जाये कैसे हम जैसों को जीने की यहाँ फिजा मिले तुम्हारे सताने से हम रोये बहुत कई बार ही मग़र अब ना रोयेंगे ताकि तुम्हें ना मजा मिले तुम लूट कर हमें रहो सुख चैन से आबाद बताओ तो कसूर क्यों उल्टा हमें खिजा मिले हमारी मेहनत पर रणबीर वे ऐश करते हैं न्याय देखो हमें सुखी रोटी उनको पिज्जा मिले ********* 7 जीने की मुश्किल अब मेरी राह बहुत है जीता हूँ जीने की अब मुझे चाह बहुत है गम बहुत से हैं हमारे और तुम्हारे देखो उनपे मेरी टिकी अब निगाह बहुत है तुम कहो या न कहो पर मुझे मालूम है तुमको मेरी जीने की परवाह बहुत है कत्ल होके भी हम अमीरों के गुनाहगार झूठ नहीं शहर में हमारे गवाह बहुत है मुझे अपने दोस्तों पर है पूरा एतबार अहम् रणबीर उनकी सलाह बहुत है ******* 6 मेरा रास्ता समझो तो सही यही समझाता रहा मकसद जीने का क्या हो इसपे बतियाता रहा एक ही जीवन है यहाँ इतना तो मान लो दोस्त दोस्त चुप चाप दूसरा रास्ता बस बनाता रहा जाने वाले फिर नहीं आते मुडके अगले जीवन इस हकीकत से दोस्त हमेशा ही कतराता रहा दोस्ती आगे नहीं बढ़ पाई मुझ पर कामरेड का देर सबेर लुके छिपे ठप्पा दोस्त वो लगाता रहा ******* 5 हुए किसी और के फिर भी अपने से लगते हो बहुत प्यारे हसीन टूटे हुए सपने से लगते हो कभी कभी यादों का एक हजूम सा आता है अपनी बाँहों में मुझे तुम कसने से लगते हो कभी अकेले में बैठ कर रोने को दिल करता है मेरी हालत पे लगता है तुम हंसने से लगते हो वो प्यार ही क्या जो करे पछतावा प्यार करके प्यार किया हमने तुम मना करने से लगते हो अब वो बात नहीं हमने रास्ता बदल लिया है मग़र तुम जब मिलते हो तो डरने से लगते हो ****** 4 मेरा रास्ता समझो तो सही यही समझाता रहा मकसद जीने का क्या हो इसपे बतियाता रहा एक ही जीवन है यहाँ इतना तो मान लो दोस्त दोस्त चुप चाप दूसरा रास्ता बस बनाता रहा जाने वाले फिर नहीं आते मुडके अगले जीवन इस हकीकत से दोस्त हमेशा ही कतराता रहा दोस्ती आगे नहीं बढ़ पाई मुझ पर कामरेड का देर सबेर लुके छिपे ठप्पा दोस्त वो लगाता रहा ******** 3 गुनाह उनका सजा हमें उनके गुनाहों की हमको किसलिए सजा मिले ऐसा इंसाफ क्यों हो किसलिए ऐसी क़ज़ा मिले नाहक ही हम बेकसूरों की क्यों जान चली जाये कैसे हम जैसों को जीने की यहाँ फिजा मिले तुम्हारे सताने से हम रोये बहुत कई बार ही मग़र अब ना रोयेंगे ताकि तुम्हें ना मजा मिले तुम लूट कर हमें रहो सुख चैन से आबाद बताओ तो कसूर क्यों उल्टा हमें खिजा मिले हमारी मेहनत पर रणबीर वे ऐश करते हैं न्याय देखो हमें सुखी रोटी उनको पिज्जा मिले ******** 2 होंश में आना होगा अब नए संगठन को हमें अपनाना होगा ।। जो भाई नहीं आएं उनको बुलाना होगा ।। संगठन बनायें जो रजके रोटी खाना चाहते अपने बच्चों को हम शिक्षा दिलाना चाहते सब बराबर हों ऐसा समाज बनाना चाहते अब हमें क्रांति के गीतों को गाना होगा ।। जो भाई नहीं आएं उनको बुलाना होगा।। वो क्यों अमीर हो गए इस पर विचार करें हम क्यों गरीब ही रहे इस पर ध्यान धरें अलग अलग बंटे हम एक दूजे से ही डरें जात पात भूलके एक मंच पर आना होगा।। जो भाई नहीं आये उनको बुलाना होगा ।। हरियाणा बुरी तरह जलवाया देख लिया जातों को आपस में भिड़वाया देख लिया फूट डालो राज करो आजमाया देख लिया मेहनतकश को मानवता को बचाना होगा।। जो भाई नहीं आये उनको बुलाना होगा ।। महंगाई बढ़ती जा रही देखो आज यहाँ बेरोजगारी हमें खा रही देखो आज यहाँ प्याज भाव नहिं पा रही देखो आज यहाँ इन मुद्दों को मिलकर के उठाना होगा ।। ******** 1 साथ तुम्हारा इन्कलाब नारा इस कदर भा गया मकसद वीरान जिन्दगी का जैसे फिर से पा गया मोम के घरों में बैठे लोग हमारे घर जलाने आये जला दिए हमारे मग़र अपने भी ना बचा पाये तबाह कर दिया जहान को मुनाफा हमें खा गया रास्ता ही गल्त पकड़ा हमें भी उसी पर चलाया है स्वर्ग नर्क के पचड़े में तुम्हीं ने हमको फंसाया है भगवान और बाबाओं का खेल समझ में आ गया आशा बाबू एक प्रवचन के कई लाख कमाते हैं निर्मल बाबू नकली लोग पैसे दे कर के बुलाते हैं भगवान की आड़ में मुनाफा दुनिया पर छा गया

19 से 10

19 *पानी आकाश से गिरे तो........बारिश,* *आकाश की ओर उठे तो........भाप,* *अगर जम कर गिरे तो...........ओले,* *अगर गिर कर जमे तो...........बर्फ,* *फूल पर हो तो....................ओस,* *फूल से निकले तो................इत्र,* *जमा हो जाए तो..................झील,* *बहने लगे तो......................नदी,* *सीमाओं में रहे तो................जीवन,* *सीमाएं तोड़ दे तो................प्रलय,* *आँख से निकले तो..............आँसू,* *शरीर से निकले तो..............पसीना,* *और* *प्रभु के चरणों को छू कर निकले* *तो.........................चरणामृत* *( आज विश्व जल दिवस पर समर्पित )* *Save Water💧Save Life।* *💧💧पानी को जरूर बचाये💧💧* ****** दिन आ गए अच्छे पा के खाखी निकर कच्छे बंदियां उत्ते गऊंआ बच्छे गां दा मूत पिलाऊंदे ने मुर्ख खूब बनाऊंदे ने सानु बढदे फिरन पतंदर दसदे हनुमान है बंदर वोटां वेले राम दा मंदर मुडके राम भुलाऊंदे ने मुर्ख खूब बनाऊंदे ने जाट आरक्षण ल्याके रक्खे सारे लोक लडाके भाईचारे नु तुडवाके आपस विच लडाऊंदे ने मुर्ख खूब बनाऊंदे ने युग विज्ञान दा आया ऐहना तर्क नु आ दबाया आके गीता विच्च उलझाया गीता सार पढाऊदे ने मुर्ख खूब बनाऊंदे ने डॉ०फूल सिह ******* 18 पैसा छाया चारों तरफ आज के संसार में रिश्ते नाते टूट रहे है आज के परिवार में भाई का भाई दुश्मन जहाँ में बना हुआ है आरक्षण खाप का मसला आज तना हुआ है मानवता पीछे रह गई धर्म के प्रचार में । भाई चारा मेलजोल चीज विरली हो गई सादगी सच्चाई जाणे कहाँ सब खो गई सब कुछ बिक रहा आज इस बाजार में । सिस्टम हमारा ये बिलकुल खोखला हो रहा अविश्वास के बीज हर जगह पर वो बो रहा बहोत से भ्रष्ट नेता छाये राज दरबार में । विषमता के हर तरफ ये अम्बार लगे हैं खाईयां बढ़ रही हैं ये रिश्ता बेकार लगे हैं कितना अकेला हुआ मानव घर परिवार में। किसान कर्ज में डूबा फांसी खाने को मजबूर निठल्ला ऐश करे देखो सिस्टम का दस्तूर अच्छे दिन आएंगे बीता समय इंतजार में । ********* 17------------------------------------------ दुनिया को बदलने का बहाना तुम्हारा अब समझ में आ गया हमको यारो अपने वजूद के लिए ये जुमला अपनाया ------------------------------------------ ******** --16----------------------------------------- दुःख होता है ये देख कर हमको यारो हमें जिन्होंने मार्क्सवाद सिखाया था वही उदारीकरण में उदार हो गये देखो ----------------------------------------- ******** 15 -------------------------------------- इंसानियत और मानवता का सही और असली रूप ढूँढते ढूँढते समाजवाद के दरवाजे पर आ पहुंचे और बचा पाये कुछ हिस्सा अपनी मानवता का ------------------------------------ ******** 14 यही रफ़्तार रही ज़माने की ताऊ तो इंसानों की जगह होंगे ये हाऊ खुदगर्जी चुगलखोरी खुसामद की मौज होगी हर चीज यहाँ बिकाऊ अमेरिका और कोर्पोरेट छाया देखो भारत बनाया इन्होंने बैल हिलाऊ ******** 13 दो हजार बीस तक गाँव कस्बों को ना देखिये बड़े बड़े शहरों की फ़ैली गंदी बस्तियों की तरफ ना देखिये पाश इलाकों में बनी ऊंची इमारतों को ही अब देखिये ********* 12 गरीब परिंदा उड़ान में है तीर अमीर की कमान में है है डराने को मारने को नहीं मरा तो अमीर नुकसान में है जिन्दा रख कर लहू चूसना अमीरों के दीन ईमान में है खौफ ही खौफ है जागते सोते लूट हर खेत खलिहान में है मरने न देंगे न जीने देंगे sajish poonjee mahan में है ******** 11 अपमान सहें जाओ रै पर बोलियो मतना।। नाश करण लागरे थारा मूंह खोलियो मतना ।। अपने अपने में मग्न हो चुप चाप झेल रहे गलत होंते देखें जाओ पर सोचियो मतना।। ****** 10 कुछ नए बन रहे कुछ पुराने बने हर कदम पर यहाँ कैदखाने बने किस तरफ से चली गोलियां क्या पता किन्तु हर बार हम ही निशाने बने ********

29 से 20

29 तपती लू साईकिल का सफ़र फेस बुक की बन गयी खबर न बर्फ का पानी न ही फ्रीज़ बिजली का पंखा बिजली का बार बार कट बनी बात जबर सारे दिन की दिहाड़ी सौ रुपे चले जा रहे है हम अंधी डगर क़िस्मत में यही लिखा बताया सुन कर बस कर लिया सबर ******* 28 मत कहो की तुम्हे हमसे प्यार हो गया गर था तो इतनी जल्दी कहाँ खो गया प्यार तो सोनी महीवाल का बताते यारो कचा मटका भी उनके प्यार पे रो गया ******** 27 के करूँ क्या ठीक है क्या गलत है कौन समझाए क्या करें क्या ना करें ये कौन बतलाये सही काम करके जीना चाहता हूँ मैं कहीं भी सही काम नहीं पाता हूँ मैं बस सर पकड़ कर बैठ जाता हूँ मैं सोचता हूँ कोई आकर के मुझे उठाये--------- काले काम काले धंधे बुला रहे हैं इनमे कई लोग खूब कमा रहे हैं मुझे भी यही रास्ता दिखा रहे हैं डर लगता है मुझको कोई ढाढस बंधवाये ------ मेरे जैसे बहुत काले अंधेरो में खो गए गलत रहो के आदि बहुत साथी हो गए परिवार भी बस दो चार बार रो गए बिना काले के हमारा पेट कैसे भर पाए ----- ****** 26 आज की जरूरत हम नहीं जानते अपनी शकल को भी नहीं पहचानते मशीन बन गया है आज का इंसान इस सचाई को हम क्यों नहीं मानते रणबीर ******* 25 जो धर्म हमें घृणा से पूरा भरदें मनुष्य से मनुष्य को अलग करदें आपस में हमको जो लडवाते हों धर्म के ठेकेदारों को बचाते हों जो देशो को ही बाँट कर धरदें ऐसे धर्मों के बारे क्या कहूँ मैं ? ****** 24 वायदे करके इनको पूरी तरह हमने निभाया है करके वायदे तोड़ दिए ये तुमने करके दिखाया है चलो कोई मजबूरी होगी वायदे नहीं निभा पाये प्यार तो तुम्हें हमसे था ही छिप नहीं पाया है ******** 23 बड़ा भोला बड़ा सादा बड़ा सच्चा है। तेरे शहर से तो मेरा गाँव अच्छा है॥ वहां मैं मेरे बाप के नाम से जाना जाता हूँ। और यहाँ मकान नंबर से पहचाना जाता हूँ॥ वहां फटे कपड़ो में भी तन को ढापा जाता है। यहाँ खुले बदन पे टैटू छापा जाता है॥ यहाँ कोठी है बंगले है और कार है। वहां परिवार है और संस्कार है॥ यहाँ चीखो की आवाजे दीवारों से टकराती है। वहां दुसरो की सिसकिया भी सुनी जाती है॥ यहाँ शोर शराबे में मैं कही खो जाता हूँ। वहां टूटी खटिया पर भी आराम से सो जाता हूँ॥मत समझो कम हमें की हम गाँव से आये है। तेरे शहर के बाज़ार मेरे गाँव ने ही सजाये है॥ वह इज्जत में सर सूरज की तरह ढलते है। चल आज हम उसी गाँव में चलते है.................. उसी गाँव में चलते है..... Akshay Ohlan ******** 22 अब हालत बदलने होंगे ग़म का बोझ उठाने वाले | वरना देते ही जायेंगे दुःख दिन रात ज़माने वाले | मजलूमों को बाँट रहे हैं परम्पराओं के बहाने करके इस साजिस ही में शामिल हैं वे नफरत फ़ैलाने वाले | दुनिया पर कब्ज़ा है जिन का वो उस के हक़दार नहीं हैं उनसे अब कब्ज़ा छीनेंगे सब का बोझ उठाने वाले | पत्थर दिल लोगों से अपने जख्मों को ढांपे ही रखो खुद को हल्का कर लेते हैं सबको जख्म दिखाने वाले | कोई किसी का साथ निभाए इतनी फुर्सत ही किसको है अफसानों में मिल सकते हैं अब तो साथ निभाने वाले ******** 21 दर्द सबके एक हैं मगर हौंसले सबके अलग अलग है कोई हताश हो के बिखर गया तो कोई संघर्ष करके निखर गया ! ******* 20 सोच सोच कर सोच सोच कर घबरा जाता हूँ मैं अपने आप को अकेला पाता हूँ मैं एक नयी दुनिया का सपना मेरा है यहाँ क्या मेरा है और क्या तेरा है इंसानियत पैदा की है समाज ने हैवानियत पैदा की है दगा बाज ने हैवानियत ख़त्म हो है यही सपना इंसानियत बढे यही लक्ष्य अपना मनकी शान्ति की खोज में धर्मात्मा खोजते खोजते खोज लिया परमात्मा अपनी शान्ति पाई हमारी लूट पर हमारी शांति भगवन की छूट पर भगवान भी इंसान की खोज कहते हम तो भुगतें वो करते मौज रहते जिस दिन ये चालबाजी भगवान की समझ आयेगी तो मुक्ति इन्सान की सोचता हूँ जितना उतना ही भगवान नजर आता है मुझको तो बस शैतान मेरे लिए तो मेहन त इमानदारी उनको लूट की दी उसने थानेदारी सबसे पहले होगी बगावत मेरी सामने लायेगी उसकी हेरा फेरी जग नहीं है सोता उसकी हाँ के बिना घोटाला कैसे होता उसकी हाँ के बिना मंदिरों में हजारों टन सोना जमा है यहाँ भूख से मौतों का लगा मजमा है लोगो ने चढ़ावा चढ़ाया है मंदिरों में चढ़ावे तेन मौज उड़ाया है मंदिरों में महिला को दासी बनाया है मंदिरों में गरीबों को गया भरमाया है मंदिरों में मन की शांति नहीं मिली है मंदिरों में इंसानियत आज हिली है मन्दिरों में बुद्ध ने नया रास्ता खोजा मन शांति का भगवान को नाकारा दर तोडा भ्रान्ति का मार्क्स ने धर्म को अफीम बताया था गरीब किया आदि हमें समझाया था पूंजी का खेल सारा है पूंजीवाद में इसका जवाब तो है समाजवाद में सोचता समाजवाद कैसा हो आज का क्या रिश्ता होगा चिड़िया और बाज का कई सवाल हैं जिनके ढूँढने जवाब महात्मा ने नहीं हमें ढूँढने जनाब रंग भरने हैं समाजवादी समाज में सब की हिस्सेदारी के सही अंदाज में "रणबीर "

49 से 30

49 होकर मायूस नहीं यूं श्याम की तरह ढलते ही रहिए जिंदगी एक भोर है सूरज की तरह निकलते रहिए ठहरोगे एक पांव पर पांव तो थक जाओगे यारो धीरे-धीरे ही सही मगर लक्ष्य की ओर चलते रहिए ********* 48 इस दिल में और उस दिल में सिर्फ फर्क इतना है ये शीशा था जो टूट गया वो पत्थर था जो साबुत है ********** 47 मेरा कसूर हमने दोनो ने मिलकर सोचा जिन्दगी का सफ़र तय करेंगे बहुत सुन्दर सपने संजोये थे प्रेम का पता नहीं ये हरयाणा क्यों पुश्तैनी दुश्मन बन गया यह सब मालूम था हमको पर प्यार की राहों पर बढ़ते गए मेरे परिवार वाले खुश नहीं थेa क्यों मुझे पता नहीं चला है न तो मैंने एक गोत्र में की है न ही एक गाँव में शादी मेरी न ही दूसरी जात में की मैंने तो भी सब के मुंह आज तक फुले हुए हैं हम दोनों से देखो प्यार किया समझा फिर शादी ससुराल वाले भी खुश नहीं हैं शायद मन पसंद गुलाम नहीं मिल सकी जो रोजाना उनके पैर छूती पैर की जूती बनकर सुघड़ सी बहु का ख़िताब लेती दहेज़ ढेर सारा लाकर देती ना प्यार का खुमार काम हुआ अब जनाब की मांगें एकतरफा बढ़ी मैं सोचती हूँ नितांत अकेली अब क्या हमारा समाज दो प्रेमियों के रहने के लायक बन पाया यहाँ चाहे कुछ हो हम लोड उठाएंगे मगर घुटने नहीं टिकाएंगे यारो वो सुबह कभी तो आयेगी की इंतजार में ये संघर्ष जारी रखेंगे झेलेंगे इस बर्बर समाज के सभी नुकीले जहरीले तीर छाती पर ही जिद हमारी शायद यही है कसूर ********** 47 हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो कत्ल भी करें तो चर्चा नहीं होता! ********* 46 कैसे जांचें कैसे जांचें कि कौन अच्छा है क्या सिस्टम खस्ता है ॥ सबकी अपनी अपनी ढपली विकास का वही रस्ता है ॥ जनता के बल पर ऊँचाई पाने वाले हरेक बादल को मौसम रूख बदले तो फिर पानी पानी होना पड़ता है ॥ जनता का विश्वास बार बार टूटता है यहाँ पर फिर से कमाल की बात है कि यह बार बार से देखो उठता है ॥ आंधी आती है बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं यहाँ पे यारो कई बार पत्ता भी हिलता है तो दिल कांपने लगता है ॥ मेरे अंदर एक मुखालिफ था जो मुझसे भी लड़ता था अब या तो वह चुप ही रहता है या हाँ में हाँ करता है ॥ जनता ने इतिहास रचे हैं वो ये जानते हैं बखूबी ये इसीलिए हमको वो बरगलाने का प्रपंच रचता है ॥ ********** 45 आज का दौर हमको कहाँ लेजा रहा यारो ॥ बताओ तो सही नहीं समझ पा रहा यारो ॥ प्यार मोहब्बत नहीं बची मार काट छाई मानवता के रिस्तों पे बाजार छा रहा यारो ॥ ********* 44 शोर गुल बहुत है नहीं आवाज सुनाई देती बनावटी ही बनावटी हर चीज दिखाई देती कैसे रहते आज लोग अंधेरों के दरम्यान यारो वहां की नहीं दिखाई हमको वह सच्चाई देती हमारे बदनों में खुद उतार करके खंजर यारो पूछते हैं लोग हमें कि राहत कैसे दवाई देती जिद्द है ये तुम्हारी तो यही है जिद्द भी अपनी हार ना मानेंगे यारो जीत की घण्टी सुनाई देती ********* 43 मुबारक आपका भेजना उनको सलाम यारो हमको लगता उनका हर कदम हराम यारो उनके दरबारों में मानवता का क्या खोजना वहां पर तो फेकू नेता बस्ते हैं तमाम यारो कल इनके जिम्मे था गांधी का कत्ल यहाँ आज इनके हाथों में देश की है लगाम यारो अन्धविश्वासी और रूढ़ियों के भगत हैं जो आज लेकर आ रहे विकास का पैगाम यारो ********* 42 कहना बहुत आसान है मुश्किल चलना सच्चाई पर लहर के उल्ट तैर कर ही पहुंचा जाता अच्छाई पर बुराई की ताकत को यारो देख कर डर जाते हम इसके दबाव में बहुत सी गलती भी कर जाते हम आका बैठ के हँसते रोजाना फिर हमारी रुसवाई पर मेहनत हमारी की अनदेखी रोजाना हो रही दोस्तो चेहरे की लाली हम सबकी रोजाना खो रही दोस्तो कहते वो हमको बेचारा जो जीते हमारी कमाई पर बीज है खाद और खेत भी इससे फसल नहीं उगती फसल उगती है तब यारो जब मेहनत हमारी लगती महल बने देखो सभी तुम्हारे हम सब की तबाही पर ******** 41 समाज हमको हमारा ही आईना दिखाता है प्रतिगामी प्रगति कामी का अंतर जताता है पतन शीलता बढ़ती जा रही चारों तरफ यारों प्रगति कामी हर कदम पर रास्ता बताता है पता नहीं कहां छोड़ आए हैं हम अपनी पहचानें आज हर चेहरा अजनबी सा नजर आता है सभी मजबूर हुए अपने अपने अंदर यारो मोबाइल एक कमरे में अलग अलग बैठाता है मशीन बनते जा रहे इंसान समाज में यारो इंसानियत का बंद होता जा रहा क्यों खाता है ********* 40 सच आज क्या हो रहा बिलकुल समझ नहीं पा रहा एक कुछ कहता दूसरा कुछ कहता हुआ आ रहा सच का साथ देने को यहाँ पे सब कहते हैं यारो सच क्या है इस पे हरेक अपनी ढपली बजा रहा कहानी को माइथोलॉजी को इतिहास बताने वालो इतिहास और वैज्ञानिक नजर से सच ढूँढा जा रहा ******** 39 आंधी चल रही ये नहीं थमीं यारो रात की गर्द मेरे चेहरे पे जमीं यारो कुछ ठूंठ खड़े हैं कहीं कहीं मेरे जैसे कुछ उखड़े पड़े हैं कहीं तुम्हारे जैसे हम सब बचें हैं इसके थपेड़े खाकर तुम बैठ गये अपने महलों में जाकर यह आंधी आज किसे साल रही देखो झोंपड़ी इधर उधर उछाल रही देखो धर्म की आँधी चलने ही वाली यारो क्या गुल खिलेंगे उजड़ेगा माली यारो ********* 38 पुराना दौर तेरी कलम तो चली यही बहुत है मेरे लिए तकरार अभी तो टली यही बहुत है मेरे लिए तेरे अंदर का गुस्सा बरकरार है अभी भी मेरी एक ना चली यही बहुत है मेरे लिए मुझे मालूम है तेरा इंसां मर नहीं सकता बात है कितनी भली यही बहुत है मेरे लिए दो पल का साथ नहीं ये मालूम हम तुमको सुबह हुई सांझ ढली यही बहुत है मेरे लिए मेरी चाहत मेरी इबादत है यही चाहत तुमको फिर भी तुमको खली यही बहुत है मेरे लिए कमी लाख सही आखिर इंसां हैं खुदा तो नहीं मुरझाये ना खिलती कली यही बहुत है मेरे लिए हमें मुआफ़ करो या न करो अखितयार तुम्हारे है तुम्हारी आँखों में नमी यही बहुत है मेरे लिए कुछ तो है जो बांधे है हमको आज तलक भी आबाद रहे तेरी गली यही बहुत है मेरे लिए पत्थर दिल माँ से बना ये है मालूम मुझको पिंघली मोम की डली यही बहुत है मेरे लिए 29-08-1992 ********* 37 आज का जमाना तेज रफ़्तार ज़माने की समझां इसकी चाल हे|| नासमझी मैं उतरे बेबे म्हारी सबकी खाल हे|| 1 गफलत पडे छोड़नी करा हकां की रुखाल हे अपना गम स्कूल अपना करें इसकी संभाल हे म्हारे स्कूल कोलेजां पै टपकै बदेशिया की राल हे जनता एका करकै बनैगी या मजबूत सी ढाल हे जात पात और धरम पै करां लड़न की टाल हे|| नासमझी मैं उतरै बेबे म्हारी सबकी खाल हे|| 2 वैजानिक नजर के सहारे रचै नयी मिसाल हे मानवता सिखर पर पहोंचे सजा पावें चंडाल हे कार्य कारण की होवे फेर सही सही पड़ताल हे क्या क्यों और कैसे बरगे उठें दिलों मैं सवाल हे धार्मिक कटरता की हार होजयागी फिलहाल हे|| नासमझी मैं उतरे बेबे म्हारी सबकी खाल हे|| 3 संघर्ष करना बहोत जरूरी ठा हाथों में मशाल हे मानवता की करें सेवा नहीं रहे कोई मलाल हे एक दूजे का प्राणी राखै हमेश्या पूरा ख्याल हे आए अकेले अकेले जाना बाकि सब जंजाल हे प्रकर्ति गेल्यें करें दोस्ती पर्यावरण हो बहाल हे |। नासमझी मैं उतरे बेबे म्हारी सबकी खाल हे|| 4 पानी की कमी नही रह्वै नहीं होंगे सुने ताल हे भूखा कोए नहीं सोवैगा नहीं पडेंगे अकाल हे समतावादी विचार सबके नहीं मचै बबाल हे इन सब बातां की हमनै करनी हो पड़ताल हे रणबीर की कलम आज बयां करै ये हाल हे।। नासमझी मैं उतरे बेबे म्हारी सबकी खाल हे|| ******** 36 निर्मला मैं एक साधारण से परिवार में पली लड़की अपने जीवन को सार्थक बनाने चली लड़की अनगिनत सहन की है जीवन की ये कठिनाई गांव के मेरी कोम वालों ने इज्जत लूटनी चाही खेतों में काम करते दलित वो थे दौड़े-दौड़े आए तभी मेरे में ऊपर से जुल्म के बादल छंट पाए कालेज जाने लगी तो इन्होंने मेरा पीछा नहीं छोड़ा दूसरे गांव के लड़कों से सूत्र इन्होंने था जोड़ा घर पर बात बताई तो कहते बंद करो पढ़ाई कॉलेज में वूमेन सेल बात वहां भी न बन पाई आशा और निराशा के बीच एम ए पास किया अच्छे नंबर आए मेरे थोड़ा सुख का साथ लिया नेट भी पास कर लिया पर नौकरी नहीं मिलती मां कहती मेरे चेहरे पर क्यों हंसी नहीं खिलती कैसे खिले हंसी मुझे पंचायतियो बताओ तो सही क्या करूंआगे का राह पंचायतियो दिखाओ तो सही प्राइवेट स्तर पर मैंने बी एड भी कर लिया है मेरे रिश्ते ढूंढते ढूंढते घर वालों का जी भर लिया है ना कहीं नौकरी मिल रही ना शादी हो रही मेरी क्या नहीं दिखती तुम्हें बर्बादी ये जो हो रही मेरी कई जगह बात चली दहेज को लेकर टूट गई मर जाने को दिल करता आस सभी छूट गई क्या करूं कहां जाऊं मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा बूढ़े मात-पिता हैं उनका दुख ना देखा जा रहा सुनील भाई भी एम ए पास पांव से पांव भिड़ा रहा एकेली नहीं हूँ गांव में और भी लड़कियां भुगत रही इकट्ठी हो मिल बैठ कर सोचें हो नहीं ऐसी जुगत रही आज नहीं तो कल सोचना तो हम सबको पड़ेगा बनायें युवा महिलाओं का संगठन जो बुराई से लड़ेगा ********** 35 हमने खोल के दिल से बातें करनी चाही गंदे विचार और गंदगी दिमाग से ताही बहुत सोच समझ कर अपनाई ये राही मेहनत और ईमानदारी की की है बाही ******** 34 पता नहीं पता नहीं आज का जमाना किधर को जा रहा है सुबह कहीं शाम कहीं अगली सुबह कहीं पा रहा है नई तकनीक ने कब्जा जमाया पूरे इस इंसान पर आदमी आदमी को दिन दिहाड़े नोच नोच खा रहा है दूसरों के कंधों पर पैर रखकर आसमान छू रहे हैं गंदी फिल्मों का फैशन आज नई पीढ़ी पर छा रहा है दारू समाज के हर हिस्से में सत्यानाशी बनती जा रही अच्छा खासा हिस्सा आज दारु पी गाने गा रहा है लालच फरेब धोखाधड़ी का दौर चारों तरफ छाया नकली दो नम्बर का इंसान हम सबको भा रहा है बाजार व्यवस्था का मौसम है मुट्ठी भर हैं मस्त इसमें बड़ा हिस्सा दुनिया का आज नीचे को ही आ रहा है भाई भाई के सिर का बैरी कत्लोगारत बढ़ रही है पुलिस अफसर कोई बाएं दाएं से खूब पैसे बना रहा है पूरे के पूरे सिस्टम को दीमक खाती जा रही देखो आज भ्रष्टाचार चारों तरफ डंक अपना फैला रहा है एक तरफ मॉल खड़े हुए दूजी तरफ टूटी हुई सड़कें देती दिखाई तरक्की का यह मॉडल देखो दूरियां बहुत बढ़ा रहा है अपने बोझ तले एक दिन मुश्किल होगा सांस लेना तलछट की जनता जागेगी रणबीर उसे जगा रहा है ************* 33 जनता को दबाना दिन बी दिन मुश्किल होता जायेगा मिलट्री पुलिश सारा ढांचा उसके सामने डगमगायेगा तुमने ही ये हालत पैदा किये जनता को बाँटने के लिए यही हालत उसे एकता देंगे ये सिंघासन लड़खड़ायेगा ********* 32 ना इस जन्म में झूठ बोला ना कभी दुकान पे कम तोला फिर भी भगवान नाराज हुआ हार्ट अटैक मुश्किल इलाज हुआ मैंने पूछा मुझे क्यों कष्ट मिला बताया पिछले का सिलसिला इसका कब होगा मेरा हिस्साब अगले में मिलेगा तुम्हें जवाब पिछला ना कभी जान पाया नहीं अगला समझ में आया आज की बाबत नहीं बताते अगले पिछले में हमें फँसाते दम मारो दम मिट जाएँ गम देवी देवता हमारे इनके हैं हम ******** 31 जवाब दीजिए 1 मैं खेलूं कहाँ? 2 मैं कूदूँ कहाँ? 3 मैं गाऊं कहाँ ? 4 मैं किसके साथ बात करूं ? 5 बोलता /बोलती हूँ तो मां को बुरा लगता है । 6 खेलता /खेलती हूँ तो पिताजी खीजते हैं। 7 कूदता /कूदती हूँ तो बैठ जाने को कहते हैं। 8 गाता/गाती हूँ तो चुप रहने को कहते हैं। 9 अब आप ही कहिये कि मैं कहाँ जाऊं? क्या करूं? ********* 30 भुखमरी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार बढ़ते ही जा रहे बिलकुल बेसुम्मार जात गोत इलाके और धर्म पे बांटा ऐस करते देश के देखो साहूकार

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59 भारत देश है मेरा जहां डाल डाल पर गरीब जनता का बसेरा वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा जहां झूठ और धर्म का पग पग पे अँधेरा वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा जहां की धरती पे लुटेरे जपें प्रभु की माला तीजा बच्चा भूखा मारें जहां चौथी बाला जहाँ नफरत ने डाला चारों तरफ है डेरा वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा जहाँ खड़े ऊंचे ऊंचे ये मंदिर और शिवाले रोटी खातिर भटकें हैं या बच्चे भोले भाले जहां जले है गुजरात गऊ नाम पे मरे कमेरा वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा बीच लुटेरों की नगरी गरीब दुःख झेल रहे मन्दिर मस्जिद पे जहाँ खूनी खेल खेल रहे जहां नफरत की बंशी बजाये है मुरारी मेरा वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा ******** 58 बेजुबान पत्थर पे लदे हैं करोड़ों के गहने मंदिरों में उसी दहलीज पे एक रूपये को तरसते नन्हे हाथों को देखा है ******* 57 मानव बोम्ब वह छात्रा डेरा परमुख की हत्या के लिए मानव बम्ब क्यों बनी ? मुस्लिम थी इसलिए अमृतधारी थी इसलिए किसी के बहकावे में आ गयी ये नौजवान युवक युवतियां यहाँ तक क्यों चले आते हैं ? क्या सोचा है कभी ? कहाँ फुर्सत है हमें दो पल की की सोचें जरा जब क्या होगा जब हमारी अपनी बेटी डेरा परमुख की हत्या कर देगी ********* 56 ज़माने में क्यों आये क्या सोचा है कभी हम क्या हैं कर पाए क्या सोचा है कभी पैदा हुए मगर खुद में ही महदूद रहे हम पड़े हैं ये पेट फुलाये क्या सोचा है कभी--- बहोत बुरा जमाना आ गया बैठे कोस रहे कौन इस को है घुमाये क्या सोचा है कभी--- भाड़ में जाये यह समाज हमारी बला से क्यों काले बादल छाये क्या सोचा है कभी--- इन्सां और समाज का बहुत पुराना रिश्ता इसको कौन बचाए क्या सोचा है कभी--- सोचने से ही परहेज तो दोष किसे देंगे कोहलू के बैल बनाये क्या सोचा है कभी--- खाने के भंडार भरे हैं मगर लाखों भूखे मरते ये किसने खेल रचाए क्या सोचा है कभी--- हर दरवाजे पर बीमार दवा का मोहताज वो कैसे सेहत बचाए क्या सोचा है कभी--- अमीरों क़ि गफलत ने इस ज़मीन पर ये कैसे नाच नचाये क्या सोचा है कभी--- *********** 55 **धरती हमारी हुई है बाँझ** धरती हमारी हुई है बाँझ किसान तपस्वी हुआ कंगाल बणी सणी ख़त्म हो गयी तथाकथित नेता रहे दंगाल गाँव गाँव में दारू बिकती घर घर में औरत पिटती बैठे ये लोग ताश खेलते महिला पर मजाक ठेलते ना किसी से कोई काम है कहता किस्में जयादा दम है बदमाशों ने लंगोट घुमाया राजनेता से हाथ मिलाया भ्रष्ट पुलिस अफसर मिला है भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट साथ खड़ा है चारों क़ि दोस्ती अब तय हैं एक दूजे क़ि बोलेन जय हैं लगा रहे हैं जोर पर जोर चारों तरफ देखो बढ़ा शोर बेरोजगारी का उठा भूचाल किसान होते जा रहे बदहाल ऊपर से नेताजी भी पुकारे उस पठे को मज्जा चखारे आगे बढ़के गलघोट लगादे कहाँ पे पड़ेगी चोट बतादे आज उसे कल उसे पटकदे सामने बोले जो उसे झटकदे याद छटी का दूध दिलाना मत इसे हमारा नाम बताना बता रहे दाँव पर दाँव देखो नेताओं में है कांव कांव देखो कुरीतियों पर चुप रहे कमान आनर किलिंग समाज में श्यान मारना और फिर मरना होगा नाम गाँव का तो करना होगा जनता तक रही है सांसें थाम बताओ यूं चलेगा ये कैसे काम हम बिना शादी के घूम रहे हैं वे गोतों के नशे में झूम रहे हैं वाह निकले हैं नहले पर दहले कौन बोलेगा वहां सबसे पहले खूब हुई देखो वहां धक्का पेल पंचायत ने वहां दिखाया था खेल अहम् सबका माइक पे टकराया फैसला खास वहां हो नहीं पाया पाँच घंटे तक मार पर मार हुई झड़प आपस में बारम्बार हुई ना दहेज़ पर बोला कोई वहां दारू पर बंद रही सबकी जुबाँ महिला भ्रूण हत्या को भूल गए बस गोत्र शादी में सब झूल गए - 24, april , 2010 ********** 54 DUSRI DUNIYA SAMBHAV HAI फ़ूड के लिए जमीं हो या फ्यूअल के लिए जमीं हो सवाल अटपटा सा है यारो समझ में नही आ रहा है अपना पेट भरे इस जमीं से या फिर भूखे मरे सवाल यही है अपनी करों की टंकी भरने को अपने पेट पर लात मारना कहाँ तक सही है इसमें बताओ समझने या दिशा भर्मित होने की कोनसी बात है ? विकास के नाम पर विनास हो यह एक अहम् सवाल हो गया है विकास के नाम पर विनास में हमारा दिल भी कही खो गया है तभी तो हम भी अपनी आल्टो के पट्रोल की चिंता ज्यादा करते है मगर गरीब के पेट की चिंता तो क्या इसका तो जिकरा भी नहीं सुनते टिकाऊ विकास हो समाज का इस पर चर्चा चिंता कुछ तो हो टिकाऊ विकास का मतलब क्या यही ना की वातावरण फ्रेंडली हो यह विकास ! जेंडर फ्रेंडली की भी है आस असमानता का भी हो विनास रेपलीकेबल भी हो विकास सोच ले हमे विकास चाहिए या फिर विनास ही चाहिए दूसरी दुनिया संभव है यारो एक बार उस तरफ अपनी नजर तो उठाइए ! उस दुनिया में निठल्ला पण नहीं चलेगा दोस्तों टीना सिंड्रोम के बारे रोजाना चर्चा करते हो कहते हो देयर इस नो अल्टरनेटिव मगर क्या कभी सुना है देएर इस पुपलज अल्टरनेटिव लेटिन अमेरिका ने हमको इस दौर में दूसरी दुनिया का ट्रेलर दिखाया है लोगो की पहलकदमी नए समाजवाद का सपना हकीकत बन पाया है ! ******** 53 17 अप्रैल 2014 दो हजार बीस तक गाँव कस्बों को ना देखिये बड़े बड़े शहरों की फ़ैली गंदी बस्तियों की तरफ ना देखिये पाश इलाकों में बनी ऊंची इमारतों को ही अब देखिये उनमें रहने वाले लोगों को देखिये तरक्की ही तरक्की नजर आयेगी चारों तरफ हमारा कार्पोरेट सैक्टर देखो हमारा इन्डस टरी सैक्टर देखो हमारा बिजनैस सैक्टर देखो हमारा फ़ौरन एक्सचेंज देखो कितने आधुनिक हो गये हम दुनिया की तीजी महाशक्ति की क्षमता हमारे अन्दर छिपी हुई बड़ी ताकत के पास अटम बोम्ब होना चाहिए वह है हमारे पास चार छः लाख फ़ौज भी है देखो थोड़ा पैसा और हो और थोड़े से हथियार और हों तो बड़ी ताकत अमेरिका की तरह हम फिर बन ही जायेंगे दो हजार बीस तक तो तब तक गरीबी बढ़ती है तो वह बढ़ने से कौन रोक सकता है इसे अशिक्षा और बेरोजगारी ये तो देखो बढेंगी यह एक सचाई है भूख और बीमारी भी दोनों ही सुनो समझो बढेंगी ही लाजमी विकास की कीमत तो चुकानी पड़ती है ना हम सबको मिलके अपनी अपनी क़िस्मत के मुताबिक लेकिन इस तर्क में जनता कहाँ है ? कीमत तो जनता ही देगी और फल उनकी क़िस्मत में ही लिखे रहते जो जनतंत्र का ढांचा खून पस्सीना बहाकर के हमने खड़ा किया था वह अब और नहीं बच पायेगा यारो बड़ी ताकत की बलि चढ़ जायेगा बड़ी ताकत बनने की बजाय हमें असली जनतांत्रिक बनने का जतन राज नीतिक और निजी जीवन में हमें खुशहाल बना सकेगा यारो !!!! ********* 52 **नोट बंदी और आम जनता ** युद्ध के समय नहीं देखी ऐसी आपातकाल में नहीं देखी ऐसी अबकी नोट बंदी ज्यादा खतरनाक मगर बगावत का माहौल नहीं था लोग दिन रात लाइनों में खड़े खड़े दम तोड़ रहे थे किसानों की खेती चौपट हो गई और मजदूर खाली हाथ घूम रहे दुकानदार भी झेल रहे मार इसकी हुए थे शिकार मंदी के किरयाने वाले कर्मचारी भी झेल रहे थे इसकी मार शादियां पोस्टपोन हो रही थी या फिर करकरा के बस फेरे पूरे किये गए थे विपक्ष पक्ष को कोस रहा था देखो तुगलक का अवतार बताया किसी ने संसद नहीं चल पा रही थी इसके चलते नितीश कुमार और अखिलेश की भाषा अपने ही ढंग की लगती थी उनको लगता था यह सब देश हित में किया गया काम है सरकार का ऐसा जनता लाइन में खड़ी सोच रही थी शायद! काला धन खत्म करने का कारगर रास्ता बताया था आतंक वाद खत्म करने का सही कदम उठाया था भ्रष्टाचार खत्म करने का रास्ता यही दिखाया था कहा वास्तव में अमीरों पर पहली बार नकेल कसी जायेगी पहली बार यहाँ इस नोट बंदी ने काले को सफेद करने की कला हमको सिखलायी थी जन धन योजनाओं में पिचहत्तर हजार करोड़ कोई पूछे कहाँ से आया यह धन? चार माह की छूट थी काले को सफेद की पैंसठ हजार करोड़ ही आये थे कहते जन धन खतों में रोजाना अरबों आ रहे थे कोई पूछे क्या मजदूरों के पास काला धन था? दो हजार का नोट लाये ही क्यों ? काले धन की रेल तेजी से दौड़ने लगी मेरे देश भारत महान में आखिर यह खेल क्यों और किसलिए खेला गया था? सोचना ही होगा बहन और भाईयो! वो जो कहा वह बिलकुल भी न हुआ तो हररोज कुछ न कुछ नया जुगाड़ भिड़ाती नजर आयी थी सरकार हाथ पैर फूल गए थे जनता लाइनों में खड़ी खड़ी देख रही थी किस दिन ये भूचाल बन जायेगा सरकार भीतर ही भीतर बहुत घबराई हुई थी बात पक्की है ये यारो दूसरे उन देशों से भी शिक्षा नहीं ली थी कि जिस देश ने नोट बंदी की वह बर्बाद ही हुआ कहते इतिहास इसका गवाह बताया सोचने की बात तो फिर भारत कैसे बचेगा? मगर सोचना हमने बन्द कर दिया है काला धन इस नगदी में तो एक प्रतिशत ही बताया है बाकी का हिसाब क्या है? बाकी तो सोने में, जमीन में, उद्योग में, डॉलर में स्विस बैंक में , भगौड़ों के पास, में बताया इनमें से किसी पर हाथ डालकर तो दिखाओ जो चिंता काले की सच में मारो छापे उनके अड्डों पर नहीं जो इस सब की पोल खोल रहे हैं छापे उनपर डलवाये जा रहे हैं आर्थिक संकट घटा नहीं बल्कि बढ़ रहा है आने वाले दिन , आने वाला दौर और मुश्किल नजर आ रहा है जनता को गुमराह करने के तरीके भी तेज कर दिए हैं असली मुद्दे आर्थिक संकट के, बेरोजगारी के, महंगाई के, महंगी शिक्षा के, महंगे इलाज के , महिला उत्पीड़न के दलित उत्पीड़न के कावड़ यात्राओं में भुलाए जा रहे हैं । असमानताओं का संकट पूरी दुनिया में बढ़ रहा है? सोचो मेरे देश भारत महान के बारे देर होती जा रही है । रणबीर ******** 51 गुर्दे का गुर्दा किडनी लगवाने वाले विदेशी मूल के किडनी देने वाले सभी देसी फूल थे बीच में एजेंट हैं साथ में डॉक्टर उसूल के जिसके गुर्दे फेल हो गए मरने को है दूसरा जीवन देना हम सबका फर्ज है गरीबी के चलते किडनियां फेल न हों उनको भी बचाना मानवता के खाते दर्ज है जिसे गुर्दा चाहिए था उसे गुर्दा दिलवाया भूख के कारण दोनों गुर्दे मरने को थे उनमें से एक गुर्दा तो बचा ही दिया दानी गुर्दे से एक और मानव बच पाया काफी लोगों को रोजगार मुहैया करवाया एजेंटों का जाल बिछा कर चुपचाप पुण्य किया गुर्दा लेने और देने का कानून सख्त इतना इससे बचने का प्रयास करना पड़ता कितना जरा सोचो तो सही दिमाग पर जोर देकर विदेशी को अपने ही देश में अपने लिए महज एक गुर्दा भी क्यों नहीं मिला भारत देश महान का गुर्दा उसे क्यों भाया पैसे का खेल है यहां पर मेरे यारों इसी कारण बदेशी देशी गुर्दा खरीद पाया इसके लिए नेता अफसर पुलिस के बिक गए बस कीमत की बात थी यारो। ********** 50 चलते चलते जिन्दगी में मिला एक राहगीर मुझको।। मिल बैठे कुछ बात हुई मन भाई तासीर मुझको।। कुछ तो था पर क्या था उसमें अब तक सोच रही दिमाग लगा कर देखा साफ नहीं तसवीर मुझको।। उसका हंसना ही था शायद जिसने मुझको बांध लिया याद आती उसके चेहरे की एक एक लकीर मुझको।। भले कुछ रोज मिले हम अपने दिलों में झांक सके थे दरिया दिल इन्सान मिला लगा बहुत गम्भीर मुझको।। कुछ दूर साथ चले थे जुल्म सितम साथ झेले हमने सम्ीाल के चलना यारो बता गया ये रणबीर मुझको।।

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69 जल रहा यहाँ सब उम्मीद करें भी तो कैसे करें नहीं पहली सी फिजां यकीं करें भी तो कैसे करें अनुशासन क़ि सीख हमें खुद सभी कानून तोड़ो ऐसा इंसाफ वहां तस्लीम करें भी तो कैसे करें खानाबदोश बनाओ हमको हमीं से गिला करो प्यार क़ि जगह कहाँ दुश्मनी करें भी तो कैसे करें ********* 68 दूसरे देशों के प्रजातंत्रों की तरह यदि भारत देश में भी यह छूट दे दी जाये की तुमाहरे बच्चों की देखभाल का खर्च सरकार करेगी तो अस्सी प्रतिशत शादियाँ यहाँ ये टूटकर बिखर जाएँगी अपने आप मानवीय सम्बन्ध बचे ही कहाँ हैं बच्चे बस एक मजबूरी बन कर खड़े हुए हैं एक पुल की तरह वर्ना कोई सम्बन्ध नहीं बचा है -- ********* 67 कितने संवेदनहीन हो गये हैं --- चोट लगकर तड़पता रहे सड़क पर हम पास से गुजर जाते हैं हम हत्यारे ही गये हैं --- अपनी ही संतान को , लड़की को पेट में ही मारने की आदत हो गयी है हमें हम सब से बड़े टैक्स चोर हो गये हैं --- चार करोड़ का समान बेचकर पचास लाख की राशि की सेल का इनकम टैक्स भरते हैं हम हम कामचोर हो गये हैं --- सरकारी नौकरी को पैसन समझते हैं और साइड बिजनैस में तन माँ धन से जुटे हैं भ्रष्टाचार की सभी सीमायें लाँघ दी हैं जयादा देर तक ऐसा नहीं चल पायेगा ********* 66 आदमी की चाहत क्या है क्या चाहता है वह ? जान देकर भी नहीं मानता जिस बात के लिए कभी एक समय में उसी बात को हंस कर खुसी खुसी मान जाता है वह क्यूं ? ********* 65 मुझे पढाया बताया मेहनत और ईमानदारी ऊंचे मानवीय गुण हैंये हम कहलाते संस्कारी ठीक उल्टा देख रहा हूँ आजके अपने समाज में बेईमानी और घोटाले छाये बड़े नए अंदाज में छः एकड़ जमीं बिकी रूपये तीन करौड़ मिले दो भाई दो बहन बांट पर रिश्ते बुरी तरह हिले भाईयों ने दी दोनों बहनों की पाँच लाख की सुपारी भून डाली गोलियों से भूल गये सब दुनियादारी बड़े को छोटे ने अपने रास्ते से चाहा हटवाना फिर सोते हुए का काट कर फैंक दिया नाहर में सिर तीन करौड़ का मालिक बना खिलाके पैसे बच गया ईमानदारी का और मेहनत का नया इतिहास रच गया अपराधीकरण और भ्रष्टाचार आज समाज में छाये इमानदार चुप बैठे इनके सामने अपना सिर झुकाए ******** 64 अन्दर और बाहर को समझना जरूरी है न समझने की भी कईयों की मजबूरी है अन्दर का मतलब हमारा अपना शरीर बाहर का मतलब वातावरण की शमशीर बाहर अन्दर को प्रभावित करता बताते अन्दर बाहर को प्रभावित करता जताते अन्दर बाहर का आपसी क्या तालमेल इसे समझने में हो ही जाता है घालमेल अंदर बहुत छिपाता हमारी हकीकत को फिर भी आ जाता बाहर कई मुशीबत को ********* 63 *दो बेरोजगार (पति -पत्नी) बहुत आसान है मेरी जिंदगी की सटीक समीक्षा करना। बहुत आसान है मेरी जिंदगी की सही तरफदारी करना। बहुत आसान है मेरी जिंदगी के प्रति मन से करुणा दिखाना । बहुत आसान है मेरी जिंदगी के प्रति असल में आंसू बहाना । मगर बहुत मुश्किल है मेरी जिंदगी जीना। स्कूल से आगे बढ़कर फिर कॉलेज में जाना होगा इसके सपने बहुत बार देखे थे मैंने । कौन से कॉलेज में दाखिला हो कई बार सोचा था मैंने यह भी। एक साल पहले सोचना शुरू किया कि पहले दिन का पहनावा क्या होगा मेरा कालेज में ? हेयर स्टाइल पर भी नजर डाली थी। सोचा क्या साइकिल पर ही मुझे कॉलेज जाना होगा हर रोज? या फिर घरवाले सेकंड हैंड स्कूटर का जुगाड़ कर देंगे। घर की हालत जुगाड़बाजी करने की भी कहां थी। यह बात नहीं मेरे भेजे के अंदर घुस रही थी। इसी उधेड़बुन में पूरा का पूरा दिन जुगाड़ बाजी के चक्कर में गुजर जाता। आखिर एक दिन 5 लोग आए थे हमारे घर में। उनकी बहुत आवभगत हुई थी। उन लोगों ने मेरे से भी पूछा- - 'बेटी कौन सी क्लास पास की है?' दूसरा सवाल था उनका -'कितने नंबर आए' मैंने धीमी से अपने नंबर बता दिए थे। उनकी नजरें मुझे घूरती सी महसूस हुई जैसे बकरे को उसके मारने से पहले कसाई उसे अपनी नजरों में से निकाल कर देखता है, उसी तरह का माहौल सा लगा मुझे । और इसके बाद कसाई बकरे को हलाल कर ही देता है। मुझे क्या पता था कि मेरा भी हलाल होने का वक्त आ गया है। और एक महीने के बाद ही मेरी शादी कर दी गई । एक और बेरोजगार के साथ । 2 बेरोजगारों की दुनिया के सपने क्या आप सोच सकते हो कि कैसे होंगे? हमने भी सोचने की कोशिश की थी खूब आगे का रास्ता देखने की। पर मैं नहीं देख पाई क्योंकि अंधेरे के सिवाय कुछ दिखाई नहीं दे रहा था । उनकी 2 एकड़ से भी कम जमीन थी। 'भूखे घर की आ गई।' 'हम क्या करें?' 'यह दिन देखने के लिए क्या छोरे को जन्म दिया था?' दाएं बाएं से परिवार वालों से यह सब सुनने को मिलता था। तब पता लगा कि सपने और हकीकत में कितना फर्क होता है। प्यार मोहब्बत बेहतर जिंदगी सब अतीत की बातें थीं। घर भी तंग से बस दो ही कमरे थे । साथ में भैंस व बछिया का भी सहवास 24 घंटे का। समझ सकता है कोई भी के दो कमरों में छह सात सदस्यों के परिवार का कैसे गुजारा होता है? कहां फुर्सत होती है एक दूसरे के लिए । चोरों की तरह मुलाकात होती हैं अपने ही घर में। बस जीवन तो घिसट रहा है हमारा। एक दिन सोचा इस नरक से कैसे छुटकारा मिले? मगर उसे ताश खेलने से फुर्सत कहां। घर खेत हाड़ तोड़ मेहनत और तान्ने । यही तो जिंदगी है हमारे जैसे करोड़ों युवक और युवतियों की भारत में। कभी-कभी जीवन लीला को खत्म करने का मन करता है । फिर ख्याल आता है कि इससे क्या होगा? किससे होगा? यही तो सवाल है सबसे बड़ा कि सही रास्ता क्या है? रणबीर ******** 62 ना इस जन्म में झूठ बोला ना कभी दुकान पे कम तोला फिर भी भगवान नाराज हुआ हार्ट अटैक मुश्किल इलाज हुआ मैंने पूछा मुझे क्यों कष्ट मिला बताया पिछले का सिलसिला इसका कब होगा मेरा हिस्साब अगले में मिलेगा तुम्हें जवाब पिछला ना कभी जान पाया नहीं अगला समझ में आया आज की बाबत नहीं बताते अगले पिछले में हमें फँसाते दम मारो दम मिट जाएँ गम देवी देवता हमारे इनके हैं हम ********** 61 सहारे मत बना ए दिल सहारे रूठ जाते हैं ना किस्मत पेभरोसा कर सितारे टूट जाते हैं साहिल पर आके ना समझो कि पार आ गए जरा सी लहर आयी तो किनारे छूट जाते हैं राज दरबारों में न जाना वहां पे क्या रखा है पेट की खातिर ही तो वे उनके झूठ गाते हैं सच कहना अगर बगावत तो हम भी बागी ज्यादा हवा भरने पर ये गुब्बारे फ़ूट जाते हैं भगत सिंह के देश का फिर से देखा सपना आखिरकार लूट के ये शिकारे डूब जाते हैं अमीर गरीब की खाई बढ़ा विकास करेंगे वो एक न एक दिन झूठे जनता के बूट खाते हैं। ******** 60 बेमौसम की बरसात हुई है कैसा कहर ढाया है गेहूं हुआ खराब खेत में मण्डी ने गुल खिलाया है मौसम हुआ ठंडा कहते मगर ठंडा हुआ किसान भी ख़राब पकी पकाई खेती ढह गए सब अरमान भी मन्दी की मार ने मारा आज बरसात ने हिलाया है किसान कब तक सहे इसको मान किस्मत का खेल किस्मत नहीं ये सरमायेदारी ने बनाई उसकी रेल ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते ये मौसम में बदलाव आया है क्लाइमेट चेंज के दोषी ज्यादा अमीर देश बताये हैं फार्म हाउस गैसों के अम्बार उन्ही ने लगाए हैं बेमौसम बादल हुए तो किसान पे संकट छाया है किस्मत की बात नहीं सिस्टम का खेल समझ आया सिस्टम असली दोषी छिपाये झूठ का प्रपंच फ़ैलाया किसान समझ रहा खेल सड़कों पे आके बताया है

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79 पदार्थ परम सत्य है इससे बना संसार बताया है इसका विकसित रूप आदमी जिसने समाज बनाया है मानव के अंदर सब कुछ आत्मा इसका हिस्सा है बाहरी ताकत स्वर्ग नर्क ये सब झूठा किस्सा है पदार्थ के गुणों ने दुनिया को आगे बढ़ाया है पदार्थ के अंदर निरन्तर एक गति देती दिखाई यही गतिशीलता नए गुणों को जन्म देती बताई पदार्थ का विकास होता प्रकृति नियम रचाया है ******** 78 हरियाणा विकास मॉडल बना है ये विकास में हरियाणा नम्बर वन हो रहा कैसे बस कुछ ना पूछो भाई पिछलों को सबको धो रहा सब ही निडर घूम रहे हैं यहाँ ये भ्रष्टाचार यहाँ से खो रहा शिक्षा ने उचाईयां छू ली हैं बहुत उम्दा और कीमती है जिसका भार गरीब ढो रहा सेहत मान और पहलवान दुनिया में किया है गुनगान भले अनीमिया और ज्यादा गर्भवती औरत को डुबो रहा हरियाणा नम्बर वन हो रहा फसल के दाम सबसे ज्यादा मिलते हैं निठ्ठले किसान को जमीन बेचो फायदा उठाओ ये मंत्र दिया है हर इंसान को फिर भी क्यों किसान रो रहा यह कोई नहीं जानता है कि पिछले पांच साल के अन्दर हमने विश्व बैंक से कितना लोन लिया है बताये तो कोई बीएड कालेज धड़ाधड़ खुले फीसें मनमर्जी की ली गयी शिक्षक और छात्र भी बैठ के कक्षा में रोज मजे से सो रहा ******** 77 बड़ी मुश्किल से ये आंसू छिपाए हमने हँसना चाहा झूठे ठहाके लगाये हमने तुमको मालूम ये शायद हो के ना हो तुम्हारे जाने के बाद आंसू बहाए हमने प्यार किया हमने नहीं छुपाया कभी दिल के तराने थे तुमको सुनाये हमने तेरे साथ इन्कलाब के जो नारे लगाये यारो अब तलक नहीं हैं भुलाये हमने राह का साथ छोड़ गये अफ़सोस तो है पल याद हैं वो जो संग बिताये हमने जानते हैं आप हमें नहीं भूल सकेंगे एक अनुभव बस बिंदु दिखाए हमने हादसा नहीं एक सच्चाई है ये प्यार ग्लानी नहीं रास्ते नए बनाये हमने ******** 76 मैडम सीतारमन ने संसद में यह था फरमाया देखो लोगों की आए दोगुनी कर दी इसका बिगुल बजाया देखो जिंदगी बहुत बेहतर बना दी दुनिया में नाम कमाया देखो दस ट्रिलियन की तीसरी अर्थव्यवस्था इसे बताया देखो पिछले दस साल की तरक्की की घंटी कमाल की बजी देखो मुख्यधारा चाटुकार मीडिया ने भी छोड़ी नहीं कोई कमी देखो बार बार झूठ की बहार जनता के एक हिस्से को जमी देखो केंद्रीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर इन बातों को नहीं मान रहे रघुराम राजन इन सभी दावों को बता झूठा बड़ा बखान रहे आईएमएफ जैसी संस्थाएं भी बहुत से सवाल तान रहे तरक्की में भी आत्म हत्याओं के आंकड़े कर परेशान रहे ********** 75 नई दुनिया - प्यार की दुनिया नई दुनिया का सपना हम दोनों ही देख रहे हैं।। सोचा अपने अपने ढंग से कहते हुए झेंप रहे हैं।। 1 झेंप मिटी साथ चले सोचा जीवन सफल हो गया अलग अलग जातें हमारी जिनका मतलब खो गया ब्यां नहीं कर सकते सब हम पर उंगली टेक रहे हैं।। 2 प्रेम विवाह को समाज में देखा क्या दर्जा मिलता खूंखार हो जाता है समाज देख कर ही दिल हिलता बिना बात की बात में निकाल मीन मेख रहे हैं।। 3 तुम्हारी जिद प्यार का विरोध तो जिद हमारी भी है प्यार को परवान चढ़ायेंगे इसमें इज्जत तुम्हारी भी है जात के तवे पर देखो ठेकेदार रोटी सेंक रहे हैं।। 4 जातें अलग अलग हमारी मगर मानवता है भरपूर जाति की सीमा मालूम है इसके बन्धन नहीं मंजूर एक अपना सा घर बनाएं यही इरादे नेक रहे हैं।। ******** 74 तुममें शिकश्त और जिल्लत का अहसास बाकी पता हमें तुममें अभी नफरत का अहसास बाकी कितना ही दिखावा करो अपनी सादगी का तुम खूब तुममें देखा है हिमाकत का अहसास बाकी मुहब्बत से कहते हैं दौलत का कोई वास्ता नहीं तुम्हारे दिल में अपनी दौलत का अहसास बाकी कितना ही अपमान करो तुम बार बार ये हमारा रहेगा हममें फिर भी कयामत का अहसास बाकी हमारी शराफत को करदो बिल्कुल तार तार तुम रणबीर को रहेगा ही शराफत का अहसास बाकी ******** 73 कहते तुम्हारी क़िस्मत में खोना सोचो तो यारो क़िस्मत का खेल मान कर हमने इसको ढ़ोया अपने हाथों से खुद हमने बीज कीकर का बोया क़िस्मत क़ि मार को क्यों ढ़ोना सोचो तो यारो दिलो दिमाग पर मेरे तो यही सब तो छाया है आज जो कुछ भी हूँ मैं मेरे नसीब ने बनाया है औरों के खेलने का ये खिलौना सोचो तो यारो बात समझ में आ गयी क़िस्मत का खेल नहीं बिना इन्सां के चल सकती यह देखो रेल नहीं ********* 72 हर एक कदम पर हादसा होना सोचो तो यारो हमारे सिस्टम में क्यों है रोना सोचो तो यारो जो कुछ कमाया हमने छीन लिया चालाकी से किसी ने नहीं समझाया ये सब खेल बेबाकी से ********** 71 गाँव जो टिका था अन्याय पर एक दिन उसे ढहना ही था ना बराबरी के गाँव भक्तों को एक दिन यह सहना ही था बिगड़ गया गाँव का माहोल महिला सुरक्षित नहीं वहां नशाखोरी बढती जा रही ढूध दही का था सेवन जहाँ ********** 70 हमारी आह भी गुनाह कतल भी मुआफ उनके कैसे जल जाती शमां बयाँ करें भी तो कैसे करें किसने किसे तडफाया है सही हिसाब करेगा कौन ये तुम्हारी बात यहाँ मंजूर करें भी तो कैसे करें सच कहना अगर बगावत है तो हम दोषी हैं रणबीर झूठा इम्तिहाँ पास करें भी तो कैसे करें

99 से 80

99 बाजार में सब चीजों की बोली लगादी गुरु शिष्य का रिश्ता कैसे बचता यारो पैसे ने चारों तरफ दहशत सी फैलादी फिर भी लड़ेंगे जीजाँ से हम सब यारो कुछ लाइनों में बात पूरी हमने बतादी ******** 98 जिन्होनें न दी माँ बाप को भर पेट रोटी जीते जी कभी आज उनके मर जाने के बाद उन्हें भंडारे लगाते देखा है ******** 97 RAHGEER चलते चलते जिन्दगी में मिला एक राहगीर मुझको|| मि ल बैठे कुछ बात हुई मन भाई तासीर मुझको|| कुछ तो था पर क्या था उसमें अब तक सोच रही दिमाग लगाकर देखा साफ नहीं तसवीर मुझको|| उसका हंसना ही था जिसने मुझको बांध लिया याद आती उसके पेहरे की एक एक लकीर मुझको|| कुछ पल मिल बैठे हम अपने दिलों में झांक सके थे दरिया दिल इन्सान मिला बांध गया जंजीर मुझको|| कह नहीं सके एक दूजे को दिल की बात कभी हम सुहानी यादों की दे गया खजाने की जागीर मुझको|| होन्डा के आन्दोलन में शहीद हो गया वो साथी मैं समझूं या अनजान बनूं संदेश दिया गम्भीर मुझको|| साथ चले साथ हंसे थे साथ ही सितम झेले हमने सम्भल के चलना यारो बता गया रणबीर मुझको|| ******** 96 कुछ नए बन रहे कुछ पुराने बने हर कदम पर यहाँ कैदखाने बने किस तरफ से चली गोलियां क्या पता किन्तु हर बार हम ही निशाने बने था क्या हमने सोचा ये क्या हो गया हमें क्यों इस चमन से गिला हो गया दिया जिसकी खातिर था हमने लहू वही मौसमें गुल क्यों खफा हो गया ******* 95 हमने खोल के दिल से बातें करनी चाही बहुत सोच समझ कर अपनाई ये राही मेहनत और ईमानदारी की की है बाही गंदे विचार और गंदगी दिमाग से ताही ******* 94 बचपन की दोस्ती बहुत अलग होती देखो || जवानी की दोस्ती अलग बीज बोती देखो || हर उम्र की दोस्ती की मांग अलग होती है अधेड़ उम्र की दोस्ती तान कर है सोती देखो || अकेलापन अखरता बिना दोस्ती बुढ़ापे मैं बुढ़ापे की दोस्ती पुराणी यादें संजोती देखो || टिकाऊ दोस्ती या भरोसे की दोस्ती कहो विचार और स्वभाव की समता पिरोती देखो || वक्त बदलते हैं रिवाज बदलने का दस्तूर भी सच्ची दोस्ती अपना भार उम्र भर ढोती देखो || चाहे ये दुनिया इधर से उधर हो जाये यारो पक्की दोस्ती अपना सबब नहीं खोती देखो || ******* 93 आज रास्ते बदल लिए मौका परस्ती दिखलाई पन्द्रह साल तक तुमने कदम से कदम मिलाई चुनौती ज्यादा गंभीर आज जब सामने है आयी भूल गए वो इंकलाबी नारे नकली कुर्सी है भाई ******** 92 बड़ी मुश्किल से ये आंसू छिपाए हमने हँसना चाहा झूठे ठहाके लगाये हमने तुमको मालूम ये शायद हो के ना हो तुम्हारे जाने के बाद आंसू बहाए हमने प्यार किया हमने नहीं छुपाया कभी दिल के तराने थे तुमको सुनाये हमने तेरे साथ इन्कलाब के जो नारे लगाये यारो अब तलक नहीं हैं भुलाये हमने राह का साथ छोड़ गये अफ़सोस तो है पल याद हैं वो जो संग बिताये हमने जानते हैं आप हमें नहीं भूल सकेंगे एक अनुभव बस बिंदु दिखाए हमने हादसा नहीं एक सच्चाई है ये प्यार ग्लानी नहीं रास्ते नए बनाये हमने ******* 91 हरयाणा नम्बर 1 क्लेम किया जा रहा है 1 बेरोजगारी कम करने में 2 गुणकारी शिक्षा सबको देने में 3 महंगाई पर काबू पाने में 4 गुणवत्ता पूर्ण इलाज सबको देने में 5 महिला उत्पीड़न कम करने में 6 कृषि संकट हल करने में 7 सामाजिक न्याय हासिल करने में आपकी राय रखना जरूर या भेजना 9812139001 क्या यह सब सही है??? ********* 90 ऊट पटांग पुलिस तुम्हारी फ़ौज तुम्हारी मीडया तुम्हारा कोर्ट बीचारी जनता द्वारा जनता के लिए चुनी हुई ये सरकार हमारी जनतंत्र का झुनझुना पकडाया कार्पोरेट की करे है ताबेदारी मसला इस या उस नेता का नहीं जनतंत्र की पोल खुल गयी सारी कैसे मजबूत हो जनतंत्र भारत का कैसे जनता की बढे हिस्सेदारी सवाल आया है तो जवाब भी ढूंढेगी मिलके ये जनता सारी ******** 89 वह धंसती है वह खसती है वह फंसती है वह चरती है उसपे मस्ती है वह भिड़ती है सोचो कौन है वह भैंस हमारी अरे हम भी तो जिन्दा इन्सान हैं ******** 88 एक गरीब महिला की नजर से हमारा इम्तिहान लिया हर बार पास हुए सब कुछ तुम्हारे पास फिर भी उदास हुए पता है तुम्हारा तुम एक अमर बेल हो रब राखा क़िस्मत का रचा रहे खेल हो आज कल तुम्हारा अहम् और ये अहंकार दिखाता है तुम्हारे अन्दर का पूरा अंधकार सच है कि अंधी गली में तुम बढ़ते जा रहे अपनी मौत के खुद ही श्लोक पढ़ते जा रहे इल्जाम मुझको सफाई नहीं करनी आती मेरे घर आंगन को मैं साफ ना रख पाती एक राज बस तुमको ही बस बताती हूँ मैं बताओ तुम्हारे फर्श कैसे चमकाती हूँ मैं तुम्हारे दरवाजे पे गए तुमने दुत्कार दिया हमारे दरवाजे पे आये हमने सत्कार किया इंसानियत और हैवानियत का फर्क यही तो दुत्कारा तोभी आँखों पे बिठा के प्यार किया कुदरत से प्यार जिसका तुम भी एक हिस्सा हो विश्व ग्राम का चर्चित तुम एक अहम् किस्सा हो बदलाव नियम है कुदरत का इतना तो जान लो दिशा गलत या ठीक है इतना अब पहचान लो तन मन जन हो सुखी जीवन का लक्ष्य मेरा विवेक के प्रकाश से भागे अंध विश्वास घनेरा सेहत के लिए चाहिए साफ पानी भोजन हवा फिर बिल्कुल नहीं चाहिए हमको कोई दवा ******** 87 पति पत्नी का झगडा ओबामा ने करवा दिया पत्नी बोली क्यों इस भारत को मरवा दिया सोच कर बोला करो महाशक्ति बना दिए हम ओबामाजी ने भारत का सिर ऊंचा उठवा दिया पत्नी माथा पकड़ के रोऔगे पता लगेगा तुम्हें ऊंचा क्या उठाया भारत सिर उल्टा झुकवा दिया एक भी हमारे हित का कौनसा समझौता हुआ आँखों में धूल झोंक दी लगा कोठा भरवा दिया पति बोला पहली बार भारत को सम्मान दिया प्रतिबंध जितने हमने लगाये सबको हटवा दिया ********* 86 कहना बहुत आसान है मुश्किल चलना सच्चाई पर लहर के उल्ट तैर कर ही पहुंचा जाता अच्छाई पर बुराई की ताकत को यारो देख कर डर जाते हम इसके दबाव में बहुत सी गलती भी कर जाते हम आका बैठ के हँसते रोजाना फिर हमारी रुसवाई पर मेहनत हमारी की अनदेखी रोजाना हो रही यारो चेहरे की लाली हम सबकी रोजाना खो रही यारो कहते वो हमको बेचारा जो जीते हमारी कमाई पर बीज है खाद और खेत भी इससे फसल नहीं उगती फसल उगती है तब यारो जब मेहनत हमारी लगती महल बने ये सभी तुम्हारे हम सब की तबाही पर ********** 85 मिल गया राहगीर मुझको एक दिन चलते चलते बात बताई बहुत पते की पर थोडा सा डरते डरते कहा अपने पर कर भरोसा दुआ करना बंद करदे कुछ नहीं कर पायेगा तूं उसकी दुआ करते करते ये विश्वास तेरे से छीना इस दुआकी करामात से कमाल दुआ करता रहता तूं बेमौत मरते मरते दिन देखा नही रात देखी आंख मींचकर लगा रहा जिंदगी पूरी लगादी तूने उनका पानी भरते भरते उठ विश्वास लौटा देख दुनिया अपनी आँखों से पता है वक्त लगेगा इस दुआ से उभरते उभरते ********* 84 संकट और नवजागरण आज देश हमारा चौतरफा संकट से घिर गया उदारीकरण के कारण सिर उनका फिर गया वैश्वीकरण के नाम पर कितना कहर ढाया है आर्थिक संकट बेरोजगारी ने उधम मचाया है छंटनी महंगाई लूट खसोट आज बढती जा रही भ्रूण हत्या और दहेज़ की आँधी चढ़ती आ रही कठिनाईयों का बोझ ये महिलाओं पर आया है युवा लड़कियों की दुनिया पे काला बादल छाया है गहरे तनाव में लड़कियां ये जीवन बिता रही हैं फिर भी हिम्मत करके करतब खूब दिखा रही हैं सारे रिश्ते कलंकित हुए आज के इस संसार में सगे सम्बन्धी परिचित फंसे घिनोने बलात्कार में शिक्षक का रिश्ता भी तो हरयाणा में दागदार हुआ अभिभावकों का दिलो दिमाग आज तार तार हुआ सामाजिक मूल्यों में आज गिरावट आई है भारी चारों तरफ अपसंस्कृति की छाई देखो महामारी फेश बुक पर चैटिंग से नहीं समाज बचने वाला उदारीकरण और ज्यादा भोंडे खेल रचने वाला वंचित तबके और महिला युवा लड़के लड़कियां मिलके खोलेंगे जरूर समाज की बंद खिड़कियाँ इंसानी रिश्ते बनेंगे रंग भेद जात भूल जायेंगे नवजागरण का सन्देश घर घर तक पहुंचाएंगे ******** 83 बे मोसम की बरसात बे मोसम की बरसात कैसा कहर ढाया है ख़राब गेहू खेत मैं मंडी नै गुल खीलाया है मोसम तो ठंडा मगर ठंडा हुआ कीसान भी ये पकी पकाई खेती ढहे बहोत अरमान भी मंदी की मार ने मारा बरसात ने हीलाया है कीसान सह लेगा इसे मान कीस्मत का खेल पता नही चलेगा कीसने बनायीं उसकी रेल ग्लोबल वार्मीग से मोसम में बदल आया है क्लाईमेट चेंज हो गया दोसी अमीर बताये हैं फार्म हॉउस गैसों के अम्बार वही लगाये हैं बेमोसम ओलों का कीसान पे संकट छाया है कीस्मत की बात नहीं ये सीस्टम का खेल है असली दोसी छीपा रहे सीस्टम की धकापेल है सच झूठ जान लियो खोल सब बतलाया है ********* 82 हमें याद करने की कोशिश कीजिये यारो वक्त तो अपने आप मिल ही जायेगा देखो तमन्ना मिलने की ये दिल से सोचिये यारो बहाना कोई न कोई मिल ही जायेगा देखो ******** 81 वजूद तुम्हारा मुमकिन नहीं बिना वजूद हमारे सिस्टम की नजाकत है खिले हैं आँगन तुम्हारे हमारी मेहनत पर खड़े होकर हुंकार रहे आज भक्षक बनके रक्षक खड़े अपने घर बार निखारे ********* 80 मैंने मानवता का आचरण अपनाने की कोशिशें की मानवता से दूर हटाने की बहकाने की कोशिशें की जिद है तुम्हारी हटाने की तो जिद हमारी कि डटे हैं काले धन की चाल काली बरगलाने की कोशिश की