Monday, July 8, 2024
227 से 250
250
कीमत
यह सच है कि किसान
घोलते हैं हमारे व्यंजनों में
मिठास अपनी मेहनत से
लेकिन बेहद कडवा है
इसका दूसरा पहलू
गन्ना पैदा करता मगर
नहीं मिल पाती वाजिब
कीमत उसे अपनी
मेहनत की
आखिर ऐसा क्यों ?
***********
249
मेरा कस्सूर
मेरा कसूर
हमने दोनो ने मिलकर सोचा
जिन्दगी का सफ़र तय करेंगे
बहुत सुन्दर सपने संजोये थे
प्रेम का पता नहीं ये हरयाणा
क्यों पुश्तैनी दुश्मन बन गया
यह सब मालूम था हमको पर
प्यार की राहों पर बढ़ते गए
मेरे परिवार वाले खुश नहीं थेa
क्यों मुझे पता नहीं चला है
न तो मैंने एक गोत्र में की है
न ही एक गाँव में शादी मेरी
न ही दूसरी जात में की मैंने
तो भी सब के मुंह आज तक
फुले हुए हैं हम दोनों से देखो
प्यार किया समझा फिर शादी
ससुराल वाले भी खुश नहीं हैं
शायद मन पसंद गुलाम नहीं
मिल सकी जो रोजाना उनके
पैर छूती पैर की जूती बनकर
सुघड़ सी बहु का ख़िताब लेती
दहेज़ ढेर सारा लाकर देती ना
प्यार का खुमार काम हुआ अब
जनाब की मांगें एकतरफा बढ़ी
मैं सोचती हूँ नितांत अकेली अब
क्या हमारा समाज दो प्रेमियों के
रहने के लायक बन पाया यहाँ \
चाहे कुछ हो हम लोड उठाएंगे
मगर घुटने नहीं टिकाएंगे यारो
वो सुबह कभी तो आयेगी की
इंतजार में ये संघर्ष जारी रखेंगे
झेलेंगे इस बर्बर समाज के सभी
नुकीले जहरीले तीर छाती पर ही
जिद हमारी शायद यही है कसूर
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248
TO OPPOSE
कहना बहुत आसान है मुश्किल चलना सच्चाई पर
लहर के उल्ट तैर कर ही पहुंचा जाता अच्छाई पर
बुराई की ताकत को यारो देख कर डर जाते हम
इसके दबाव में बहुत सी गलती भी कर जाते हम
आका बैठ के हँसते रोजाना फिर हमारी रुसवाई पर
मेहनत हमारी की अनदेखी रोजाना हो रही यारो
चेहरे की लाली हम सबकी रोजाना खो रही यारो
कहते वो हमको बेचारा जो जीते हमारी कमाई पर
बीज है खाद और खेत भी इससे फसल नहीं उगती
फसल उगती है तब यारो जब मेहनत हमारी लगती
महल बने ये सभी तुम्हारे हम सब की तबाही पर
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247
गुनाह उनका सजा हमें
उनके गुनाहों की हमको किसलिए सजा मिले
ऐसा इंसाफ क्यों हो किसलिए ऐसी क़ज़ा मिले
नाहक ही हम बेकसूरों की क्यों जान चली जाये
कैसे हम जैसों को जीने की यहाँ फिजा मिले
तुम्हारे सताने से हम रोये बहुत कई बार ही
मग़र अब ना रोयेंगे ताकि तुम्हें ना मजा मिले
तुम लूट कर हमें रहो सुख चैन से आबाद
बताओ तो कसूर क्यों उल्टा हमें खिजा मिले
हमारी मेहनत पर रणबीर वे ऐश करते हैं
न्याय देखो हमें सुखी रोटी उनको पिज्जा मिले
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247
घूंघट में छात्रा वधु
पन्द्रह सोलह बरस की
छात्रा दर्जे दस की
बालिका वधु बनी
ससुराल में है पढ़ रही
हमें पास से देख रही है
बड़ी आस से देख रही है
शायद मिट जाए सन्ताप
सदियों से जो लगा हुआ है
असूर्यपश्या का अभिशाप
और हम हैं कि दौड़ रहे हैं
परम्पराओं की गाड़ी में
खड़े हैं मर्यादाओं की अगाड़ी में
घूंघट का झँडा फहरा रहे हैं
कल्चर के गीत गा रहे हैं
लेकिन उसकी नंगी आँखों से
आँखें नहीं मिला सकते
कितने कमजोर हैं हम
सीधे बातें नहीं चला सकते
पर्दा गिराया हुआ है जो
झीनी चुनरी का बीच में
अंटा पड़ा है व्यक्तित्व
पूरा एक इन्सान का
जिसे थाह खोजना है
ऊंचे आसमान का
पढ़ने की जो मिली इजाजत
नहीं रुकेगी बात यहाँ
ससुराल और मायके से
आगे भी जानेगी जहाँ
पंख फैला कर शिक्षा के
वो आसमान को लांघेगी
और घूंघट की चुनरी का
बना के परचम थामेगी
मंगतराम शास्त्री 10/3/03
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246
नौंजवानों का हाल सुनाऊं,
साच्ची बात ना झूठ भकाऊं,
बिना नौकरी दुखी दिखाऊं ,
के होगा इस हरियाणे का।।
बेरोजगारी बढ़ती जावै सै,
शिक्षा महंगी होंती आवै सै,
युवक युवती हाँडै खाली,
खत्म हुई चेहरे की लाली,
नशे नै कसूती घेरी घाली,
के होगा इस हरियाणे का।।
छोटा मोटा ठेके का काम यो,
ठेकेदार खींचै म्हारा चाम यो,
तनखा मिलती घणी थोड़ी,
मालिक बणे हाँडै करोड़ी,
काम नै म्हारी कड़ तोड़ी,
के होगा इस हरियाणे का ।
बेरोजी नै युवा रूआया रै,
संकट सिर ऊपर छाया रै
नशे का पैकेज ल्याये देखो ,
युवा इसमें फँसाये देखो,
अंधविश्वासी बनाये देखो,
के होगा इस हरियाणे का।
मजबूत संगठन बनाना हो
संघर्ष मिलकै चलाना हो
सोचां युवा युवती सारे रै,
कैसे क्लेश मिटेंगे महारे रै,
छोड़ जात पात के नारे रै ,
फेर कुछ होगा हरियाणे का ।
*********
245
सब कुछ बहता जा रहा है
एकाध खड़ा रम्भा रहा है
सफेद धन ढूंढें मिलता यहाँ
काला धन सब पे छा रहा है
गंभीरता शिकार हुई उतावलेपन की
मानवता शिकार हुई शैतानियत की
इमानदारी शिकार हुई बेईमानी की
वो शिकारी हैं और हम शिकार उनके
खेल पूरे यौवन पर है जीत उनकी है
पर डर सता रहा है उनको क्योंकी
जीत कर भी हारेंगे ही अम्बानी जी
हार कर भी जीत तो हमारी ही होगी
क्योंकी मानवता इंसानियत गंभीरता
ये तो हमारे पास ही हैं और रहेंगी भी
*********
244
प्यार का तोफा
एक लड़की ने एक लड़के से प्यार किया
लड़के ने उसे बलात्कार का उपहार दिया
इतने मेंभी सबर नहीं उस वहसी को आया
अपने चार मुसटन्ड़ों को था साथ में लाया
उन्होंने भी बारी बारी मुंह किया था काला
गिरती पड़ती ताऊ के घर पहुँची थी बाला
ताऊ को बाला ने सारी हकीकत बताई थी
ताऊ ने भी वह हवस का शिकार बनाई थी
माँ बाप ने जाकर बाला को छुड वाया था
पुलिस में हिम्मत कर केस दर्ज कराया था
गाँव के कुछ नौजवानों ने आवाज उठाई थी
पाँचों की और साथ ताऊ की जेल कराई थी
आज भी जेल में पैर पीट रहे हैं सारे के सारे
क्या हुआ समाज को हवस ने हैं पैर पसारे
**********
243
अभी तो शुरुआत है
लालच खुदगर्जी ये
हमें शैतान बनायेंगी
जरा संभल के !!!!!
हमारी इंसानियत को
हवानियत में तब्दील
करने के अथक प्रयास
किये जा रहे हैं दोस्तों
अबतोसंभलना ही होगा
जितना समझा दुनिया को
उतना दुःख बढ़ता गया मेरा
कि इतना भेदभाव क्यूं है
क़िस्मत का ये जुमला तेरा
मुझे सबसे बड़ा हथियार लगता
इस भेदभाव के असली कारणों
को छिपाने का !!!!!!!!!!!!
********
242
एक लड़की ने साहस किया और आवाज उठाई
बदतमीज गुरु जी ने अपनी बदनीयत दिखाई
कुछ लडकीयों ने साहस किया और भीड़ गयी
गुरु जी की सरेआम की सबने मिल कर पिटाई
केस दर्ज होने जा रहा था उस गुरु के खिलाफ
लड़की के बाप ने बीच में आकर के खेल रचाई
पैसे लेकर केस बिगड़ दिया गुरु छुट गया साफ़
यह कहानी नही हकीकत है आप तक पहुंचाई
कहाँ जा रहे हैं हम समझ नहीं पा रहा दोस्तों
एक घटना नहीं है ऐसी घटनाओं की बाढ़ आयी
*********
241
दलित महिला से गैंग रेप हिसार में
अपराधी खुले घूमें वहां बाजार में
दलित ही नहीं यह महिला का सवाल
ताकतवर दबंग और पैसे का बबाल
कमजोर की बहू सबकी जोरू कहते
गरीब ही सबसे ज्यादा जुलम सहते
**********
240
झाँसी क़ि रानी की गंभीर की फिलहाल जरूरत है
भारत देश की सही तस्वीर की फिलहाल जरूरत है
कुरुक्षेत्र के मैदान मैं कहते सच की जीत हुई थी
द्रोपदी चीर हरण हुआ कलंकित ये रीत हुई थी
एकलव्य वाले तीर की फिलहाल जरूरत है
बुराई फैलती जा रही थी इस भारत के समाज मैं
ज्योतिबा फुले रमाबाई उभरे थे नए अंदाज मैं
दोहों वाले उस कबीर की फिलहाल जरूरत है
अंड वंड पाखंड खिलाफ जमके लड़ी लड़ाई देखो
सत्य की खोज में तयार करे बहन भाई देखो
उस दयानंद से फकीर की फिलहाल जरूरत है
ठारा सो सतावन में लाखों फंसी फंदा चूम गए
राजगुरु सुखदेव भी आजादी की खातिर झूम गए
उस भगतसिंह से रंधीर की फिलहाल जरूरत है
जलियाँ वाले बाग़ का बदला दिल में ज्योति जलाई
जालिम डायर की लन्दन में जाके थी भया बुलाई
उस उधम सिंह बलबीर की फिलहाल जरूरत है
जवाहर गाँधी रविन्द्र देश आजाद करना चाहया
अनगिनत लोग थे जिन्होंने था अपना खून बहाया
अंहिंसा पुजारी गाँधी पीर की फिलहाल जरूरत है
मजदूर किसान की खातिर जिंदगी ही न्योछार दई
मार्क्स ने दुनिया के बारे में एक नई सी विचार दई
उस मार्क्सवादी शूरवीर की फिलहाल जरूरत है
महिला दलित का दोस्त आज चाहिए समाज इसा
पूंजीवाद राज अन्यायी ख़त्म हो मंदी का राज इसा
तोड़ने की जुल्मी जंजीर की फिलहाल जरूरत है
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239
सच छिपाए न छिपे
एक बार भोपाल से ग्वालियर
ट्रेन से अपने घर जा रहा था मैं
उसी ट्रेन में उसी डिब्बे में एक
लड़की पास की सीट पर बैठी थी
थोड़ी बातचीत शुरू हुयी तो पूछा
मेरे घर परिवार के बारे में उसने
बताया पिता हाई कोर्ट में जज मेरे
मम्मी सुप्रीम कोर्ट की वकील हैं
लड़की मन ही मन में हंसने लगी
समझ नहीं सका मैं उसका हँसना
अपनी सीट पर लेट सो गया मैं
घर पहुंचा तो देखा वही लड़की
मेरे घर पर मेरे से पहले पहुंची थी
देख मुझे बहुत जोर से हँसी लड़की
असल में मेरी मौसी की बिटिया
मैंने सफ़र में पहली बार देखा उसे
उसकी हँसी ने शर्मशार किया मुझे
क्योंकि ट्रेन में जो बताया था मैंने
सभी कुछ झूठा था था कथन मेरा
उस दिन के बाद मैंने कसम खाई
अब के बाद झूठ नहीं बोलूँगा मैं
बहुत हद तक कसम मैंने है निभायी
कभी कभी झूठ बोलता हूँ मैं तो
ट्रेन का नजारा जरूर याद आता
एक बार फिर मुझे याद दिला जाता
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238
इम्तिहान
हमारा इम्तिहान लिया हर बार पास हुए
सब कुछ तुम्हारे पास फिर भी उदास हुए
पता है तुम्हारा तुम एक अमर बेल हो
रब राखा क़िस्मत का रचा रहे खेल हो
तुम्हारा अहम् और ये अहंकार
दिखाता अन्दर का पूरा अंधकार
अंधी गली में तुम बढ़ते जा रहे
अपनी मौत के श्लोक पढ़ते जा रहे
********
237
कारोबार नया साल हुआ
आज नए साल का मनाना भी एक कारोबार हो गया
बनावटी पन लटके झटके मस्त हमारा घरोबार हो गया
कैटरिना मलायका के ठुमके कैसी इन्तहा ये बेहयाई की
देखके पूरा हिंदुस्तान ख़ुशी से कितना ये सरोबर हो गया
एक फुटपाथ पर बैठा हुआ वह यह सब देख रहा है
दो चार लकड़ी इकठी करके हाथ अपने सेक रहा है
सामने दुकान पर देखी ठुमकों की झलक थोड़ी सी
घरवाली ने देख लिया तो सच मुच ही झेंप रहा है
नए साल का जश्न मनाकर आज मुंबई छाई देखो
ठिठुरे बचपन और जवानी ये गाँव की रुसवाई देखो
लड़की मांरके पेट में हमने लूटी है वाह वाही देखो
शराब नशा और मस्ती ठुमकों की ये बेहयाई देखो
गला काट मुकाबला आज दुनिया में है छाया देखो
भाई का भाई दुश्मन इसने यहाँ पर है बनाया देखो
आखिर कहाँ जा रहे है हम जरा देर सोचो तो यारो
इंसानियत का चेहरा यहाँ पर किसने है चुराया देखो
************
236
क्या कहूं
सौ बार मरना चाहा आँखों में डूबकर के हमने
हर बार निगाहें झुका लेते हमें मरने नहीं देते
तुझे देखे बिना तेरी तस्वीर बना सकता हूँ मैं
तुझसे मिले बिना तेरा हाल बता सकता हूँ मैं
दिल में क्या है तेरे सब तो जता सकता हूँ मैं
क्या सोचते रहते दिन भर गिना सकता हूँ मैं
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235
मेरी शादी से पहले
मेरी शादी से पहले परिवार ने
खूब पूछताछ छानबीन की थी
बहुत गुणवान लड़का है कोई
मांग नहीं हैं उनकी सीधे सादे
सैल पर दो एक बार बात की
सपनों के संसार में खो गए हम
बस झट मंगनी और पट ब्याह
महीना दो महीना बहुत यादगार
गुजर गया वक्त पता नहीं चला
फिर असली जिन्दगी से सामना
हुआ मेरा तो बस धडाम से गिरी
सोचा यह सब किससे साँझा करूँ ?
या फिर घुट घुट के मैं यूं ही मरूं
उसकी शिकायत कि माँ को मैं
बिल्कुल खुश नहीं रख पा रही हूँ
बहुत देर बाद समझ आया कि
खुश ना रहने का दिखावा करती माँ
मुझे प्रताड़ित करना फितरत ये
माँ की बनता चला गया समझो
बहुत कोशिश की मैंने तो दिल से
मगर तीन साल में परिवार पूरा
कलह का अखाडा सा बन गया
मेरी माँ (सास) तीन साल हुए हैं
मुझसे बोलती ही नहीं है कभी
पूरा परिवार बायकाट पर उतरा
ऐसे में पति देव भी अब तो
छोटी छोटी बात के बहाने ही
मुझ में कमियां देखने लगे हैं
मेरे परिवार की विडम्बना पर
मुझे रोना आता है कई बार
मैंने तो लव मेरेज भी नहीं की
न ही एक गौत्र कि गलती की है
न ही एक गाँव में बसाया घर
दहेज़ जैसा बना वैसा तो लाई मैं
मैं जीन भी नहीं पहनती कभी भी
नौकरी भी करती हूँ और घर भी
पूरी तरह सम्भालती हूँ फिर भी
यह सब क्यों हों गया बताओ तो
हमारे बीच कोई लगाव न बचा
बस ये लोग क्या कहेंगे हमको
इस अदृश्य भय के कारण ही तो
हम एक छत के नीचे जी रहे
छत एक है मकान एक है
पर घर नहीं है यह हमारा
बंद करती हूँ यहीं पर मैं किस्सा
वर्ना अब खुल जायेगा पिटारा पूरा
आज का दौर नाज्जुक दौर है
मैं दुखी हूँ तो पति खुश है
ऐसी बात नहीं मानती हूँ मैं
दुखी वे भी बहुत जानती मैं
मगर क्या समाधान है इसका ?
एक साल मैं अपने पीहर रही
वहां भी बोझ ही समझी गयी
सासरे में दूरियां और बढ़ी मेरी
कई बार सोचा अलग हों जाऊं
अलग होंकर क्या हांसिल होगा
शायद पति के बिना नहीं रह
सकती मैं अकेले अकेले कहीं पर
तलाक का लोड सोच कांप जाती
समझौता कर के जीने की सोची
पता नहीं ठीक हूँ या गलत मैं !!!
************
234
तीर सच्चाई के
हम तीर सच्चाई के रूक रूक के चलाते हैं
दीवाने हैं इसके औरों को दीवाना बनाते हैं
हम रखते हैं ताल्लुक सफरिंग दुनिया से
उसके तस्सवुर में हम खवाब जगाते हैं
रहना होशियार उनके छलकते जामों से
ये मय के बहाने से बस जहर पिलाते हैं
चलना सही राहों पर रख जान हथेली पर
लूटेरे है धर्म की आड़ में खूब लूट मचाते हैं
साईनिंग जाल साजी रचते रचते हम पर
हम हैं की अपने से दीवाने बनाना चाहते हैं
*********
233
कोई खेल रहा है कोई रो रहा है यारो
कोई छा रहा है कोई खो रहा है यारो
कोई ताक में है किसी को है गफ़लत
कोई जागता रहा कोई सो रहा है यारो
कहीँ असफलता ने बिजली गिराई
कोई बीज उम्मीद के बो रहा है यारो
इसी सोच में मैं तो रहता हूँ अक्सर मैं
यह क्या हो रहा क्यों हो रहा है यारो
************
232
कम उमर के बच्चे होते हैं बहोत सच्चे
उमर ही ऐसी है करे ऐसी की तैसी है
उलटी सीधी बात मिलें दोस्तों के हाथ
हारमोन का कसूर आकर्षण का दस्तूर
माँ बाप भी चुप हैं ये तो अँधेरा घुप है
नासमझी नादानी नहीं सिर्फ हिन्दुस्तानी
दुनिया में ऐसा होता नासमझ इसे ढोता
इतने जालिम न बनो हद से आगे न तनों
*******
231
Naya beej
पितृ सत्ता की ताकत हमारी नाक जरूर डबोवेगी
नया बीज बोवेंगे तो ही नई फसल की खेती होवेगी
हरयाणा की बुरी छवि पूरे जगत में खिंची रहेगी
पुत्र लालसा जब तलक हमारी सोच मैं बची रहेगी
मिलके हटे काली स्याही सरतो सुख से रोटी पोवेगी
सामाजिक सुरक्षा का घटना महिला का बैरी हो गया
पूरा समाज होगा जगाना पढ़ा लिखा आप्पा खो गया
नहीं तो हमारी अगली पीढ़ी ये माथा पकड़ के रोवेगी
महिला विरोधी रीत पुराणी छांट के निकाल बगानी होँ
महिला के हक़ मैं जो भी हैं हमको वे रीत बचानी होँ
महिला पुरुष बराबर होँ कमला सुख से फिर सोवेगी
काम जमा आसान नहीं नया समाज सुधार चाहिए
वंचित दलित महिला को यो पूरा अधिकार चाहिए
रणबीर सिंह की कलम हमेशा ये सही छंद पीरोवेगी
*********
230
आज का दौर
विनाशकारी कदम ताबड़ तौड़ हम पर थोंप दिए
पैट्रोल के बाद डीजल के दाम नियंत्रण मुक्त किये
खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से नहीं डरे
देश भर में व्यापक विरोध हुआ फिर भी लागू करे
लूट खसोट उत्पीडन मुनाफाखोरी पर व्यवस्था टिकी
दिवालियेपन और संकट से बचने को ये नीतियाँ दिखी
सुधारों की आड़ में बिगाड़ पूरे देश पर थोंपे जा रहे
इनके विनाश कारी परिणाम हमारे सामने आ रहे
उदारीकरण निजीकरण की नीतियाँ लागू की गयी
बड़े बड़े साहूकारों को मुनाफे बढ़ने की छूट दी गयी
दूसरी तरफ रोटी रोजी को तरस रहे मजदूर किसान
छोटे मोटे कर्मचारी भी हो रहे इन नीतियों से परेशान
खादय सुरक्षा रोटी रोजी शिक्षा स्वास्थ्य और आवास
पढ़ाई महंगी इलाज महंगा बिन आयी मौत से मरते
अपनी जमीं मकान बेचकर इलाज का खर्च ये भरते
लाखों पढ़े लिखे योग्यता प्राप्त युवा ढूढ़ते हैं रोजगार
लाखों नौकरी पद खाली रखे बैठी है हमारी सरकार
अस्थायी नौकरियां देकर स्थाई नौकरियों पे लगाते
आर्थिक शोषण उत्पीडन करने में बिलकुल न घबराते
महिला कमजोर तबके मान सम्मान से नहीं जी पाते
बलात्कार और घरेलू हिंसा कदम कदम पर हैं सताते
दलित महिला सबसे ज्यादा उत्पीडन का शिकार होती
दबंग लोग शामिल होते असफल गरीब की पुकार होती
जातिवादी आकराम्कता को दबंग बढ़ावा दे रहे हैं देखो
सामाजिक सद्भाव बिगाड़ के दबंग दरव दे रहे हैं देखो
कब तक आखिर यह सब हम और आप सहते रहेंगे
एक नयी जंग की शुरुआत देखो तो हो चुकी है दोस्तों
जात पात से ऊपर उठ कर लड़ो जो भी दुखी है दोस्तों
***********
229
Tuesday, March 12, 2013
आज के विकास की परिभाषा
असमानता और विषमता को बढ़ावा देने वाला
पर्यावरण के संतुलन को ख़राब करने वाला
बेरोजगारी को बढ़ावा देने वाला
एक राष्ट्र को दुसरे राष्ट्र द्वारा दबाने वाला
स्त्रियों को हासिये पर डालने वाला
स्त्रियों की अस्मिता को खत्म करने वाला
बच्चों का बड़े पैमाने पर शोषण करने वाला
महिला का बड़े पैमाने पर कोमोड़ीफिकेशन करने वाला
सभी को बाजार हवाले छोड़ने वाला
प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करने वाला
मनुष्य की मानवीय जरूरतों के आधार की बजाय मुनाफे पर आधारित उत्पादन का समर्थन करने वाला
जनसँख्या के बड़े हिस्से की जीवन गुणवत्ता को ध्यान में रखकर न चलने वाला -- मसलन शिक्षा ,स्वास्थ्य व् सांस्कृतिक क्षेत्रों का धयान न रखने वाला
पुरुष सत्ता का प्रतीक विकास
ज्ञान विज्ञान को तकनीक में बदलकर सूचना पर कब्ज़ा करके चलने वाला विकास
विज्ञानं को मानव के खिलाफ खड़ा करने वाला
मनुष्य जाति को युद्धों में धकेलने वाला
सामाजिक असुरक्षा पैदा करने वाला
यांत्रिक ढंग से किया जा रहा विकास
मूल रूप से स्त्री विरोधी , प्रकृति विरोधी विकास
एक उप्भोग्तावादी अपसंस्कृति विकसित करने वाला
विविधता की बजाय एकरसता की हिमायत करने वाला
हिंसक और विनासकारी प्रवर्तियों को बढ़ावा देने वाला
जनता के बड़े हिस्से के श्रम के शोषण पर टिका रहने वाला
विज्ञानं की मरदाना अवधारणा व्याख्यायित करने वाला
मनुष्य की संज्ञान क्षमताओं को घटाने वाला
चीजों को उनके सन्दर्भों से काटकर देखने वाला
अलगाव,गैर बराबरी व् गई भागीदारी पर आधारित वैधता की कसौटियों वाला
क्षेत्रीय असमानता बढ़ने वाला
ऐसे विकास से तौबा !!!
************
228
*मोमबती के अंदर पिरोया गया*
*धागा मोमबती से पूछता है.. ..*
"" *जब मैं जलता हूं तो तू क्युं*
*पिघलती (रोती) है ।*
*मोमबती ने सुंदर जवाब*
*दिया ....*
*कहा कि-----*
*जब किसी को दिल के अंदर*
*जगह दी हो और वो ही छोड़के*
*चला जाये तो रोना तो आयेगा* ही...*
*********
227
नई नवेली दुल्हन जब
ससुराल में आई तो उसकी
सास बोली :बींदणी कल
माता के मन्दिर में
चलना है।
बहू ने पूछा : सासु माँ एक
तो ' माँ ' जिसने मुझ जन्म
दिया और एक ' आप ' हो
और कोन सी माँ है ?
सास बडी खुश हुई कि मेरी
बहू तो बहुत सीधी है ।
सास ने कहा - बेटा पास के मन्दिर में दुर्गा माता है
सब औरतें जायेंगी हम भी चलेंगे ।
सुबह होने पर दोनों एक साथ मन्दिर जाती है ।
आगे सास पीछे बहू ।
जैसे ही मन्दिर आया तो बहू ने मन्दिर में गाय की मूर्ति को देखकर
कहा : माँ जी देखो ये गाय का बछड़ा दूध पी रहा है ,
मैं बाल्टी लाती हूँ और दूध निकालते है ।
सास ने अपने सिर पर हाथ पीटा कि बहू तो " पागल " है और
बोली :-,बेटा ये स्टेच्यू है और ये दूध नही दे सकती।
चलो आगे ।
मन्दिर में जैसे ही प्रवेश किया तो एक शेर की मूर्ति दिखाई दी ।
फिर बहू ने कहा - माँ आगे मत जाओ ये शेर खा जायेगा
सास को चिंता हुई की मेरे बेटे का तो भाग्य फूट गया ।
और बोली - बेटा पत्थर का शेर कैसे खायेगा ?
चलो अंदर चलो मन्दिर में, और
सास बोली - बेटा ये माता है और इससे मांग लो , यह माता तुम्हारी मांग पूरी करेंगी ।
बहू ने कहा - माँ ये तो पत्थर की है ये क्या दे सकती है ? ,
जब पत्थर की गाय दूध नही दे
सकती ?
पत्थर का बछड़ा दूध पी नही सकता ?
पत्थर का शेर खा नही सकता ?
तो ये पत्थर की मूर्ति क्या दे सकती है ?
अगर कोई दे सकती है तो आप ......... है
" आप मुझे आशीर्वाद दीजिये " ।
तभी सास की आँखे खुली !
वो बहू पढ़ी लिखी थी,
तार्किक थी, जागरूक थी ,
तर्क और विवेक के सहारे बहु ने सास को जाग्रत कर दिया !
अगर मानवता की प्राप्ति करनी है तो पहले असहायों , जरुरतमंदों , गरीबो की सेवा करो
परिवार , समाज में लोगो की मदद करे ।
"अंधविश्वास और पाखण्ड को हटाना ही मानव सेवा है " ।
बाकी मंदिर , मस्जिद , गुरुद्वारे, चर्च तो मानसिक गुलामी के केंद्र हैं
ना कि ईश्वर प्राप्ति के
........ मानव का सफर पत्थर से शुरु हुआ था। पत्थरों को ही महत्व देता है और आज पत्थर ही बन कर रह गया -
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