Monday, July 8, 2024

227 से 250

250 कीमत यह सच है कि किसान घोलते हैं हमारे व्यंजनों में मिठास अपनी मेहनत से लेकिन बेहद कडवा है इसका दूसरा पहलू गन्ना पैदा करता मगर नहीं मिल पाती वाजिब कीमत उसे अपनी मेहनत की आखिर ऐसा क्यों ? *********** 249 मेरा कस्सूर मेरा कसूर हमने दोनो ने मिलकर सोचा जिन्दगी का सफ़र तय करेंगे बहुत सुन्दर सपने संजोये थे प्रेम का पता नहीं ये हरयाणा क्यों पुश्तैनी दुश्मन बन गया यह सब मालूम था हमको पर प्यार की राहों पर बढ़ते गए मेरे परिवार वाले खुश नहीं थेa क्यों मुझे पता नहीं चला है न तो मैंने एक गोत्र में की है न ही एक गाँव में शादी मेरी न ही दूसरी जात में की मैंने तो भी सब के मुंह आज तक फुले हुए हैं हम दोनों से देखो प्यार किया समझा फिर शादी ससुराल वाले भी खुश नहीं हैं शायद मन पसंद गुलाम नहीं मिल सकी जो रोजाना उनके पैर छूती पैर की जूती बनकर सुघड़ सी बहु का ख़िताब लेती दहेज़ ढेर सारा लाकर देती ना प्यार का खुमार काम हुआ अब जनाब की मांगें एकतरफा बढ़ी मैं सोचती हूँ नितांत अकेली अब क्या हमारा समाज दो प्रेमियों के रहने के लायक बन पाया यहाँ \ चाहे कुछ हो हम लोड उठाएंगे मगर घुटने नहीं टिकाएंगे यारो वो सुबह कभी तो आयेगी की इंतजार में ये संघर्ष जारी रखेंगे झेलेंगे इस बर्बर समाज के सभी नुकीले जहरीले तीर छाती पर ही जिद हमारी शायद यही है कसूर ******* 248 TO OPPOSE कहना बहुत आसान है मुश्किल चलना सच्चाई पर लहर के उल्ट तैर कर ही पहुंचा जाता अच्छाई पर बुराई की ताकत को यारो देख कर डर जाते हम इसके दबाव में बहुत सी गलती भी कर जाते हम आका बैठ के हँसते रोजाना फिर हमारी रुसवाई पर मेहनत हमारी की अनदेखी रोजाना हो रही यारो चेहरे की लाली हम सबकी रोजाना खो रही यारो कहते वो हमको बेचारा जो जीते हमारी कमाई पर बीज है खाद और खेत भी इससे फसल नहीं उगती फसल उगती है तब यारो जब मेहनत हमारी लगती महल बने ये सभी तुम्हारे हम सब की तबाही पर ******** 247 गुनाह उनका सजा हमें उनके गुनाहों की हमको किसलिए सजा मिले ऐसा इंसाफ क्यों हो किसलिए ऐसी क़ज़ा मिले नाहक ही हम बेकसूरों की क्यों जान चली जाये कैसे हम जैसों को जीने की यहाँ फिजा मिले तुम्हारे सताने से हम रोये बहुत कई बार ही मग़र अब ना रोयेंगे ताकि तुम्हें ना मजा मिले तुम लूट कर हमें रहो सुख चैन से आबाद बताओ तो कसूर क्यों उल्टा हमें खिजा मिले हमारी मेहनत पर रणबीर वे ऐश करते हैं न्याय देखो हमें सुखी रोटी उनको पिज्जा मिले *********** 247 घूंघट में छात्रा वधु पन्द्रह सोलह बरस की छात्रा दर्जे दस की बालिका वधु बनी ससुराल में है पढ़ रही हमें पास से देख रही है बड़ी आस से देख रही है शायद मिट जाए सन्ताप सदियों से जो लगा हुआ है असूर्यपश्या का अभिशाप और हम हैं कि दौड़ रहे हैं परम्पराओं की गाड़ी में खड़े हैं मर्यादाओं की अगाड़ी में घूंघट का झँडा फहरा रहे हैं कल्चर के गीत गा रहे हैं लेकिन उसकी नंगी आँखों से आँखें नहीं मिला सकते कितने कमजोर हैं हम सीधे बातें नहीं चला सकते पर्दा गिराया हुआ है जो झीनी चुनरी का बीच में अंटा पड़ा है व्यक्तित्व पूरा एक इन्सान का जिसे थाह खोजना है ऊंचे आसमान का पढ़ने की जो मिली इजाजत नहीं रुकेगी बात यहाँ ससुराल और मायके से आगे भी जानेगी जहाँ पंख फैला कर शिक्षा के वो आसमान को लांघेगी और घूंघट की चुनरी का बना के परचम थामेगी मंगतराम शास्त्री 10/3/03 ********** 246 नौंजवानों का हाल सुनाऊं, साच्ची बात ना झूठ भकाऊं, बिना नौकरी दुखी दिखाऊं , के होगा इस हरियाणे का।। बेरोजगारी बढ़ती जावै सै, शिक्षा महंगी होंती आवै सै, युवक युवती हाँडै खाली, खत्म हुई चेहरे की लाली, नशे नै कसूती घेरी घाली, के होगा इस हरियाणे का।। छोटा मोटा ठेके का काम यो, ठेकेदार खींचै म्हारा चाम यो, तनखा मिलती घणी थोड़ी, मालिक बणे हाँडै करोड़ी, काम नै म्हारी कड़ तोड़ी, के होगा इस हरियाणे का । बेरोजी नै युवा रूआया रै, संकट सिर ऊपर छाया रै नशे का पैकेज ल्याये देखो , युवा इसमें फँसाये देखो, अंधविश्वासी बनाये देखो, के होगा इस हरियाणे का। मजबूत संगठन बनाना हो संघर्ष मिलकै चलाना हो सोचां युवा युवती सारे रै, कैसे क्लेश मिटेंगे महारे रै, छोड़ जात पात के नारे रै , फेर कुछ होगा हरियाणे का । ********* 245 सब कुछ बहता जा रहा है एकाध खड़ा रम्भा रहा है सफेद धन ढूंढें मिलता यहाँ काला धन सब पे छा रहा है गंभीरता शिकार हुई उतावलेपन की मानवता शिकार हुई शैतानियत की इमानदारी शिकार हुई बेईमानी की वो शिकारी हैं और हम शिकार उनके खेल पूरे यौवन पर है जीत उनकी है पर डर सता रहा है उनको क्योंकी जीत कर भी हारेंगे ही अम्बानी जी हार कर भी जीत तो हमारी ही होगी क्योंकी मानवता इंसानियत गंभीरता ये तो हमारे पास ही हैं और रहेंगी भी ********* 244 प्यार का तोफा एक लड़की ने एक लड़के से प्यार किया लड़के ने उसे बलात्कार का उपहार दिया इतने मेंभी सबर नहीं उस वहसी को आया अपने चार मुसटन्ड़ों को था साथ में लाया उन्होंने भी बारी बारी मुंह किया था काला गिरती पड़ती ताऊ के घर पहुँची थी बाला ताऊ को बाला ने सारी हकीकत बताई थी ताऊ ने भी वह हवस का शिकार बनाई थी माँ बाप ने जाकर बाला को छुड वाया था पुलिस में हिम्मत कर केस दर्ज कराया था गाँव के कुछ नौजवानों ने आवाज उठाई थी पाँचों की और साथ ताऊ की जेल कराई थी आज भी जेल में पैर पीट रहे हैं सारे के सारे क्या हुआ समाज को हवस ने हैं पैर पसारे ********** 243 अभी तो शुरुआत है लालच खुदगर्जी ये हमें शैतान बनायेंगी जरा संभल के !!!!! हमारी इंसानियत को हवानियत में तब्दील करने के अथक प्रयास किये जा रहे हैं दोस्तों अबतोसंभलना ही होगा जितना समझा दुनिया को उतना दुःख बढ़ता गया मेरा कि इतना भेदभाव क्यूं है क़िस्मत का ये जुमला तेरा मुझे सबसे बड़ा हथियार लगता इस भेदभाव के असली कारणों को छिपाने का !!!!!!!!!!!! ******** 242 एक लड़की ने साहस किया और आवाज उठाई बदतमीज गुरु जी ने अपनी बदनीयत दिखाई कुछ लडकीयों ने साहस किया और भीड़ गयी गुरु जी की सरेआम की सबने मिल कर पिटाई केस दर्ज होने जा रहा था उस गुरु के खिलाफ लड़की के बाप ने बीच में आकर के खेल रचाई पैसे लेकर केस बिगड़ दिया गुरु छुट गया साफ़ यह कहानी नही हकीकत है आप तक पहुंचाई कहाँ जा रहे हैं हम समझ नहीं पा रहा दोस्तों एक घटना नहीं है ऐसी घटनाओं की बाढ़ आयी ********* 241 दलित महिला से गैंग रेप हिसार में अपराधी खुले घूमें वहां बाजार में दलित ही नहीं यह महिला का सवाल ताकतवर दबंग और पैसे का बबाल कमजोर की बहू सबकी जोरू कहते गरीब ही सबसे ज्यादा जुलम सहते ********** 240 झाँसी क़ि रानी की गंभीर की फिलहाल जरूरत है भारत देश की सही तस्वीर की फिलहाल जरूरत है कुरुक्षेत्र के मैदान मैं कहते सच की जीत हुई थी द्रोपदी चीर हरण हुआ कलंकित ये रीत हुई थी एकलव्य वाले तीर की फिलहाल जरूरत है बुराई फैलती जा रही थी इस भारत के समाज मैं ज्योतिबा फुले रमाबाई उभरे थे नए अंदाज मैं दोहों वाले उस कबीर की फिलहाल जरूरत है अंड वंड पाखंड खिलाफ जमके लड़ी लड़ाई देखो सत्य की खोज में तयार करे बहन भाई देखो उस दयानंद से फकीर की फिलहाल जरूरत है ठारा सो सतावन में लाखों फंसी फंदा चूम गए राजगुरु सुखदेव भी आजादी की खातिर झूम गए उस भगतसिंह से रंधीर की फिलहाल जरूरत है जलियाँ वाले बाग़ का बदला दिल में ज्योति जलाई जालिम डायर की लन्दन में जाके थी भया बुलाई उस उधम सिंह बलबीर की फिलहाल जरूरत है जवाहर गाँधी रविन्द्र देश आजाद करना चाहया अनगिनत लोग थे जिन्होंने था अपना खून बहाया अंहिंसा पुजारी गाँधी पीर की फिलहाल जरूरत है मजदूर किसान की खातिर जिंदगी ही न्योछार दई मार्क्स ने दुनिया के बारे में एक नई सी विचार दई उस मार्क्सवादी शूरवीर की फिलहाल जरूरत है महिला दलित का दोस्त आज चाहिए समाज इसा पूंजीवाद राज अन्यायी ख़त्म हो मंदी का राज इसा तोड़ने की जुल्मी जंजीर की फिलहाल जरूरत है ********** 239 सच छिपाए न छिपे एक बार भोपाल से ग्वालियर ट्रेन से अपने घर जा रहा था मैं उसी ट्रेन में उसी डिब्बे में एक लड़की पास की सीट पर बैठी थी थोड़ी बातचीत शुरू हुयी तो पूछा मेरे घर परिवार के बारे में उसने बताया पिता हाई कोर्ट में जज मेरे मम्मी सुप्रीम कोर्ट की वकील हैं लड़की मन ही मन में हंसने लगी समझ नहीं सका मैं उसका हँसना अपनी सीट पर लेट सो गया मैं घर पहुंचा तो देखा वही लड़की मेरे घर पर मेरे से पहले पहुंची थी देख मुझे बहुत जोर से हँसी लड़की असल में मेरी मौसी की बिटिया मैंने सफ़र में पहली बार देखा उसे उसकी हँसी ने शर्मशार किया मुझे क्योंकि ट्रेन में जो बताया था मैंने सभी कुछ झूठा था था कथन मेरा उस दिन के बाद मैंने कसम खाई अब के बाद झूठ नहीं बोलूँगा मैं बहुत हद तक कसम मैंने है निभायी कभी कभी झूठ बोलता हूँ मैं तो ट्रेन का नजारा जरूर याद आता एक बार फिर मुझे याद दिला जाता ******* 238 इम्तिहान हमारा इम्तिहान लिया हर बार पास हुए सब कुछ तुम्हारे पास फिर भी उदास हुए पता है तुम्हारा तुम एक अमर बेल हो रब राखा क़िस्मत का रचा रहे खेल हो तुम्हारा अहम् और ये अहंकार दिखाता अन्दर का पूरा अंधकार अंधी गली में तुम बढ़ते जा रहे अपनी मौत के श्लोक पढ़ते जा रहे ******** 237 कारोबार नया साल हुआ आज नए साल का मनाना भी एक कारोबार हो गया बनावटी पन लटके झटके मस्त हमारा घरोबार हो गया कैटरिना मलायका के ठुमके कैसी इन्तहा ये बेहयाई की देखके पूरा हिंदुस्तान ख़ुशी से कितना ये सरोबर हो गया एक फुटपाथ पर बैठा हुआ वह यह सब देख रहा है दो चार लकड़ी इकठी करके हाथ अपने सेक रहा है सामने दुकान पर देखी ठुमकों की झलक थोड़ी सी घरवाली ने देख लिया तो सच मुच ही झेंप रहा है नए साल का जश्न मनाकर आज मुंबई छाई देखो ठिठुरे बचपन और जवानी ये गाँव की रुसवाई देखो लड़की मांरके पेट में हमने लूटी है वाह वाही देखो शराब नशा और मस्ती ठुमकों की ये बेहयाई देखो गला काट मुकाबला आज दुनिया में है छाया देखो भाई का भाई दुश्मन इसने यहाँ पर है बनाया देखो आखिर कहाँ जा रहे है हम जरा देर सोचो तो यारो इंसानियत का चेहरा यहाँ पर किसने है चुराया देखो ************ 236 क्या कहूं सौ बार मरना चाहा आँखों में डूबकर के हमने हर बार निगाहें झुका लेते हमें मरने नहीं देते तुझे देखे बिना तेरी तस्वीर बना सकता हूँ मैं तुझसे मिले बिना तेरा हाल बता सकता हूँ मैं दिल में क्या है तेरे सब तो जता सकता हूँ मैं क्या सोचते रहते दिन भर गिना सकता हूँ मैं ********* 235 मेरी शादी से पहले मेरी शादी से पहले परिवार ने खूब पूछताछ छानबीन की थी बहुत गुणवान लड़का है कोई मांग नहीं हैं उनकी सीधे सादे सैल पर दो एक बार बात की सपनों के संसार में खो गए हम बस झट मंगनी और पट ब्याह महीना दो महीना बहुत यादगार गुजर गया वक्त पता नहीं चला फिर असली जिन्दगी से सामना हुआ मेरा तो बस धडाम से गिरी सोचा यह सब किससे साँझा करूँ ? या फिर घुट घुट के मैं यूं ही मरूं उसकी शिकायत कि माँ को मैं बिल्कुल खुश नहीं रख पा रही हूँ बहुत देर बाद समझ आया कि खुश ना रहने का दिखावा करती माँ मुझे प्रताड़ित करना फितरत ये माँ की बनता चला गया समझो बहुत कोशिश की मैंने तो दिल से मगर तीन साल में परिवार पूरा कलह का अखाडा सा बन गया मेरी माँ (सास) तीन साल हुए हैं मुझसे बोलती ही नहीं है कभी पूरा परिवार बायकाट पर उतरा ऐसे में पति देव भी अब तो छोटी छोटी बात के बहाने ही मुझ में कमियां देखने लगे हैं मेरे परिवार की विडम्बना पर मुझे रोना आता है कई बार मैंने तो लव मेरेज भी नहीं की न ही एक गौत्र कि गलती की है न ही एक गाँव में बसाया घर दहेज़ जैसा बना वैसा तो लाई मैं मैं जीन भी नहीं पहनती कभी भी नौकरी भी करती हूँ और घर भी पूरी तरह सम्भालती हूँ फिर भी यह सब क्यों हों गया बताओ तो हमारे बीच कोई लगाव न बचा बस ये लोग क्या कहेंगे हमको इस अदृश्य भय के कारण ही तो हम एक छत के नीचे जी रहे छत एक है मकान एक है पर घर नहीं है यह हमारा बंद करती हूँ यहीं पर मैं किस्सा वर्ना अब खुल जायेगा पिटारा पूरा आज का दौर नाज्जुक दौर है मैं दुखी हूँ तो पति खुश है ऐसी बात नहीं मानती हूँ मैं दुखी वे भी बहुत जानती मैं मगर क्या समाधान है इसका ? एक साल मैं अपने पीहर रही वहां भी बोझ ही समझी गयी सासरे में दूरियां और बढ़ी मेरी कई बार सोचा अलग हों जाऊं अलग होंकर क्या हांसिल होगा शायद पति के बिना नहीं रह सकती मैं अकेले अकेले कहीं पर तलाक का लोड सोच कांप जाती समझौता कर के जीने की सोची पता नहीं ठीक हूँ या गलत मैं !!! ************ 234 तीर सच्चाई के हम तीर सच्चाई के रूक रूक के चलाते हैं दीवाने हैं इसके औरों को दीवाना बनाते हैं हम रखते हैं ताल्लुक सफरिंग दुनिया से उसके तस्सवुर में हम खवाब जगाते हैं रहना होशियार उनके छलकते जामों से ये मय के बहाने से बस जहर पिलाते हैं चलना सही राहों पर रख जान हथेली पर लूटेरे है धर्म की आड़ में खूब लूट मचाते हैं साईनिंग जाल साजी रचते रचते हम पर हम हैं की अपने से दीवाने बनाना चाहते हैं ********* 233 कोई खेल रहा है कोई रो रहा है यारो कोई छा रहा है कोई खो रहा है यारो कोई ताक में है किसी को है गफ़लत कोई जागता रहा कोई सो रहा है यारो कहीँ असफलता ने बिजली गिराई कोई बीज उम्मीद के बो रहा है यारो इसी सोच में मैं तो रहता हूँ अक्सर मैं यह क्या हो रहा क्यों हो रहा है यारो ************ 232 कम उमर के बच्चे होते हैं बहोत सच्चे उमर ही ऐसी है करे ऐसी की तैसी है उलटी सीधी बात मिलें दोस्तों के हाथ हारमोन का कसूर आकर्षण का दस्तूर माँ बाप भी चुप हैं ये तो अँधेरा घुप है नासमझी नादानी नहीं सिर्फ हिन्दुस्तानी दुनिया में ऐसा होता नासमझ इसे ढोता इतने जालिम न बनो हद से आगे न तनों ******* 231 Naya beej पितृ सत्ता की ताकत हमारी नाक जरूर डबोवेगी नया बीज बोवेंगे तो ही नई फसल की खेती होवेगी हरयाणा की बुरी छवि पूरे जगत में खिंची रहेगी पुत्र लालसा जब तलक हमारी सोच मैं बची रहेगी मिलके हटे काली स्याही सरतो सुख से रोटी पोवेगी सामाजिक सुरक्षा का घटना महिला का बैरी हो गया पूरा समाज होगा जगाना पढ़ा लिखा आप्पा खो गया नहीं तो हमारी अगली पीढ़ी ये माथा पकड़ के रोवेगी महिला विरोधी रीत पुराणी छांट के निकाल बगानी होँ महिला के हक़ मैं जो भी हैं हमको वे रीत बचानी होँ महिला पुरुष बराबर होँ कमला सुख से फिर सोवेगी काम जमा आसान नहीं नया समाज सुधार चाहिए वंचित दलित महिला को यो पूरा अधिकार चाहिए रणबीर सिंह की कलम हमेशा ये सही छंद पीरोवेगी ********* 230 आज का दौर विनाशकारी कदम ताबड़ तौड़ हम पर थोंप दिए पैट्रोल के बाद डीजल के दाम नियंत्रण मुक्त किये खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से नहीं डरे देश भर में व्यापक विरोध हुआ फिर भी लागू करे लूट खसोट उत्पीडन मुनाफाखोरी पर व्यवस्था टिकी दिवालियेपन और संकट से बचने को ये नीतियाँ दिखी सुधारों की आड़ में बिगाड़ पूरे देश पर थोंपे जा रहे इनके विनाश कारी परिणाम हमारे सामने आ रहे उदारीकरण निजीकरण की नीतियाँ लागू की गयी बड़े बड़े साहूकारों को मुनाफे बढ़ने की छूट दी गयी दूसरी तरफ रोटी रोजी को तरस रहे मजदूर किसान छोटे मोटे कर्मचारी भी हो रहे इन नीतियों से परेशान खादय सुरक्षा रोटी रोजी शिक्षा स्वास्थ्य और आवास पढ़ाई महंगी इलाज महंगा बिन आयी मौत से मरते अपनी जमीं मकान बेचकर इलाज का खर्च ये भरते लाखों पढ़े लिखे योग्यता प्राप्त युवा ढूढ़ते हैं रोजगार लाखों नौकरी पद खाली रखे बैठी है हमारी सरकार अस्थायी नौकरियां देकर स्थाई नौकरियों पे लगाते आर्थिक शोषण उत्पीडन करने में बिलकुल न घबराते महिला कमजोर तबके मान सम्मान से नहीं जी पाते बलात्कार और घरेलू हिंसा कदम कदम पर हैं सताते दलित महिला सबसे ज्यादा उत्पीडन का शिकार होती दबंग लोग शामिल होते असफल गरीब की पुकार होती जातिवादी आकराम्कता को दबंग बढ़ावा दे रहे हैं देखो सामाजिक सद्भाव बिगाड़ के दबंग दरव दे रहे हैं देखो कब तक आखिर यह सब हम और आप सहते रहेंगे एक नयी जंग की शुरुआत देखो तो हो चुकी है दोस्तों जात पात से ऊपर उठ कर लड़ो जो भी दुखी है दोस्तों *********** 229 Tuesday, March 12, 2013 आज के विकास की परिभाषा असमानता और विषमता को बढ़ावा देने वाला पर्यावरण के संतुलन को ख़राब करने वाला बेरोजगारी को बढ़ावा देने वाला एक राष्ट्र को दुसरे राष्ट्र द्वारा दबाने वाला स्त्रियों को हासिये पर डालने वाला स्त्रियों की अस्मिता को खत्म करने वाला बच्चों का बड़े पैमाने पर शोषण करने वाला महिला का बड़े पैमाने पर कोमोड़ीफिकेशन करने वाला सभी को बाजार हवाले छोड़ने वाला प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करने वाला मनुष्य की मानवीय जरूरतों के आधार की बजाय मुनाफे पर आधारित उत्पादन का समर्थन करने वाला जनसँख्या के बड़े हिस्से की जीवन गुणवत्ता को ध्यान में रखकर न चलने वाला -- मसलन शिक्षा ,स्वास्थ्य व् सांस्कृतिक क्षेत्रों का धयान न रखने वाला पुरुष सत्ता का प्रतीक विकास ज्ञान विज्ञान को तकनीक में बदलकर सूचना पर कब्ज़ा करके चलने वाला विकास विज्ञानं को मानव के खिलाफ खड़ा करने वाला मनुष्य जाति को युद्धों में धकेलने वाला सामाजिक असुरक्षा पैदा करने वाला यांत्रिक ढंग से किया जा रहा विकास मूल रूप से स्त्री विरोधी , प्रकृति विरोधी विकास एक उप्भोग्तावादी अपसंस्कृति विकसित करने वाला विविधता की बजाय एकरसता की हिमायत करने वाला हिंसक और विनासकारी प्रवर्तियों को बढ़ावा देने वाला जनता के बड़े हिस्से के श्रम के शोषण पर टिका रहने वाला विज्ञानं की मरदाना अवधारणा व्याख्यायित करने वाला मनुष्य की संज्ञान क्षमताओं को घटाने वाला चीजों को उनके सन्दर्भों से काटकर देखने वाला अलगाव,गैर बराबरी व् गई भागीदारी पर आधारित वैधता की कसौटियों वाला क्षेत्रीय असमानता बढ़ने वाला ऐसे विकास से तौबा !!! ************ 228 *मोमबती के अंदर पिरोया गया* *धागा मोमबती से पूछता है.. ..* "" *जब मैं जलता हूं तो तू क्युं* *पिघलती (रोती) है ।* *मोमबती ने सुंदर जवाब* *दिया ....* *कहा कि-----* *जब किसी को दिल के अंदर* *जगह दी हो और वो ही छोड़के* *चला जाये तो रोना तो आयेगा* ही...* ********* 227 नई नवेली दुल्हन जब ससुराल में आई तो उसकी सास बोली :बींदणी कल माता के मन्दिर में चलना है। बहू ने पूछा : सासु माँ एक तो ' माँ ' जिसने मुझ जन्म दिया और एक ' आप ' हो और कोन सी माँ है ? सास बडी खुश हुई कि मेरी बहू तो बहुत सीधी है । सास ने कहा - बेटा पास के मन्दिर में दुर्गा माता है सब औरतें जायेंगी हम भी चलेंगे । सुबह होने पर दोनों एक साथ मन्दिर जाती है । आगे सास पीछे बहू । जैसे ही मन्दिर आया तो बहू ने मन्दिर में गाय की मूर्ति को देखकर कहा : माँ जी देखो ये गाय का बछड़ा दूध पी रहा है , मैं बाल्टी लाती हूँ और दूध निकालते है । सास ने अपने सिर पर हाथ पीटा कि बहू तो " पागल " है और बोली :-,बेटा ये स्टेच्यू है और ये दूध नही दे सकती। चलो आगे । मन्दिर में जैसे ही प्रवेश किया तो एक शेर की मूर्ति दिखाई दी । फिर बहू ने कहा - माँ आगे मत जाओ ये शेर खा जायेगा सास को चिंता हुई की मेरे बेटे का तो भाग्य फूट गया । और बोली - बेटा पत्थर का शेर कैसे खायेगा ? चलो अंदर चलो मन्दिर में, और सास बोली - बेटा ये माता है और इससे मांग लो , यह माता तुम्हारी मांग पूरी करेंगी । बहू ने कहा - माँ ये तो पत्थर की है ये क्या दे सकती है ? , जब पत्थर की गाय दूध नही दे सकती ? पत्थर का बछड़ा दूध पी नही सकता ? पत्थर का शेर खा नही सकता ? तो ये पत्थर की मूर्ति क्या दे सकती है ? अगर कोई दे सकती है तो आप ......... है " आप मुझे आशीर्वाद दीजिये " । तभी सास की आँखे खुली ! वो बहू पढ़ी लिखी थी, तार्किक थी, जागरूक थी , तर्क और विवेक के सहारे बहु ने सास को जाग्रत कर दिया ! अगर मानवता की प्राप्ति करनी है तो पहले असहायों , जरुरतमंदों , गरीबो की सेवा करो परिवार , समाज में लोगो की मदद करे । "अंधविश्वास और पाखण्ड को हटाना ही मानव सेवा है " । बाकी मंदिर , मस्जिद , गुरुद्वारे, चर्च तो मानसिक गुलामी के केंद्र हैं ना कि ईश्वर प्राप्ति के ........ मानव का सफर पत्थर से शुरु हुआ था। पत्थरों को ही महत्व देता है और आज पत्थर ही बन कर रह गया -

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