Monday, July 8, 2024
251- 275
275
मेरा स्वतंत्र वो वजूद
मेरे से किसने पूच्छा था कि वहां
पैदा होना भी चाहता हूँ मैं कि नहीं
वो घर वो गाओं वो जिला वो प्रदेश
वो देश वो मजहब चिपक से गए
बिना कभी पूच्छे मेरे वजूद के साथ
बहुत बार अहसास करवाया जाता
मेरे इस प्रकार के अनचाहे वजूद का
मेरी मानवता मेरा स्वतंत्र वो वजूद
पता नहीं कहाँ खो गया ढूंढ रहा हूँ
ढूंढ नहीं पाया अभी तक तो शायद
कभी इसे ढूंढ भी पाऊंगा कि नहीं
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274
एक नया ट्रेंड
आज की मोहब्बत फेसबुक और व्हाट्सअप हो गई हैं बताते
धीरे - धीरे दोस्ती और फिर मोहब्बत का अहसास हैं जताते
फिर नम्बरों का आदान प्रदान होता पूरी रात जागके बिताते
मोहब्बत के पाठ पढ़े जाते हैं ,वादों का सिलसीला है चलाते
और फिर मॉल में मुलाकातें शुरू हो हाँ में हाँ कुछ रोज मिलाते
कुछ दिन का सिलसिला फिर किसी बात पर तकरार बनाते
और फिर अन्फ्रेंड का बटन दब जाता है सब कुछ फिर भुलाते
और फिर एक नया चेहरा उस पर लाइक कर नया प्यार रचाते
सिलसिला जारी है चार के बाद पांचवें प्यार से फेरे फिर घुमाते
दो तीन साल चलता मगर फिर तलाक का परचम उठाते
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273
गाँव जो टिका था अन्याय पर
एक दिन उसे ढहना ही था
ना बराबरी के गाँव भक्तों को
एक दिन यह सहना ही था
बिगड़ गया गाँव का माहोल
महिला सुरक्षित नहीं वहां
नशाखोरी बढती जा रही
ढूढ़ दही का था सेवन जहाँ
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272
प्यार का नाम लेकर कम से कम
इसको बदनाम तो मत करो तुम
आज की दुनिया में प्यार की दुकानें
हर गली हर मोड़ पर खुल गयी हैं
सम्भल के खरीदना ए मेरे दोस्त
काश प्यार ख़रीदा भी जा सकता !!!!
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271
खुदा को खुद इन्सान ने बनाया है
वक्त वक्त पर उसका स्वरूप बदला
इंसान की जरूरत के रूप में आया है
अग्नि देवता बनी वायु देवता बनी
जब भी इन्सान क़ि कुदरत से ठनी
एक और देवता वजूद में पाया है
कुदरत के खेल में खुदगर्जों ने ही
खुदा को इन्सान और कुदरत के
बीच जान बूझ कर के फंसाया है
आज तक इन्सान मूलभूत में वही
कोई बदलाव नहीं है सदियों से पर
खुदा के रूप बदलते ही रहे और
आगे भी खुदगर्ज इंसान और भी
भगवान घड़ेगा अपनी जरूरत से
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270
अच्छा जीवन क्या है ???
अच्छी जिंदगी क्या है सवाल चारों और घूमता है
मानवजाति का शाश्वत प्रश्न कानों में खूब गूंजता है
सभ्यता और संस्कृति के साथ अर्थ बदल जाते हैं
पुराना बदलता नए में सामने कई सवाल आते हैं
यह बात साफ़ है कि अच्छी जिंदगी की परिभाषा
अर्थशाश्त्र बाजार या वस्तु इसका बना देते हैं तमाशा
इसकी परिभाषा का संस्कृति ही आधार हो सकती है
जो प्रगति के अलग पड़ाव पर आगाह हमें करती है
जीवन का लक्ष्य क्या है और कौन से मूल्य मददगार
या फिर कौनसे नए मूल्यों की है सभ्यता को दरकार
साफ़ है की अच्छी जिंदगी कोई हवाई चीज नही है
परलोक , पुनर्जन्म स्वर्ग या मोक्ष से ना जुडी कहीं है
इसका सम्बन्ध भौतिक जीवन से जुड़ा हुआ बताया
अतः उसकी प्राप्ति केवल मूल्यों और आदर्शों नहीं है
बल्कि भौतिक सुख सुविधाओं तथा उनको पैदा करने
वाले संसाधनों से ही हो सकती है यह रास्ता दिखाया
और यह राजनैतिक शाश्त्र का विषय ही बताते हमको
मग़र यह राजनैतिक शाश्त्र नैतिक या सांस्कृतिक
अनुशासन में रहना चाहिए वर्ना अनर्थ में धकेलेगा सबको
एक तरफ बाजारूपन के और दूसरी तरफ बर्बरता के मुहाने
में धकेल रहा है और आने वाले वक्त में और धकेलेगा
अच्छा जीवन नहीं मिलेगा घुमते रहो बाबाओं के पास !!!
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269
हमारे ही रक्षक बने फिरते ऐसे शातिर ये ख़िलाड़ी
हमारे सिर पर ही चलाते हमने बनाई जो कुल्हाड़ी
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भक्षक को रक्षक मानके करते हैं हम उनके गुणगान
देखे कहाँ छिपा बैठा हमारा मालिक वह भगवान
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भगवान की सच्चाई से उठ रहा है विस्वास हमारा
भगवान की दया उसी पे जो लेता बुराई का सहारा
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भगवान कहते अपने आप अपना अन्दर ठीक करले
इन्नर की खोज करके अपने जीवन में रंग भरले
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अन्दर की बात चीत सभी गुरु और बाबाजी करते
बाहर की दुनिया का ये ज़िकर करने से भी डरते
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268
प्रकृति का अपना एक अलग अंदाज़ है...
जब देती है तो...
*अहसान* नहीं करती
और...।।
जब लेती है तो...
*लिहाज़*नहीं करती...
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267
मेरा जनाजा निकाल कर कितने दिन जी पाओगे ।।
तुम मेरी मेहनत बिना कैसे शक्कर घी खाओगे।।
कई ढंग से बांट रहे हैं एक दूजे के दुश्मन बनाए
ये चाल तुम्हारी समझी तो दस के एक बांटे आओगे।।
हमारे वास्ते जो गढ़े खोदे इनका पता जल गया तो
याद रखना इन्हीं गढ़ों में मूंधे मूंह गिरते जाओगे।।
ये संकट बढ़ता जा रहा हमारा निवाला खोसते हो
यूं कितने दिन जालिमो दुनिया को ठेके पे दौड़ाओगे।।
तुमसे ज्यादा शातिर कौन पैदा करते हो आतंकवादी
पालते पोसते हो इन्हें सच कब तक छिपाओगे।।
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266
खुदा की क़िस्मत की आड़
बेकारों को चाहिए
कालाधन को चाहिए
भ्रष्टाचार को चाहिए
ठेकेदार को चाहिए
गुनाहगार को चाहिए
मेहनतकश अपनी क़िस्मत
खुद लिखता है
खुदा वाले उसको
बहकाते रहते है
तथाकथित खुदा की
क़िस्मत के नाम से
चल रहा है धंधा
सदियों से
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265
यह साफ़ हो गया है कि एक समय
और एक स्तर के बाद "सफलता"
और "अनैतिकता " सिक्के के दो
पहलू हो जाते हैं
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264
आज का लक्ष्य
समूची जनता को खाद्य सुरक्षा , पूर्ण रोजगार और शिक्षा ,
स्वास्थ्य तथा आवास तक सर्वभोम पहुँच मुहय्या करना |
इसका अर्थ है मजदूरों , किसानों तथा अब तक हाशिये पर
पड़े रहे तबकों की जीवन स्थितियों में भारी सुधार लाकर ,
जनता का आर्थिक व राजनितिक शक्तिकरण करना |
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263
अहसास------------------
मेरा ना होना तुम बर्दास्त नहीं कर सकते
मेरी ताकत का अहसास है तुम्हें
इसीलिये बाँट दिया मुझे धर्म, जात ,
इलाके, भाषा के नाम पर
मुझे अपनी कमजोरी का जिस दिन
अहसास हो जायेगा उस दिन ये जमाना
बदल जायेगा
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262
चुप रहे
फिर भी
बहुत कुछ
कह गये
अब कोई
ना समझे
तो क्या
करे कोई
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261
असल में जो नंगे हो गये वो अपना नंगा पन छिपाने को
सबको नंगा कहते हैं ताकि हम झिझकें उंगली उठाने को
पत्थर तोड़ कर ताज महल बनाया क्यों नहीं दिखाई देता
ताज महल के साथ सब कोई नाम शाहजहाँ का ही लेता
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260
कैसा अजीब नजारा
कैसा अजीब नजारा देह मेरी पर हल्दी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा हथेली मेरी मेहंदी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा सिर मेरा पर चुनरी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा मांग मेरी पर सिन्दूर बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा माथा मेरा पर बिंदी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा नाक मेरी पर नथनी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा गला मेरा मंगल सूत्र बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा कलाई मेरी चूड़ियाँ बीरू के नाम की
कैसा अजीब जमाना ऊँगली मेरी अंगूठी बीरू के नाम की
कैसा अजीब जमाना कुछ भी तो नहीं है मेरा मेरे नाम का
चरण वन्दना करूँ सदा सुहागन आशीष बीरू के नाम का
करवा चौथ व्रत मैं करूँ पर वो भी तो बीरू के नाम का
बड़मावस व्रत मैं करती पर वो भी तो बीरू के नाम का
कोख मेरी खून मेरा दूध मेरा और नीरू बीरू के नाम का
मेरे नाम के साथ लगा गोत्र भी मेरा नहीं बीरू के नाम का
हाथ जोड़ अरदास सबसे बीरू के पास क्या मेरे नाम का
रणबीर
6.7.2015
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259
अगले पिछले का चक्कर
अगले पिछले के चक्कर में अबका हिसाब बिगाड़ लिया
टिकवा पथरों पर माथे हमारे भक्तों ने बिठा जुगाड़ लिया
इसमें भोगा वो पिछले का अब किया वो मिलेगा अगले में
इसकी कोई जगह नहीं है सार सोच कर लिकाड़ लिया
कर्म करो फल की चिंता ना करो कभी से इसे मानते आये
अडानी अम्बानी जैसों ने गीता से क्यों खिलवाड़ किया
अन्धविश्वाशों का हुआ है क्यों बहुत प्रचार प्रसार यहाँ पर
विज्ञान ने अंधविश्वासों का आज पूरा नकाब उघाड़ दिया
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258
अध्यापक कामचोर
डॉक्टर कामचोर
कर्मचारी कामचोर
किसान भी कामचोर
मजदूर कामचोर
अडानी अम्बानी कर्मठ
तभी तो विकास दर
बढ़ रही है ।
अबकी बार तो कुछ
पॉजिटिव कहा कि नहीं
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257
होंश में आना होगा
अब नए संगठन को हमें अपनाना होगा ।।
जो भाई नहीं आएं उनको बुलाना होगा ।।
संगठन बनायें जो रजके रोटी खाना चाहते
अपने बच्चों को हम शिक्षा दिलाना चाहते
सब बराबर हों ऐसा समाज बनाना चाहते
अब हमें क्रांति के गीतों को गाना होगा ।।
जो भाई नहीं आएं उनको बुलाना होगा।।
वो क्यों अमीर हो गए इस पर विचार करें
हम क्यों गरीब ही रहे इस पर ध्यान धरें
अलग अलग बंटे हम एक दूजे से ही डरें
जात पात भूलके एक मंच पर आना होगा।।
जो भाई नहीं आये उनको बुलाना होगा ।।
हरियाणा बुरी तरह जलवाया देख लिया
जातों को आपस में भिड़वाया देख लिया
फूट डालो राज करो आजमाया देख लिया
मेहनतकश को मानवता को बचाना होगा।।
जो भाई नहीं आये उनको बुलाना होगा ।।
महंगाई बढ़ती जा रही देखो आज यहाँ
बेरोजगारी हमें खा रही देखो आज यहाँ
प्याज भाव नहिं पा रही देखो आज यहाँ
इन मुद्दों को मिलकर के उठाना होगा ।।
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256
ranbir dahiya - October 4, 2009
दोहरापन
दोहरा पन जीवन का हम को अन्दर से खा रहा |
एक दिखे दयालु दूसरा राक्षस बनता जा रहा |
चेहरों का खेल चारों तरफ दुनिया में फैल रहा
मुखौटे हैं कई तरह के कोई पहचान ना पा रहा |
सफेद मुखौटा काला चेहरा काम इनके काले हैं,
बिना मुखौटे का तेरा चेहरा नहीं किसी को भा रहा |
कौनसा मुखौटा गुजरात में करतब दिखा रहा ये
जनता को बहला धर्म पे कुरसी को हथिया रहा |
धार्मिक कट्टरता का चेहरा प्यारा लगता क्यों है
मानव से मानव की हत्या रोजाना ही करवा रहा |
कौन धर्म कहता हमें कि घृणा का मुखौटा पहनो,
खुद किसकी झोंपड़ी में आग खुदा जाकर लगा रहा |
राम भी कहता प्यार करो दोहरेपन को छोड़ दो अब
रणबीर सिंह भी बात वही दुजे ढंग से समझा रहा |
CHALE KHETON KI AUR
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255
क्या कुछ नहीं बदला
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उखल कहाँ अब
मुस्सल कहाँ अब
गौजी कहाँ अब
राबडी कहाँ अब
बाजरे की खिचडी
बताओ कहाँ अब
गुल्गले कहाँ अब
पूड़े कहाँ अब
सुहाली कहाँ अब
शकर पारे कहाँ अब
पीहल कहाँ अब
टींट कहाँ अब
हौले कहाँ अब
मखन का टींड
कहाँ दिखता अब
छोटी सी बात
आलू ऊबाल कर
आलू के परोंठे
कहाँ चले गये
पौटेटो चिप्स आये
बीस गुना महंगे
छद्म आधुनिकता
पौटेटो चिप्स खाना
फैशन बन गया
बहुत कुछ बदला
लम्बी फहरिस्त है |
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254
बेचैनी जनता की बढ़ती जा रही
समझौता संघर्ष करती आ रही
डायलैक्टिस इसी को कहते हैं
आज बेचैनी दुनिया पर छा रही
डेमोक्रेसी ने आगे कदम बढाया है
जनता ने कुछ अधिकार पाया है
कितना ही भ्रष्टाचार बढ़ गया हो
इसके खिलाफ विरोध जताया है
उठती बैठती जीवण बिता रही है
कई बार घन घोर अँधेरा हटाया है
लूट के हथियार बदल लिए जाते हैं
जनता ने एकता हथियार बनाया है
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254
एकतरफ़ा मोहब्बत का भी एक अंदाज होता है
उपर से कहता है कोई बात नहीं अंदर से रोता है
प्यार तो दोतरफ़ा होना है लाजमी यही सुना है
एक तरफ़ा आसिक क्यूँ गल्त फ़हमी में सोता है
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253
रुकना नहीं
निराश मतना होईये बेटी दिखा दे आज बन कै नै चिंगारी
पाछै मतना हटियो जंग तैं छोरियो निगाह थारे पर हमारी
हरयाणा मैं महिलावाँ नै आजादी का बिगुल बजा दिया
खेलां मैं चमकी दुनिया मैं शिक्षा मैं आगै कदम बढ़ा दिया
तेरे इस कदम नै पूरा हरयाणा एक बै तो आज डरा दिया
कुछ दकियानूसों नै विरोध मैं यो अपना झण्डा उठा दिया
नम्बर वन नहीं सै पर इसनै जरूर नम्बर वन बनावेंगे हम
अपने नौजवान भाइयां गैल्यां मिलकै कदम बढ़ावैंगे हम
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252
नब्बे और दस की लड़ाई नब्बे को समझ नहीं आई
दस ने अपनी पूरी ताकत न समझें इसपे है लगाई
मगर दस का जो पैसा आज ताकत है बेलगाम ये
एक दिन कर ही देगा इसकी भी नींद खूब हराम ये
तब अपनी असल शकल लेगी दस नब्बे की लड़ाई
इतिहास गवाह है मानवता का पलड़ा आखिर जीता
झूठ का संसार फले कितना सच बन जाती है कविता
इंसान की इंसानियत की वही झूठ भी देती है दुहाई
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251
शादी की अल्बम
शादी वह मौका है जब दो दिल
दो ख़ानदान अपने सुख के पलों को
पूरे भरपूर अंदाज में जीते हैं यारो
इसके गवाह होते हैं कई परिवार
बहुत से मेहमान दूर से आते यारो
वे सब अपनी हाजरी दर्ज करवाते
कैमरे की जद में सब कैद हों जाते
जब भी शादी का अल्बम पल्टा जाता
यादों के हम सब के दरीचे खुल जाते
पुरानी खुसबूएं फिर महकने लगती हैं
धुंधले पड़ गए चेहरे साफ दिखाई देते
तभी तो हम तुम सब अपनी अल्बम
देखकर मुस्कुरा उठते हैं मन ही मन
हर तस्वीर एक कहानी कहती है
जाने क्या क्या यादें तजा होती
फूफा बुआ ताऊ ताई सब आये
कुछ लोगों के बीच नई शादी का
आगाज भी बनता इन शादियों में
आप भी देखना एक बार फिर आज
अपनी शादी की एल्बम और
लीख देना अपने दिल की बात
अपनी डायरी के किसी पन्ने पर
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