Monday, June 12, 2017

OUR CULTURE 4

दो प्रमुख चिंतन-परंपराएं

किसी भी देश के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में कोई भी परंपरा एक-आयामी या इकहरी नहीं होती। किसी भी देशकाल के समाज में दो चिंतन परंपराओं को मुख्य रूप से पहचाना जा सकता है-- एक रूढ़िवादी और दूसरी प्रगतिकामी। प्रगतिकामी परंपरा समाज के अनिवार्य विकास के लिए संघर्षकारी रास्ता खोजती हुई निरंतर गतिशील होती है, परन्तु रूढ़िवादी, समाज के पांवों की बेड़ियां बनकर परिवर्तन की संभावनाओं को अवरुद्ध करने का हर संभव प्रयास करती हैं। रूढ़िवादी सोच से निर्मित संस्थाएं रूढ़िवादी परंपराओं को जीवित रखने के लिए जन-समूहों को संगठित करती हैं। रूढ़िवादी सोच संकीर्णतावादी होती है और मंताधता पर पलती है। यह मतांधता, वह चाहे हिंदुओं में हो या मुसलमानों में, लोगों को कट्टर बनाती है, सामाजिक सोच पर पहरे लगाती है और व्यवस्था में परिवर्तन की विरोधी होती है। वह मिथक गढ़ती है जिससे समाज में अलगाव पैदा होता है। प्रगतिकामी शक्तियां प्रायः आलोचनात्मक होती हैं, समाज को उसकी बेड़ियों से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्षरत रहती हैं, और इसी कारण से उन पर अंधविश्वासी लोग, जो जनता को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं, हमला करते हैं। दाभोलकर, कलबुर्गी या पानसरे की हत्या इसीलिए की गई क्योंकि वे समाज में अंधविश्वासी, रूढ़िवादी परंपराओं के विरुद्ध जन-जन में जाकर प्रगतिकामी सोच के लिए प्रचार-प्रसार करते थे। ये हत्याएं उन लोगों द्वारा की गईं जो समाज में धर्म और संस्कृति के उन रूढ़िवादी, जर्जर और अलगाववादी पक्षों का वर्चस्व
स्थापित करना चाहती हैं, जो हमें अपनी जंजीरों से प्रेम करना सिखाते हैं। ये प्रतिक्रियावादी ताकतें जनता के बीच कोई ऐसा समावेशी विचार उछाल देती हैं जिनसे वे सामंती व पूंजीवादी शक्तियों के खिलाफ संगठित न होकर राष्ट्र, धर्म और संस्कृति को लेकर एक उन्मादी भीड़ में बदल जाएं। ये ताकतें राज्य सत्ता में धर्म का पूरा दखल चाहती हैं।
भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जो इस तथ्य के साक्षी हैं कि इस धरती पर जब भी राज्य
सत्ता और धर्म का अपवित्रा गठबन्धन हुआ है तब हजारों बेगुनाहों के खून के छींटे मानव संस्कृति के पन्नों पर पड़े
हैं। हिन्दू इतिहास में कम से कम तीन प्रमाण इस स्थिति की पुष्टि करते हैं। एक तो, षड्यंत्रा द्वारा अशोक के
कुल से मगध की गद्दी छीनकर ब्राह्मण राजकुल की स्थापना करने वाले शुंग सम्राट पुष्यमित्रा जिसने पाटलीपुत्रा और जालन्धर के बीच के सारे बौद्ध विहार जला डाले थे और ग्रीकराज बौद्ध मिलिन्द की राजधानी स्यालकोट में घोषणा की थी, ‘‘जो मुझे एक बौद्ध भिक्षु का सिर काट कर देगा उसे मैं सौ सोने की दीनार दूंगा।’’ दूसरा उदाहरण श्री हर्ष से पहले के शैव राजा शशांक का है जिसने बौद्ध मठों और भिक्षुओं पर बड़े अत्याचार किये थे। शशांक ने संघ के अनेक विहार अग्नि की लपटों को समर्पित कर दिए थे और बोधगया के बोधिवृक्ष को कटवाकर उसकी जड़ों में अंगार रखवा दिए थे ताकि वह वृक्ष फिर पनप न सके। तीसरा उदाहरण उसी शती के पांड्य राजा नेडूरमान् का है जिसने शैवों के इशारे पर दक्षिण में आठ हजार जैन साधुओं को जान से मार डाला था। लेकिन भारतीय जनमानस ने संगठित धर्म द्वारा इन राजनीतिक हिंसाओं को आदर्श नहीं माना। ये तीनों--पुष्यमित्रा शुंग, शशांक और नेडूरमान--भारतीय इतिहास के खलनायकों के रूप में ही विख्यात हुए।
ऐसी स्थिति में भारतीय जनता के एक बड़े हिस्से को संकीर्णता और स्मृति लोप से बचाकर उदार और सहिष्णु
सोच की एक समान्तर संस्कृति को विकसित करना आज के राजनीतिक, सामाजिक संदर्भ में बेहद जरूरी है। 

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इसी ऐतिहासिक पारस्परिकता और सामूहिक संघर्षों ने हमारी अनेकता और एकता दोनों के स्वरूप को बनाया है। हिन्दुस्तान के संदर्भ में देखें तो एक बात साफ जाहिर होती है, कि मध्ययुगीन भक्ति आंदोलन से लेकर आजादी हासिल करने तक के लम्बे दौर में--कुछ अपवादों को छोड़कर हमारे समाज से भाषा, जाति, धर्म, संप्रदाय आदि की बहुस्तरीय विविधताओं के बीच जो व्यावहारिक जीवनगत् सामरस्य पाया था, उसे हम आजादी के बाद बहुत तेजी से खोते रहे हैं। मध्ययुग में यह सामरस्य धार्मिक-सांस्कृतिक था, भारतीय नवजागरण के वैचारिक संघर्ष ने इसे बौद्धिक-वैचारिक आयाम दिया और स्वाधीनता आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय चेतना के बहुस्तरीय संघर्ष द्वारा, इसे राष्ट्र की एकीकृत राजनीतिक मुख्यधारा में तब्दील किया। यह सामरस्य हमने लोक जीवन में एक लम्बे समय तक साथ रहने के संस्कारों से अर्जित किया था, एक-दूसरे को काटते रक्त रंजित इतिहास के तथ्यों से नहीं, अपनी गंगा-जमुनी परंपरा से लगातार सींचे गये सामूहिक अंतर्मन के अनुभव-साक्ष्यों में खोजा था। किसी लेखक ने ठीक लिखा है कि इस लम्बे दौर में हम किसी तात्कालिक उद्देश्य की ऐतिहासिक अनिवार्यता या राजनीतिक मजबूरी की रस्सी से जबर्दस्ती बांधे गये लकड़ियों के गठ्ठर की तरह एक नहीं थे बल्कि हाथ की पांच अंगुलियों की तरह एक थे--अविभाज्य और एक-दूसरे पर अवलंबित। पांचों अंगुलियां एक-दूसरे से बराबर सटी ही नहीं रहतीं, न एक-सी होती हैं पर एक को कुछ होता है तो सभी
उससे प्रभावित हो जाती हैं। सभी अलग-अलग हरकत कर सकती हैं और मिल कर भी हरकत कर सकती हैं। संगठित प्रतिरोध के लिए मुट्ठी बन कर तन सकती हैं। संस्कृति के ऐसे ही विवेकपूर्ण सामाजिक सोच पर बल देते हुए, पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने ‘भारत एक खोज’ मंे लिखा है--‘‘हिन्दुस्तानी अवाम की जिन्दगी....नस्ली, मजहबी और भाषाई फ़र्क या विविधता के बावजूद एक ही सांस्कृतिक आत्मा से सम्बद्ध है। उत्तर भारत की सारी आबादी जात-पात और मज़हब में  भिन्नता से उत्पन्न कुछ पाबंन्दियों के बावजूद--एक जैसे नैतिक मूल्यों और सामाजिक रस्म और रिवाज़ को मानती है, एक भाषा बोलती है, अपने सामूहिक सर्जक श्रम, यातनाओं और एक बेहतर जिन्दगी के लिए अपने साझे सक्रिय संघर्ष की लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया मंे उसने जिस तहजीबी स्वभाव को पोषित किया है वह एक है, उनकी मेहनत और मशक्कत ही उनकी संस्कृति और शक्ति का स्रोत है।’’
रोमिला थापर का कहना है कि अतीत मंे एक ऐसे एकरूप धार्मिक समुदाय की अवधारणा अनुपस्थित दिखाई देती है जिसकी सहज पहचान एक हिन्दू के रूप में की जाए। उपनिवेशपूर्ण समाज उप-जातियांे और स्थानीय निष्ठाओं के कारण इस क़दर विभाजित था कि वह बृहत धार्मिक निष्ठाओं के उभरने की इजाजत नहीं दे सकता था। कुछ विद्वान यह मानते हैं कि उपनिवेश पूर्व काल में समुदायों के बीच सीमाओं की अस्पष्टता इसलिए थी क्योंकि आधुनिक समुदायों की तरह परंपरागत समुदायों को वर्गीकृत नहीं किया गया था।

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भारतीय संस्कृति की विशेषताएं--
एंथ्रोपोलिजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने भारत में 4258 समुदायों के सर्वेक्षण के आधार पर भारतीय समाज, संस्कृति
और परंपराओं के बारे में ‘‘भारत के लोग’’ शृंखला प्रकाशित की है जिसके प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं--
-- हमारा समाज इस दुनिया का सबसे वैविध्यमय समाज है। हमारे देश में 4635 विभिन्न समुदाय हैं जिनकी अपनी-अपनी आनुवंशिक विशेषताएं, भाषाएं, पहनावे, आराधना की विधियां, खानपान और रिश्तेदारी और शादी ब्याह की रीतियां हैं। इन्हीं समुदायों की मौलिक जीवनशैली से हमारे राष्ट्रीय आम जनजीवन की मुख्यधारा बनी है।
-- भारत के लोगों की उत्पत्ति मुख्यतः निम्नलिखित नस्लों के मिलन से हुई हैः प्रोटो-आस्टेªलाइड, पैलियो-मेडिटरेनियन, काकेशसाइड, नीग्रोइड और मंगोलीय। विभिन्न जातीयताएं मुख्यतः इस प्रकार हैं: आर्य, फारसी, यूनानी, हूण, अरब, तुर्क, अफ्रीकी, मंगोली, यूरोपीय। ये सब एक दूसरे से इस तरह घुल मिल गई हैं कि किसी भी जातीयता का शुद्ध रूप कहीं भी आज उपलब्ध नहीं है।
-- ऐसा पाया गया है कि विभिन्न समुदायों के बीच रंग रूप, कद काठी, और आनुवंशिक विशेषताओं का जितना
फर्क है, उससे कहीं ज्यादा फर्क एक ही समुदाय के लोगों के बीच देखने मंे आता है। एकरूपता जाति और धर्म के आधार पर काम, क्षेत्रा विशेष में रहने वाले लोगों के बीच ज्यादा होती है। इस बात को वैज्ञानिक निष्कर्षों ने नकार दिया है कि ऊँची जाति और निम्न जाति के अलग-अलग वंशक्रम हैं। मिसाल के तौर पर तमिल ब्राह्मणों की जातीय विशेषता का उत्तर भारत के अथवा कश्मीरी पंडितों से कोई तालमेल नहीं है। करीब-करीब सभी जगह प्रदेश विशेष मंे
ब्राह्मणों  और निम्न जाति के लोगों के बीच गजब की समरूपता पाई जाती है। मुसलमान समुदाय की बड़ी आबादी में ऐसे कोई विशेष गुण नहीं पाए जाते जिनके आधार पर उन्हें प्रवासी करार दिया जा सके। उनकी उत्पत्ति मुख्य रूप से स्थानीय आबादी के बीच से हुई है।
-- जहाँ तक मान्यताओं का सवाल है, बहुत कम ऐसे समुदाय हैं जो अपने को आप्रवासी अथवा बाहर से आया
, नहीं मानते। हर समुदाय के लोग अपने पलायन या ‘हिजरत’ के दिनों को अपने लोकगीतों, इतिहास और सामूहिक स्मृति में सुरक्षित रखते हैं। जो जहां निवास करता है उसने उस क्षेत्रा विशेष की स्थानीय परंपराओं के निर्वाह में अपना योगदान दिया है और स्थानीय लोकाचार को स्वीकारा है। यहां तक कि आक्रमणकारी भी प्रवासी बन गए। अनेक हिंदू मतावलंबी ऐसे हैं जो इस देश में उन लोगों से बहुत बाद में आए जो आज इस्लाम को मानते हैं। उदाहरणार्थ, केरल के मुसलमान छठी सदी में भी पहले से मालाबार तट पर रहते आए हैं। ये सभी व्यापार और वाणिज्य से जुड़े लोग थे।
-- हमारी अनेकता और एकता का एक बड़ा माध्यम हमारी भाषा है। यहां करीब 325 भाषाएं और 25 लिपियां
प्रचलन में हैं। ये समय-समय पर विभिन्न भाषाई परिवारों, हिंद आर्य, तिब्बती बर्मी, हिंद यूरोपीय, द्रविड़ आस्त्रो एशियाई, अंडमानी और हिंद-ईरानी से उपजी हैं। हमारे यहां के लगभग 65 फीसदी समुदाय द्विभाषी हैं और लगभग सभी आदिवासी समुदाय के लोक त्रिभाषीय हैं। इस प्रकार नाना प्रकार की मातृभाषाएं हमारी स्थानीय संस्कृति और विविधिता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण औजार हैं। व्यापक पैमाने पर दो भाषाओं के इस्तेमाल की वजह से लोगों के बीच अच्छा संपर्क हो पाया है और यह सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल को बढ़ाता है।
-- भारत के लोगबाग आपस में अलग-थलग नहीं रहे। उनका अपने आसपास के प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश में घनिष्ठ रिश्ता रहा है और सदियों से वे आपसी जीवन और संघर्षों में एक दूसरे के साझीदार बनते रहे हैं। 

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संस्कृति कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे हम जीवन और जीवन से जुड़ी दैनिक गतिविधियों से काटकर देख सकें। संस्कृति मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्रिया-कलाप से प्रतिबिंबित होती है। मनुष्य के पहनने-ओढ़ने, खाने-पीने, बोलने-लिखने, सोचने-समझने इत्यादि में संस्कृति अभिव्यक्त होती है और इन्हीं से संस्कृति का निर्माण होता है। बेशक धर्म का प्रभाव महत्त्वपूर्ण होता है परन्तु केवल धर्म संस्कृति का जन्मदाता नहीं। जो लोग शुद्ध ‘हिंदू’ या शुद्ध ‘इस्लामिक’ संस्कृति की बात करते हैं, वास्तव में वे लोग संस्कृति का सांप्रदायीकरण कर रहे होते हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे वे राजनीति का सांप्रदायीकरण करते हैं। प्रत्येक जातीय समुदाय की अपनी एक लंबी सांस्कृतिक परपंरा होती है। उसी परंपरा से उसकी संस्कृति का विशिष्ट स्वरूप झलकता है। एक समुदाय जब अपनी संस्कृति को विकसित कर रहा होता है, तो यह स्वाभाविक है कि वह दूसरे जातीय समुदायों के संपर्क में आता है और इस प्रक्रिया में एक दूसरे पर अपने सांस्कृतिक प्रभाव छोड़ता है। इस लेन-देन में कुछ पुराना छूट जाता है और कुछ नया ग्रहण किया जाता है। बौद्ध धर्म कई देशों जैसे श्रीलंका, चीन, थाइलैंड, तिब्बत, कंबोडिया, वियतनाम, जापान इत्यादि में फैला, परन्तु क्या हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि श्रीलंका की संस्कृति तिब्बत या जापान की संस्कृति के समान है बेशक इन सबमें बौद्ध धर्म मौजूद है। इसी तरह, इस्लाम जिस अरब में जन्मा था, वहां से यह इंडोनेशिया, मलेशिया, थाइलैंड, भारत, श्रीलंका, ईरान, मध्य-एशिया, मिस्र, सूडान, मोरोक्को, तुर्की,.... कहां-कहां नहीं फैला, परन्तु देखने की बात यह है कि इन तमाम देशों की संस्कृतियां एकदम भिन्न हैं, बेशक उनका धर्म एक है। हमारे देश में, जहाँ इतनी जातियां, व भाषाएं व धर्म हैं, सभी संस्कृतियों की स्वायतत्ता को मानते हुए हमें परस्पर संबंधता और निर्भरता को स्वीकार करना होगा।

Wednesday, March 15, 2017

Ranchi Convention

Accommodation is booked in Gurudwara Bangla Sahib, Connaught Place and there is walking distance from Gurudwara to meeting venue and E-Rickshows are also available. I will share an approval letter from Gurudwara with you all by Monday, you are requested to carry a hard copy of letter with you.

Below is plan of action from 6th National Convention of Right to food campaign which was held in Ranchi from 23 to 25 September, 2016. You are kindly requested to please keep a short report of work done in your respective state as per plan of action.
Ranchi Declaration: Plan of Action
The notes from all the plenary sessions and workshops are being compiled and a comprehensive declaration as well as resolutions and report will be shared soon. The points that have been included here are the immediate action points that emerged and were ratified in the final plenary.
1.                  There was a consensus that thepractice of manual scavenging should be finished from the country, without delay. Members of the right to food campaign will plan to actively campaign for the eradication of all dry latrines and their replacement with sanitary latrines, alongside the liberation and rehabilitation of all persons engaged in manual scavenging. The steering committee and state campaigns will personally ensure that the burden of cleaning in their homes and workspaces is not entirely placed on communities who traditionally did scavenging. All sections of society must be involved in sanitation activities with the focus being on ensuring safety on the job, supported with the latest technology including clothing and equipment. All state campaigns will make plans towards this. 
2.                  In the month of November in a campaign mode, beginning with Madhya Pradesh, dry latrines will be broken by the safai karamchari union, members of the state campaign and other affiliates of the Right to Food campaign will participate along with ensuring the implementation of the 2013 law on ending manual scavenging.
3.                  The Secretariat will call ameeting on the NREGA in October/November. This meeting should also spend some time to plan the action around PDS.
4.                  It was decided that the 22nd of November would be the day for state action. (a) Voices would be raised to urge the state and central Government to immediately implement thematernity entitlements of a minimum of Rs 6000 as notified in the NFSA, 2013. Also demand the expansion of the maternity benefit act, 1961 to the unorganized sector workers, which presently is an exercise for only 4 % of the workforce in the formal sector. (b) Voices would also be raised against thedestruction of the PDS through POS and Aadhar and attempts to introduce cash transfer and the demand for pulses (dal) and cooking oil (tel) in the PDS would be raised along with fuel for urban dwellers. 
5.                  Advocacy should begin with MPs and with the Government in order to urge them to implement the maternity entitlements. This should begin at the state and national level. One week before the stat action teams from all over should come to Delhi and meet the party leaders and MPs.
6.                  As a part of the campaign’s commitment to internal democracy within its structure, all state campaigns would organize conventions within the next six months and nominate a team at least two and maximum five persons to the national steering committee. All state campaigns and national networks will make an effort to ensure that the persons nominated by them to the steering committee include Dalits, Adivasis, and Muslims, people of other minorities, women and youth. All members of the steering committee will have a maximum tenure of four years. Once the national steering committee is reconstituted, it should select conveners from amongst the group. This process should be completed by 8 months from today. The meeting of the new steering committee will be held in May 2017. Due to reduced participation of some of the national networks, a half day meeting would be held in November to discuss their role and representation in the campaign and the steering committee. All state campaigns are expected to adhere to the collective statement of the Right to Food Campaign.
7.                  NAPM would call an urgent meeting in order to plan action on theissue of stopping this increasing resource loot and alienation of the people from land and agriculture. NAPM would also facilitate workshops on combating agriculture distress in each state. ASHA and other groups like Rupantar would be urged to assist state campaigns to form women’s collective and work towards food sovereignty.
8.                  Campaign for the inclusion of eggs in the ICDS and MDMS for those communities who consume eggs should be planned nationally and a six month plan of action should be prepared for all states.
9.                  national children’s right to food convention of the will be held in 2017.
10.              Non implementation of the SC orders in the Swaraj Abhiyan case related to drought should be pursued by all state campaigns along with giving an affidavit for the SC that their State Government had not cared to implement any of the orders.
11.              All efforts will be made to resist any imposition on the individual’s private food habits. Therefore the ban on cow slaughter and consumption of beef will also be resisted where it is a part of the regular diet of the communities. The politics around the cow should be discussed by all state campaigns so that each member takes an informed opinion on this issue.
12.              In relation to Agrarian Crisis, Land Grabs and Food Security, it was resolved that (a) water to be first used for drinking, then for domestic purposes, then for agriculture and finally for industrialization and urbanization; (b) right to food should be understood in the context of seed sovereignty and food sovereignty; (c) there should be a ban on forceful land acquisition; (d) there should be an end on corporate control over food systems and policy; (e) the campaign endorses the struggle against BT mustard and (f) the campaign will work for the implementation of the Forest Rights Act, PESA and other legislations related to land.
13.              The campaign for recognition of women as farmers will be undertaken both at the state and at the national level.
14.              The workshop on disability and right to food passed a resolution that the right to food campaign should work towards getting disabled persons included in the automatic inclusion lists in all states and that they should be given Antyodaya cards. Further, the inclusion of persons with disability must be ensured in all food and employment schemes along with giving them access to additional schemes designed specially to address their needs.
15.              To advocate for all TB patients be provided with supplementary nutrition in the anganwadis or schools through the year.
16.              A number of other action points emerged in the parallel workshops on exclusion, urban food security, rights of homeless persons, disability and right to food, PVTGs and right to food and so on. These are all being compiled and will soon be shared. A list of the workshops that were held are annexed below.
17.              Three day workshops with youth on knowing their democratic rights and the Right to Food would be organized in every state by the state campaigns. A list of resource persons would be prepared by the national team and given to each State. These workshops should begin in October itself.
18.              The law on sedition and AFSPA should be withdrawn from the Indian statute books, efforts would be made with other civil liberties and democratic rights campaign to prevent the alienation or attack of any group activist or peer by the Indian state.
19.              Similarly, along with other campaigns there would be an effort made to protect the people’s right to life and liberty in Bastar and that of the human rights defenders working on this.
20.              The cultural component of the campaign should be strengthened.
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Saturday, March 11, 2017

Holika Dahan

होलिका की कहानी होलिका दहन की कथा के मानते हुए हम में बहुत से लोग  होली की पूर्व संध्या, यानी फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी को होलिका दहन मनाते हैं। इसके साथ एक कथा जुड़ी हुई है। कहते हैं कि वर्षो पूर्व पृथ्वी पर एक राजा हिरण्यकश्यपु राज करता था। उसने अपनी प्रजा को यह आदेश दिया कि कोई भी व्यक्ति ईश्वर की वंदना न करे, बल्कि उसे ही अपना आराध्य माने।  लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद ईश्वर का परम भक्त था। उसने अपने पिता की आज्ञा की अवहेलना कर अपनी ईश-भक्ति जारी रखी। इसलिए हिरण्यकश्यपु ने अपने पुत्र को दंड देने की ठान ली। उसने अपनी बहन होलिका की गोद में प्रह्लाद को बिठा दिया और उन दोनों को अग्नि के हवाले कर दिया। दरअसल, होलिका को ईश्वर से यह वरदान मिला था कि उसे अग्नि कभी नहीं जला पाएगी। लेकिन राजा भाई के दबाव में  उस का साथ देने के कारण होलिका भस्म हो गई और सदाचारी प्रह्लाद बच निकले। 
कुछ सवाल उभरते हैं दिमाग में  
1 . मतलब भगवान या ईश्वर अपने वचन को निभा नहीं पाया । 
2 . हिरणाकुश ठीक था जो भगवान के वजूद को नहीं मानता था 
3 . महिलाओं के पर दबाव आदि समाज में भी थे वरना उसे क्यूँ अग्नि में बिठाया गया ?
4 . एक तरफ हिरणाकुश ईश्वर के वजूद को नहीं मानता दूसरी तरफ वो होलिका को ईश्वर द्वारा दिए वरदान  कि उसे अग्नि कभी नहीं जला पाएगी इसके कारण उसे अग्नि में बिठाने का दबाव बनाता है 
5 क्या हिरणाकुश को अपने बेटे को दंड देना सही था यदि वह ईश्वर के वजूद में यकीं करता था ?
6 . क्या हम होलिका दहन करके एक औरत के साथ हुई ज्यादती को ही बढ़ावा नहीं दे रहे हैं ?

उसी समय से हम समाज की बुराइयों को जलाने के लिए होलिकादहन मनाते आ रहे हैं। सार्वजनिक होलिकादहन हम लोग घर के बाहर सार्वजनिक रूप से होलिकादहन मनाते हैं। होलिका दहन की परंपरा शास्त्रों के अनुसार होली उत्सव मनाने से एक दिन पहले आग जलाते हैं और पूजा करते हैं। इस अग्नि को बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। होलिका दहन का एक और महत्व है, माना जाता है कि भुना हुआ धान्य या अनाज को संस्कृत में होलका कहते हैं, और कहा जाता है कि होली या होलिका शब्द, होलका यानी अनाज से लिया गया है। इन अनाज से हवन किया जाता है, फिर इसी अग्नि की राख को लोग अपने माथे पर लगाते हैं जिससे उन पर कोई बुरा साया ना पड़े। इस राख को भूमि हरि के रूप से भी जाना जाता है। 

Read more at: http://hindi.boldsky.com/inspiration/short-story/significance-holika-dahan-007178.html

Friday, March 3, 2017

BHAGAT SINGH

"क्रांति से हमारा अभिप्राय है -- अन्याय पर आधारित मौजूद समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन । समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं । दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने दाने के लिए मोहताज हैं । दुनियाभर के बाजारों को कपड़ा मुहैया करानेवाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढकने भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है । सुन्दर महलों का निर्माण  वाले राजगीर , लोहार तथा बढ़ई स्वयं गंदे बाड़ों में रहकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर जाते हैं । इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूंजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वारा -न्यारा कर देते हैं ।  यह भयानक असमानता और जबरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल पुथल की तरफ लिए जा रहा है ।  यह स्तिथि बहुत दिनों तक कायम नहीं रह सकती ।  स्पष्ट है की आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरलियां मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं ।
( भगत सिंह और उनके साथियों के उपलब्ध सम्पूर्ण दस्तावेज ,सं -- सत्यम , पृष्ठ 338 )
मेरी साड़ी ल्यादे इनै बढ़िया रंगादे
गायक गुलाब सिंह
चिंगारी प्रोडक्शन


बेटी की कविता


सांसों से भी तेज दौड़ती है जिन्दगी
आज इन सांसों से ही हार गई जिन्दगी
कहते दूसरों; समाज द्ध के लिए जीना ही जीवन है
संघर्ष,मेहनत,ईमानदारी मूल्य है जीवन का
परन्तु मुस्कराना,गुनगुनाना,खुशियां मनाना सार है जीवन का

किसान का बेटा निकला था अपने गांव से
बदलने समीकरण समाज का
राह संघर्ष की वो चलते रहे
कहते कुछ भी मुश्किल नहीं दुनिया में
जरा हिम्मत तो करो
पाया हर वो मुकाम जो चाहा उनके मन ने

न डर किसी का न खौफ मौत का
मिश्रण सहनशक्ति,संयम,स्वाभिमान का
गजब हुनर था क्षमा दान का
अटूट विश्वास था रिश्तों के ताने बाने  में
बच्चों को दिए पंख आसमान में फैलाने को
कहते आन बान स्वाभिमान होते हैं बच्चे मां बाप के

उठते थे जो हाथ आर्शिवाद के लिए
चले गये छोड़ साथ हमारा
पर जज्बा उनका सदा साथ रहेगा हमारे
सांस लेने का नाम ही जिन्दगी नहीं
जिन्दा हैं वो हमारे साथ
क्योंकि उनका जोश और विश्वास जिन्दा है हम में

Tuesday, January 31, 2017

BUDGET 2017-18

Trade Body Seeks Fiscal Support In Budget For Boosting Exports

Exporters' body FIEO asked the government to create of an Export Development Fund for aggressive marketing particularly for MSMEs and VAT exemption for merchant exporters.

BUDGET SURVEY

Finance Minister Arun Jaitley is all geared up to present the Union Budget 2017-18 on February 1, breaking the decade-old practice of presenting it on the last working day of February. This Budget comes less than three months after Prime Minister Narendra Modi's bold and risky gamble to outlaw high-value old currency notes. The Economic Survey for 2016-17, tabled in Parliament by Mr Jaitley on Tuesday, pegged India's economic growth at 6.5 per cent for the current fiscal year, down from 7.6 per cent recorded in the last financial year, but added that growth is expected to rebound in the range of 6.75-7.5 per cent in 2017-18.

Here are 10 facts:
  1. Arun Jaitley has made a contribution to the Economic Survey by authoring a section of the report card. This is for the first time that a finance minister wrote a section in the survey. "The Survey has greatly benefitted from the comments and insights of the Hon'ble Finance Minister Arun Jaitley, who also authors a section in the Survey, possibly the first such contribution by a Finance Minister," Chief Economic Adviser Arvind Subramanian said.
  2. Mr Jaitley will reply to questions by Twitterati on the proposals in the Budget after its presentation in the Lok Sabha, news agency Press Trust of India reported. "I shall be presenting the Union Budget for 2017-18 tomorrow. I shall be happy to respond to your questions which you can send directly to me," Mr Jaitley said. The questions can be asked on Twitter by using hashtag #MyQuestionToFM.
  3. This Budget will break the 92-year-old tradition of presenting the Railway Budget separately. The Rail Budget will be merged with the Union Budget. The end of a separate Budget will be a relief for the Railways, since its revenue deficit and capital expenditure will now get transferred to the Finance Ministry. The Railways is also facing an accumulated burden of a whopping Rs. 4.83 lakh crore towards execution of 458 unfinished and ongoing projects.
  4. Running trains at 200 kmph on the Delhi-Howrah and Delhi-Mumbai routes, allocation of Rs. 20,000 crore for safety upgrade and customised trains for agri products are likely to be in focus.
  5. Ahead of the expected GST rollout from July 1, Mr Jaitley may increase the service tax rate to bring it into line with the proposed standard rate under the new tax regime. The service tax rate may be increased from 14 per cent at present to 16-18 per cent. Mr Jaitley also defended demonetisation, saying the drive "shook" the financial system for a short while, but will integrate the shadow economy with the formal in the long run and ensure better tax compliance.
  6. The Economic Survey said that the demonetisation, effected in November 2016, could have particularly "profound impact" on the real estate sector. "Real estate you do see a blip in prices, sales and launches and of course some of it may be adverse to the economy but in the long, some of that could be good because aim of demonetisation is to bring down real estate prices," said Mr Subramanian, the lead author of this pre-Budget document on the state of economy.
  7. Budget will likely offer modest tax concessions and ramp up spending to help the economy recover. Paying for those giveaways may require Mr Jaitley to slow the pace of fiscal tightening, officials told news agency Reuters.
  8. In Union Budget 2017-18, banks expect the government to boost consumption demand through personal income tax sops, including higher exemption limit, additional deductions under Section 80C and interest on home loans. Banks are also eyeing incentives from the government for digital transactions, including tax benefits for customers as well as merchants.
  9. Curtailment of education fees, cheaper electronic gadgets and more focus on jobs are some of the expectations Young India has from the Budget 2017-18, news agency IANS reported. To boost the country towards the digital economy and ramp-up the start-up industry are also few measures that are likely to be considered.
  10. Ahead of the Budget, Ficci's latest Business Confidence Survey, the Overall Business Confidence Index (OBCI) has revealed that India Inc's business confidence slipped to a four quarter low as demonetisation pulled down performance and clouded its assessment of the economy, Press Trust of India reported.

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Tuesday, January 24, 2017

ANDHVISHWAS

जिसको धार्मिक होने पर गर्व है
उसको इंसानियत से बैर व नैतिकता से नफरत होना स्वाभाविक

सोंच ही रहा था कि यकायक खयाल आया
की चीन,जापान,अमेरिका,इंग्लैण्ड और न जाने कितने ही देश हैं और रहे होंगे जब हमारे देश में जातियां बन रही होंगी,कोई हमारे यहाँ चमार,अहीर,गडरिया,काछी, तेली,कुर्मी,धोबी,धानुक,नाई में ऊँचा-नीचा समझने का प्रयास कर रहा होगा।
पर क्या ऊपर देशों में इन सभी काम को करने वाले लोगों में यह वर्गीकरण है अथवा था?
जाओ जातिवाद के पक्षधरों पहले पता करके आओ कि वहां कार्य के आधार पर लोगों में जातियां हैं कि नहीं हैं और यहाँ हम और हमारे आज के नवजवान युवा मोबाइल का एंड्राइड वर्जन तो तुरंत अपडेट कर लेना जानते हैं किंतु सोंच को नहीं।
धिक्कार है भारत के उन नवजवानों पर जो आज भी जातिवाद को बढ़ावा दिए पड़े हैं कोई हक नहीं है ऐसे नवजवानों को देश और राष्ट्रवाद की बात करने की।
#जनवादी_शिवम्_आज़ाद
नई नवेली दुल्हन जब
ससुराल में आई तो उसकी
सास बोली :बींदणी कल
माता के मन्दिर में
चलना है।
बहू ने पूछा : सासु माँ एक
तो ' माँ ' जिसने मुझ जन्म
दिया और एक ' आप ' हो
और कोन सी माँ है ?
सास बडी खुश हुई कि मेरी
बहू तो बहुत सीधी है ।
सास ने कहा - बेटा पास के मन्दिर में दुर्गा माता है
सब औरतें जायेंगी हम भी चलेंगे ।
सुबह होने पर दोनों एक साथ मन्दिर जाती है ।
आगे सास पीछे बहू ।
जैसे ही मन्दिर आया तो बहू ने मन्दिर में गाय की मूर्ति को देखकर
कहा : माँ जी देखो ये गाय का बछड़ा दूध पी रहा है ,
मैं बाल्टी लाती हूँ और दूध निकालते है ।
सास ने अपने सिर पर हाथ पीटा कि बहू तो " पागल " है और
बोली :-,बेटा ये स्टेच्यू है और ये दूध नही दे सकती।
चलो आगे ।
मन्दिर में जैसे ही प्रवेश किया तो एक शेर की मूर्ति दिखाई दी ।
फिर बहू ने कहा - माँ आगे मत जाओ ये शेर खा जायेगा
सास को चिंता हुई की मेरे बेटे का तो भाग्य फूट गया ।
और बोली - बेटा पत्थर का शेर कैसे खायेगा ?
चलो अंदर चलो मन्दिर में, और
सास बोली - बेटा ये माता है और इससे मांग लो , यह माता तुम्हारी मांग पूरी करेंगी ।
बहू ने कहा - माँ ये तो पत्थर की है ये क्या दे सकती है ? ,
जब पत्थर की गाय दूध नही दे
सकती ?
पत्थर का बछड़ा दूध पी नही सकता ?
पत्थर का शेर खा नही सकता ?
तो ये पत्थर की मूर्ति क्या दे सकती है ?
अगर कोई दे सकती है तो आप ......... है
" आप मुझे आशीर्वाद दीजिये " ।
तभी सास की आँखे खुली !
वो बहू पढ़ी लिखी थी,
तार्किक थी, जागरूक थी ,
तर्क और विवेक के सहारे बहु ने सास को जाग्रत कर दिया !
अगर मानवता की प्राप्ति करनी है तो पहले असहायों , जरुरतमंदों , गरीबो की सेवा करो
परिवार , समाज में लोगो की मदद करे ।
"अंधविश्वास और पाखण्ड को हटाना ही मानव सेवा है " ।
बाकी मंदिर , मस्जिद , गुरुद्वारे, चर्च तो मानसिक गुलामी के केंद्र हैं
ना कि ईश्वर प्राप्ति के
........ मानव का सफर पत्थर से शुरु हुआ था। पत्थरों को ही महत्व देता है और आज पत्थर ही बन कर रह गया -
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1. चूहा अगर पत्थर का तो उसको पूजता है।(गणेश की सवारी मानकर)
लेकिन जीवित चूहा दिख जाये तो पिंजरा लगाता है और चूहा मार दवा खरीदता है।
2.सांप अगर पत्थर का तो उसको पूजता है।(शंकर का कंठहार मानकर)
लेकिन जीवित सांप दिख जाये तो लाठी लेकर मारता है और जबतक मार न दे, चैन नही लेता।
3.बैल अगर पत्थर का तो उसको पूजता है।(शंकर की सवारी मानकर)
लेकिन जीवित बैल(सांड) दिख जाये तो उससे बचकर चलता है ।
4.कुत्ता अगर पत्थर का तो उसको पूजता है।(शनिदेव की सवारी मानकर)
लेकिन जीवित कुत्ता दिख जाये तो 'भाग कुत्ते' कहकर अपमान करता है।
5. शेर अगर पत्थर का तो उसको पूजता है।(दुर्गा की सवारी मानकर)
लेकिन जीवित शेर दिख जाये तो जान बचाकर भाग खड़ा होता है।
हे मानव!
पत्थर से इतना लगाव क्यों और जीवित से इतनी नफरत क्यों?.
..
दोस्तो चांद का मतलब आपकी भावनाओं को ठहेश पहूचां ना नहीं है . lekin आप भी ज़रा सोचे सच क्या है !!!!

दिव्य चमत्कार 
गरूड़ पुराण के अनुसार गो मूत्र देखने मात्र से सभी समस्याओं का समाधान !



Tuesday, January 17, 2017

हरयाणा में महिलाओं की स्तिथि

हरयाणा में महिलाओं की स्तिथि 
आज बड़ी भारी संख्या में विवाह के लिए लड़किया बिहार, असम, मध्यप्रदेश,  झारखंड, पशिचम बंगाल आदि राज्यों से खरीदकर लाई जाती है पर अब  सवाल यह उठता है कि दूसरे राज्यों से जो लड़कियाँ खरीदकर लाई जाती है  उन्हें पूरा सम्मान व ओहदा मिलता है जिसकी वो हकदार है, नहीं  कदापि नहीं।
CHANDIGARH: In the last four months of Manohar Lal Khattar-led BJP government in Haryana, crimes against women have continued unabated, new figures reveal. According to a statement presented before the assembly, a total of 2,715 cases of various crimes against women were registered across the state between October 26, 2014 and February 28, which comes to about 67 cases per day.

Dalits

हरियाणा में दलितों की हालात 
भारतीय लोकतंत्र देश के वंचितों को सुरक्षित और सम्मानपूर्ण जीवन मुहैया कराने में सफल होता नहीं दिख रहा।उनकी समस्याएं, उनके सवाल, उनका दर्द, उनका विकास, उनकी शिक्षा, सम्मान, रोजी-रोटी, रोजगार सब कुछ पहले भी हाशिए पर था, लेकिन अब तो उन्हें हाशिए से भी बाहर मान लिया गया है।
मिर्चपुर में एक वाल्मीकि परिवार का पालतू कुत्ता जाट युवकों पर भौंकता है तो उसे जाट बर्दाश्त नहीं कर सके और बदले में उन्होंने बर्बरता का नंगा नाच किया। इस हादसे के बाद 150 से ज्यादा वाल्मीकि परिवारों ने मिर्चपुर गांव को छोड़ दिया। हरियाणा से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मच गया।
23 मार्च 2014 को जब देश शहीद भगत सिंह की कुर्बानी को याद कर रहा था, हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गांव में दलित समुदाय की चार बच्चियों को एक दबंग जाति के लड़के जबरन कार में खींच ले गए। रुमाल सुंघाकर उन्हें बेहोश किया और फिर सामूहिक बलात्कार। बच्चियां भटिंडा रेलवे स्टेशन पर पड़ी मिलीं। 
दलित और कमजोर तबकों को तो जीवन-पर्यंत सवर्णों की दया और मेहरबानी के बोझ तले ही रहना पड़ता है। अगर दलित थोड़ा सा भी उपर उठने की कोशिश करते हैं या किसी तरह की ‘एहसानफरामोशी’ करते हैं तो फिर शुरू हो जाता है उन पर यातनाओं और दमन का बर्बर दौर। राजनीतिक व्यवस्था या प्रणाली चाहे अभिजनवादी हो या बहुजनवादी, दोनो ही दलित चेतना और उभार का इस्तेमाल सिर्फ अपनी सत्ता के लिए खड़ा करते हैं। कांग्रेस हो या बीजेपी या चाहे मायावती की बसपा कोई भी दलितों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान की चिंता तभी तक ही करती है जब तक उन्हें दलितों के जरिये सत्ता नहीं मिल जाती। 
इंदिरा गांधी ने जिस बीज को बोया, आडवाणी-मोदी की बीजेपी उसी का फसल काट रही है। इंदिरा गांधी के सांप्रदायीकरण और आडवाणी के मंडल विरोधी और मोदी के अवसरपरक मंडल समर्थक रुपांतरण में कोई खास अंतर नहीं है। ऐसी स्थिति में गुजरात हो या हरियाणा, वहां दलितों के साथ न्याय की उम्मीद रखना ही बेईमानी है। बीजेपी के दलित सांसद भी इसे बखूबी जानते हैं, इसलिए वे पार्टी और संघ के ब्राह्मणवादी सनातन संस्कृति के खिलाफ नहीं जा सकते।
NACDOR के अनुसार पिछले 10 सालों में दलितों के खिलाफ हिंसा के मामले 271 प्रतिशत बढ़े हैं। NCRB के 2014 के डेटा के अनुसार दलितों पर अपराध के 92.3 प्रतिशत मामलों में चार्जशीट हो जाती है, लेकिन सिर्फ 28.8 प्रतिशत को ही सजा मिलती है।

रोहतक(16जनवरी,2017) नोटबंदी व प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना बिगडती कानून-व्यवस्था के खिलाफ एवम् मनरेगाा के तहत काम, आवास योजनाओं के भुगतान करने संबंधी अनके मुद्दों को लेकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के आह्वान पर सैकड़ों लोगों ने जोदार आक्रोश प्रदर्शन के माध्यम से प्रधानंमंत्री के नाम ज्ञापन भेजा। 
  जिलास्तरीय आक्रोश प्रदर्शन के पहले सैकड़ों लोग स्थानीय मानसरोवर पार्क में एकत्रित हुए और राजकुमारी दहिया व सतबीर पाक्समा की अध्यक्षता में सभी की। सभा में बोलते हुए माकपा राज्य सचिवमंडल सदस्य इन्द्रजीत ने कहा कि नोटबंदी के नाम पर प्रधानमंत्री ने जमा राशि पर अधिकतम सीमा लगाकर लोगो को अपने ही पैसो से वंचित कर रही है। कालेधन व भ्रष्टाचार के नाम पर पूरे प्रदेश के किसानों से सरकार 625 करोड़ रू. से ज्यादा लूट चुकी है, किसानों के भारी विरोध के बावजूद भी सरकार बीमा कम्पनियों को फायदा पहुंचाने पर आमादा है। 
   पार्टी जिला सचिव विनोद ने कहा कि मनरेगा के तहत कामगारों के काम का भुगतान न करके व आवास योजना के अनुदानों को लटकाकर गरीबों के साथ भद्दा मजाक कर रही है। सुशासन का नारा देने वाली भाजपा के शासनकाल में गुण्डे व दरिंदे खुलेआम घूम रहे है और आम नागरिक भय के साये में जीने को मजबूर है। लोगों को पीने का पानी तक मुहैया नही हो रहा है। समान काम-समान वेतन सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी कर न्यायपालिका की अवमानना के साथ कच्चे कर्मचारियों का शोषण कर हरी है। आगामी दिनों में माकपा इन मुद्दों पर तीखा संघर्ष का ऐलान करेगी। 
  बाद में माकपाई प्रदर्शनकारी हाथों में लाल झंड़े लिए शहर में प्रदर्शन करते हुए उपायुक्त कार्यालय पहंुचे और 14 सुत्रीय मांग-पत्र एसडीएम महम के माध्यम से प्रधानमंत्री को भेजा। विरोध कार्यवाही को प्रीत सिंह, प्रकाशचन्द्र, सीटू प्रदेश महासचिव जयभगवान, महिला नेत्री जगमति संगवान, बलवान सिंह, एडवोकेट रामचन्द्र सिवाच, अंजु, संजीव सिंह, ओमप्रकाश सिवाच, रणधीर, सतपाल ने भी संबोधित किया। 
ये मांगे प्रमुख रूप से शामिल रही । 
1.    मनरेगा के तहत किए गए काम की दिहाड़ी का भुगतान यथाशीघ्र करवाया जाए व सभी जरूरतमंद कामगारों के जॉब कार्ड बनवाकर 100 दिन का काम सुनिश्चित किया जाए।
2.    आवारा पशुओं के कारण फसलों के नुकसान व सड़क दुघटनाओं के अनेक मामले सामने आ रहे है। इसलिए आवारा पशुओं पर तुरंत नकेल कसी जाए।
3.    इंदिरा, राजीव आवास योजना के रोके गए अनुदानों को तुरंत जारी किया जाए। 
4.    प्रधानमंत्री बीमा योजना के तहत किसानों के खातों से जबरन वसुली पर तुरंत रोक लगाई जाए। 
5.    नीतू हत्याकाण्ड के 7 महीने बीत जाने के बावजूद न तो दोषियों को गिरफ्तार किया और न ही पीडि़त परिवार को मुआवजा मिला है। इस मामले में न्याय सुनिश्चित करवाया जाए। 
6.    10वीं कक्षा की छात्रा के साथ हुए घिनौने अपराध के मामले में दोषियों को सख्त सजा सुनिश्चित करवाने के लिए उचित कदम उठाए जाए।  
7.    राशन डिपों पर आधार कार्ड से जोड़ने की व्यवस्था से लोगों को भारी परेशनियों करना सामना करना पड़ रहा है इस बारे में उचित निर्देश जारी करे।
8.    निर्माण कामगारों को श्रम कल्याण बोर्ड के तहत मिलने वाले सुविधा लाभ लम्बे समय से लटके पड़े है। लाभों के भुगतान को सुनिश्चित करें।
9.    दिहाड़ी मारने की घटनाओं बारे जिला स्तर पर उचित व्यवस्था कर कामगारों का शोषण बंद करवाया जाए।  
10.    सभी बेजमीने लोगों को रिहायशी प्लाट दिए जाए।   
11.    रिटायर्ड कर्मचारियों, आटो चालको समेत रोहतक में नागरिको पर बनाए गए झूठे मुकदमें वापिस लो। 
                                                      प्रकाशचन्द्र 
                                                  जिला सचिवमंडल सदस्य
                                                     सी.पी.आई(एम)
                                                     9416731506

Monday, January 16, 2017

कवि फौजी किसान मेहर सिंह

कवि फौजी किसान मेहर सिंह के जन्म दिवस (15 फरवारी , 2017 को बरोणा गाँव में रागनियों का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है । बाकि डिटेल तय की जा रही  हैं । शीघ्र ही सूचित किया जायेगा आप से निवेदन है कि 15 फरवरी को बरोणा गाँव पधारें