Monday, June 12, 2017

OUR CULTURE1


संस्कृति कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे हम जीवन और जीवन से जुड़ी दैनिक गतिविधियों से काटकर देख सकें। संस्कृति मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्रिया-कलाप से प्रतिबिंबित होती है। मनुष्य के पहनने-ओढ़ने, खाने-पीने, बोलने-लिखने, सोचने-समझने इत्यादि में संस्कृति अभिव्यक्त होती है और इन्हीं से संस्कृति का निर्माण होता है। बेशक धर्म का प्रभाव महत्त्वपूर्ण होता है परन्तु केवल धर्म संस्कृति का जन्मदाता नहीं। जो लोग शुद्ध ‘हिंदू’ या शुद्ध ‘इस्लामिक’ संस्कृति की बात करते हैं, वास्तव में वे लोग संस्कृति का सांप्रदायीकरण कर रहे होते हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे वे राजनीति का सांप्रदायीकरण करते हैं। प्रत्येक जातीय समुदाय की अपनी एक लंबी सांस्कृतिक परपंरा होती है। उसी परंपरा से उसकी संस्कृति का विशिष्ट स्वरूप झलकता है। एक समुदाय जब अपनी संस्कृति को विकसित कर रहा होता है, तो यह स्वाभाविक है कि वह दूसरे जातीय समुदायों के संपर्क में आता है और इस प्रक्रिया में एक दूसरे पर अपने सांस्कृतिक प्रभाव छोड़ता है। इस लेन-देन में कुछ पुराना छूट जाता है और कुछ नया ग्रहण किया जाता है। बौद्ध धर्म कई देशों जैसे श्रीलंका, चीन, थाइलैंड, तिब्बत, कंबोडिया, वियतनाम, जापान इत्यादि में फैला, परन्तु क्या हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि श्रीलंका की संस्कृति तिब्बत या जापान की संस्कृति के समान है बेशक इन सबमें बौद्ध धर्म मौजूद है। इसी तरह, इस्लाम जिस अरब में जन्मा था, वहां से यह इंडोनेशिया, मलेशिया, थाइलैंड, भारत, श्रीलंका, ईरान, मध्य-एशिया, मिस्र, सूडान, मोरोक्को, तुर्की,.... कहां-कहां नहीं फैला, परन्तु देखने की बात यह है कि इन तमाम देशों की संस्कृतियां एकदम भिन्न हैं, बेशक उनका धर्म एक है। हमारे देश में, जहाँ इतनी जातियां, व भाषाएं व धर्म हैं, सभी संस्कृतियों की स्वायतत्ता को मानते हुए हमें परस्पर संबंधता और निर्भरता को स्वीकार करना होगा।

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