दो प्रमुख चिंतन-परंपराएं
किसी भी देश के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में कोई भी परंपरा एक-आयामी या इकहरी नहीं होती। किसी भी देशकाल के समाज में दो चिंतन परंपराओं को मुख्य रूप से पहचाना जा सकता है-- एक रूढ़िवादी और दूसरी प्रगतिकामी। प्रगतिकामी परंपरा समाज के अनिवार्य विकास के लिए संघर्षकारी रास्ता खोजती हुई निरंतर गतिशील होती है, परन्तु रूढ़िवादी, समाज के पांवों की बेड़ियां बनकर परिवर्तन की संभावनाओं को अवरुद्ध करने का हर संभव प्रयास करती हैं। रूढ़िवादी सोच से निर्मित संस्थाएं रूढ़िवादी परंपराओं को जीवित रखने के लिए जन-समूहों को संगठित करती हैं। रूढ़िवादी सोच संकीर्णतावादी होती है और मंताधता पर पलती है। यह मतांधता, वह चाहे हिंदुओं में हो या मुसलमानों में, लोगों को कट्टर बनाती है, सामाजिक सोच पर पहरे लगाती है और व्यवस्था में परिवर्तन की विरोधी होती है। वह मिथक गढ़ती है जिससे समाज में अलगाव पैदा होता है। प्रगतिकामी शक्तियां प्रायः आलोचनात्मक होती हैं, समाज को उसकी बेड़ियों से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्षरत रहती हैं, और इसी कारण से उन पर अंधविश्वासी लोग, जो जनता को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं, हमला करते हैं। दाभोलकर, कलबुर्गी या पानसरे की हत्या इसीलिए की गई क्योंकि वे समाज में अंधविश्वासी, रूढ़िवादी परंपराओं के विरुद्ध जन-जन में जाकर प्रगतिकामी सोच के लिए प्रचार-प्रसार करते थे। ये हत्याएं उन लोगों द्वारा की गईं जो समाज में धर्म और संस्कृति के उन रूढ़िवादी, जर्जर और अलगाववादी पक्षों का वर्चस्व
स्थापित करना चाहती हैं, जो हमें अपनी जंजीरों से प्रेम करना सिखाते हैं। ये प्रतिक्रियावादी ताकतें जनता के बीच कोई ऐसा समावेशी विचार उछाल देती हैं जिनसे वे सामंती व पूंजीवादी शक्तियों के खिलाफ संगठित न होकर राष्ट्र, धर्म और संस्कृति को लेकर एक उन्मादी भीड़ में बदल जाएं। ये ताकतें राज्य सत्ता में धर्म का पूरा दखल चाहती हैं।
भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जो इस तथ्य के साक्षी हैं कि इस धरती पर जब भी राज्य
सत्ता और धर्म का अपवित्रा गठबन्धन हुआ है तब हजारों बेगुनाहों के खून के छींटे मानव संस्कृति के पन्नों पर पड़े
हैं। हिन्दू इतिहास में कम से कम तीन प्रमाण इस स्थिति की पुष्टि करते हैं। एक तो, षड्यंत्रा द्वारा अशोक के
कुल से मगध की गद्दी छीनकर ब्राह्मण राजकुल की स्थापना करने वाले शुंग सम्राट पुष्यमित्रा जिसने पाटलीपुत्रा और जालन्धर के बीच के सारे बौद्ध विहार जला डाले थे और ग्रीकराज बौद्ध मिलिन्द की राजधानी स्यालकोट में घोषणा की थी, ‘‘जो मुझे एक बौद्ध भिक्षु का सिर काट कर देगा उसे मैं सौ सोने की दीनार दूंगा।’’ दूसरा उदाहरण श्री हर्ष से पहले के शैव राजा शशांक का है जिसने बौद्ध मठों और भिक्षुओं पर बड़े अत्याचार किये थे। शशांक ने संघ के अनेक विहार अग्नि की लपटों को समर्पित कर दिए थे और बोधगया के बोधिवृक्ष को कटवाकर उसकी जड़ों में अंगार रखवा दिए थे ताकि वह वृक्ष फिर पनप न सके। तीसरा उदाहरण उसी शती के पांड्य राजा नेडूरमान् का है जिसने शैवों के इशारे पर दक्षिण में आठ हजार जैन साधुओं को जान से मार डाला था। लेकिन भारतीय जनमानस ने संगठित धर्म द्वारा इन राजनीतिक हिंसाओं को आदर्श नहीं माना। ये तीनों--पुष्यमित्रा शुंग, शशांक और नेडूरमान--भारतीय इतिहास के खलनायकों के रूप में ही विख्यात हुए।
ऐसी स्थिति में भारतीय जनता के एक बड़े हिस्से को संकीर्णता और स्मृति लोप से बचाकर उदार और सहिष्णु
सोच की एक समान्तर संस्कृति को विकसित करना आज के राजनीतिक, सामाजिक संदर्भ में बेहद जरूरी है।
किसी भी देश के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में कोई भी परंपरा एक-आयामी या इकहरी नहीं होती। किसी भी देशकाल के समाज में दो चिंतन परंपराओं को मुख्य रूप से पहचाना जा सकता है-- एक रूढ़िवादी और दूसरी प्रगतिकामी। प्रगतिकामी परंपरा समाज के अनिवार्य विकास के लिए संघर्षकारी रास्ता खोजती हुई निरंतर गतिशील होती है, परन्तु रूढ़िवादी, समाज के पांवों की बेड़ियां बनकर परिवर्तन की संभावनाओं को अवरुद्ध करने का हर संभव प्रयास करती हैं। रूढ़िवादी सोच से निर्मित संस्थाएं रूढ़िवादी परंपराओं को जीवित रखने के लिए जन-समूहों को संगठित करती हैं। रूढ़िवादी सोच संकीर्णतावादी होती है और मंताधता पर पलती है। यह मतांधता, वह चाहे हिंदुओं में हो या मुसलमानों में, लोगों को कट्टर बनाती है, सामाजिक सोच पर पहरे लगाती है और व्यवस्था में परिवर्तन की विरोधी होती है। वह मिथक गढ़ती है जिससे समाज में अलगाव पैदा होता है। प्रगतिकामी शक्तियां प्रायः आलोचनात्मक होती हैं, समाज को उसकी बेड़ियों से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्षरत रहती हैं, और इसी कारण से उन पर अंधविश्वासी लोग, जो जनता को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं, हमला करते हैं। दाभोलकर, कलबुर्गी या पानसरे की हत्या इसीलिए की गई क्योंकि वे समाज में अंधविश्वासी, रूढ़िवादी परंपराओं के विरुद्ध जन-जन में जाकर प्रगतिकामी सोच के लिए प्रचार-प्रसार करते थे। ये हत्याएं उन लोगों द्वारा की गईं जो समाज में धर्म और संस्कृति के उन रूढ़िवादी, जर्जर और अलगाववादी पक्षों का वर्चस्व
स्थापित करना चाहती हैं, जो हमें अपनी जंजीरों से प्रेम करना सिखाते हैं। ये प्रतिक्रियावादी ताकतें जनता के बीच कोई ऐसा समावेशी विचार उछाल देती हैं जिनसे वे सामंती व पूंजीवादी शक्तियों के खिलाफ संगठित न होकर राष्ट्र, धर्म और संस्कृति को लेकर एक उन्मादी भीड़ में बदल जाएं। ये ताकतें राज्य सत्ता में धर्म का पूरा दखल चाहती हैं।
भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जो इस तथ्य के साक्षी हैं कि इस धरती पर जब भी राज्य
सत्ता और धर्म का अपवित्रा गठबन्धन हुआ है तब हजारों बेगुनाहों के खून के छींटे मानव संस्कृति के पन्नों पर पड़े
हैं। हिन्दू इतिहास में कम से कम तीन प्रमाण इस स्थिति की पुष्टि करते हैं। एक तो, षड्यंत्रा द्वारा अशोक के
कुल से मगध की गद्दी छीनकर ब्राह्मण राजकुल की स्थापना करने वाले शुंग सम्राट पुष्यमित्रा जिसने पाटलीपुत्रा और जालन्धर के बीच के सारे बौद्ध विहार जला डाले थे और ग्रीकराज बौद्ध मिलिन्द की राजधानी स्यालकोट में घोषणा की थी, ‘‘जो मुझे एक बौद्ध भिक्षु का सिर काट कर देगा उसे मैं सौ सोने की दीनार दूंगा।’’ दूसरा उदाहरण श्री हर्ष से पहले के शैव राजा शशांक का है जिसने बौद्ध मठों और भिक्षुओं पर बड़े अत्याचार किये थे। शशांक ने संघ के अनेक विहार अग्नि की लपटों को समर्पित कर दिए थे और बोधगया के बोधिवृक्ष को कटवाकर उसकी जड़ों में अंगार रखवा दिए थे ताकि वह वृक्ष फिर पनप न सके। तीसरा उदाहरण उसी शती के पांड्य राजा नेडूरमान् का है जिसने शैवों के इशारे पर दक्षिण में आठ हजार जैन साधुओं को जान से मार डाला था। लेकिन भारतीय जनमानस ने संगठित धर्म द्वारा इन राजनीतिक हिंसाओं को आदर्श नहीं माना। ये तीनों--पुष्यमित्रा शुंग, शशांक और नेडूरमान--भारतीय इतिहास के खलनायकों के रूप में ही विख्यात हुए।
ऐसी स्थिति में भारतीय जनता के एक बड़े हिस्से को संकीर्णता और स्मृति लोप से बचाकर उदार और सहिष्णु
सोच की एक समान्तर संस्कृति को विकसित करना आज के राजनीतिक, सामाजिक संदर्भ में बेहद जरूरी है।
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