भारतीय संस्कृति की विशेषताएं--
एंथ्रोपोलिजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने भारत में 4258 समुदायों के सर्वेक्षण के आधार पर भारतीय समाज, संस्कृति
और परंपराओं के बारे में ‘‘भारत के लोग’’ शृंखला प्रकाशित की है जिसके प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं--
-- हमारा समाज इस दुनिया का सबसे वैविध्यमय समाज है। हमारे देश में 4635 विभिन्न समुदाय हैं जिनकी अपनी-अपनी आनुवंशिक विशेषताएं, भाषाएं, पहनावे, आराधना की विधियां, खानपान और रिश्तेदारी और शादी ब्याह की रीतियां हैं। इन्हीं समुदायों की मौलिक जीवनशैली से हमारे राष्ट्रीय आम जनजीवन की मुख्यधारा बनी है।
-- भारत के लोगों की उत्पत्ति मुख्यतः निम्नलिखित नस्लों के मिलन से हुई हैः प्रोटो-आस्टेªलाइड, पैलियो-मेडिटरेनियन, काकेशसाइड, नीग्रोइड और मंगोलीय। विभिन्न जातीयताएं मुख्यतः इस प्रकार हैं: आर्य, फारसी, यूनानी, हूण, अरब, तुर्क, अफ्रीकी, मंगोली, यूरोपीय। ये सब एक दूसरे से इस तरह घुल मिल गई हैं कि किसी भी जातीयता का शुद्ध रूप कहीं भी आज उपलब्ध नहीं है।
-- ऐसा पाया गया है कि विभिन्न समुदायों के बीच रंग रूप, कद काठी, और आनुवंशिक विशेषताओं का जितना
फर्क है, उससे कहीं ज्यादा फर्क एक ही समुदाय के लोगों के बीच देखने मंे आता है। एकरूपता जाति और धर्म के आधार पर काम, क्षेत्रा विशेष में रहने वाले लोगों के बीच ज्यादा होती है। इस बात को वैज्ञानिक निष्कर्षों ने नकार दिया है कि ऊँची जाति और निम्न जाति के अलग-अलग वंशक्रम हैं। मिसाल के तौर पर तमिल ब्राह्मणों की जातीय विशेषता का उत्तर भारत के अथवा कश्मीरी पंडितों से कोई तालमेल नहीं है। करीब-करीब सभी जगह प्रदेश विशेष मंे
ब्राह्मणों और निम्न जाति के लोगों के बीच गजब की समरूपता पाई जाती है। मुसलमान समुदाय की बड़ी आबादी में ऐसे कोई विशेष गुण नहीं पाए जाते जिनके आधार पर उन्हें प्रवासी करार दिया जा सके। उनकी उत्पत्ति मुख्य रूप से स्थानीय आबादी के बीच से हुई है।
-- जहाँ तक मान्यताओं का सवाल है, बहुत कम ऐसे समुदाय हैं जो अपने को आप्रवासी अथवा बाहर से आया
, नहीं मानते। हर समुदाय के लोग अपने पलायन या ‘हिजरत’ के दिनों को अपने लोकगीतों, इतिहास और सामूहिक स्मृति में सुरक्षित रखते हैं। जो जहां निवास करता है उसने उस क्षेत्रा विशेष की स्थानीय परंपराओं के निर्वाह में अपना योगदान दिया है और स्थानीय लोकाचार को स्वीकारा है। यहां तक कि आक्रमणकारी भी प्रवासी बन गए। अनेक हिंदू मतावलंबी ऐसे हैं जो इस देश में उन लोगों से बहुत बाद में आए जो आज इस्लाम को मानते हैं। उदाहरणार्थ, केरल के मुसलमान छठी सदी में भी पहले से मालाबार तट पर रहते आए हैं। ये सभी व्यापार और वाणिज्य से जुड़े लोग थे।
-- हमारी अनेकता और एकता का एक बड़ा माध्यम हमारी भाषा है। यहां करीब 325 भाषाएं और 25 लिपियां
प्रचलन में हैं। ये समय-समय पर विभिन्न भाषाई परिवारों, हिंद आर्य, तिब्बती बर्मी, हिंद यूरोपीय, द्रविड़ आस्त्रो एशियाई, अंडमानी और हिंद-ईरानी से उपजी हैं। हमारे यहां के लगभग 65 फीसदी समुदाय द्विभाषी हैं और लगभग सभी आदिवासी समुदाय के लोक त्रिभाषीय हैं। इस प्रकार नाना प्रकार की मातृभाषाएं हमारी स्थानीय संस्कृति और विविधिता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण औजार हैं। व्यापक पैमाने पर दो भाषाओं के इस्तेमाल की वजह से लोगों के बीच अच्छा संपर्क हो पाया है और यह सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल को बढ़ाता है।
-- भारत के लोगबाग आपस में अलग-थलग नहीं रहे। उनका अपने आसपास के प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश में घनिष्ठ रिश्ता रहा है और सदियों से वे आपसी जीवन और संघर्षों में एक दूसरे के साझीदार बनते रहे हैं।
एंथ्रोपोलिजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने भारत में 4258 समुदायों के सर्वेक्षण के आधार पर भारतीय समाज, संस्कृति
और परंपराओं के बारे में ‘‘भारत के लोग’’ शृंखला प्रकाशित की है जिसके प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं--
-- हमारा समाज इस दुनिया का सबसे वैविध्यमय समाज है। हमारे देश में 4635 विभिन्न समुदाय हैं जिनकी अपनी-अपनी आनुवंशिक विशेषताएं, भाषाएं, पहनावे, आराधना की विधियां, खानपान और रिश्तेदारी और शादी ब्याह की रीतियां हैं। इन्हीं समुदायों की मौलिक जीवनशैली से हमारे राष्ट्रीय आम जनजीवन की मुख्यधारा बनी है।
-- भारत के लोगों की उत्पत्ति मुख्यतः निम्नलिखित नस्लों के मिलन से हुई हैः प्रोटो-आस्टेªलाइड, पैलियो-मेडिटरेनियन, काकेशसाइड, नीग्रोइड और मंगोलीय। विभिन्न जातीयताएं मुख्यतः इस प्रकार हैं: आर्य, फारसी, यूनानी, हूण, अरब, तुर्क, अफ्रीकी, मंगोली, यूरोपीय। ये सब एक दूसरे से इस तरह घुल मिल गई हैं कि किसी भी जातीयता का शुद्ध रूप कहीं भी आज उपलब्ध नहीं है।
-- ऐसा पाया गया है कि विभिन्न समुदायों के बीच रंग रूप, कद काठी, और आनुवंशिक विशेषताओं का जितना
फर्क है, उससे कहीं ज्यादा फर्क एक ही समुदाय के लोगों के बीच देखने मंे आता है। एकरूपता जाति और धर्म के आधार पर काम, क्षेत्रा विशेष में रहने वाले लोगों के बीच ज्यादा होती है। इस बात को वैज्ञानिक निष्कर्षों ने नकार दिया है कि ऊँची जाति और निम्न जाति के अलग-अलग वंशक्रम हैं। मिसाल के तौर पर तमिल ब्राह्मणों की जातीय विशेषता का उत्तर भारत के अथवा कश्मीरी पंडितों से कोई तालमेल नहीं है। करीब-करीब सभी जगह प्रदेश विशेष मंे
ब्राह्मणों और निम्न जाति के लोगों के बीच गजब की समरूपता पाई जाती है। मुसलमान समुदाय की बड़ी आबादी में ऐसे कोई विशेष गुण नहीं पाए जाते जिनके आधार पर उन्हें प्रवासी करार दिया जा सके। उनकी उत्पत्ति मुख्य रूप से स्थानीय आबादी के बीच से हुई है।
-- जहाँ तक मान्यताओं का सवाल है, बहुत कम ऐसे समुदाय हैं जो अपने को आप्रवासी अथवा बाहर से आया
, नहीं मानते। हर समुदाय के लोग अपने पलायन या ‘हिजरत’ के दिनों को अपने लोकगीतों, इतिहास और सामूहिक स्मृति में सुरक्षित रखते हैं। जो जहां निवास करता है उसने उस क्षेत्रा विशेष की स्थानीय परंपराओं के निर्वाह में अपना योगदान दिया है और स्थानीय लोकाचार को स्वीकारा है। यहां तक कि आक्रमणकारी भी प्रवासी बन गए। अनेक हिंदू मतावलंबी ऐसे हैं जो इस देश में उन लोगों से बहुत बाद में आए जो आज इस्लाम को मानते हैं। उदाहरणार्थ, केरल के मुसलमान छठी सदी में भी पहले से मालाबार तट पर रहते आए हैं। ये सभी व्यापार और वाणिज्य से जुड़े लोग थे।
-- हमारी अनेकता और एकता का एक बड़ा माध्यम हमारी भाषा है। यहां करीब 325 भाषाएं और 25 लिपियां
प्रचलन में हैं। ये समय-समय पर विभिन्न भाषाई परिवारों, हिंद आर्य, तिब्बती बर्मी, हिंद यूरोपीय, द्रविड़ आस्त्रो एशियाई, अंडमानी और हिंद-ईरानी से उपजी हैं। हमारे यहां के लगभग 65 फीसदी समुदाय द्विभाषी हैं और लगभग सभी आदिवासी समुदाय के लोक त्रिभाषीय हैं। इस प्रकार नाना प्रकार की मातृभाषाएं हमारी स्थानीय संस्कृति और विविधिता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण औजार हैं। व्यापक पैमाने पर दो भाषाओं के इस्तेमाल की वजह से लोगों के बीच अच्छा संपर्क हो पाया है और यह सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल को बढ़ाता है।
-- भारत के लोगबाग आपस में अलग-थलग नहीं रहे। उनका अपने आसपास के प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश में घनिष्ठ रिश्ता रहा है और सदियों से वे आपसी जीवन और संघर्षों में एक दूसरे के साझीदार बनते रहे हैं।
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