इसी ऐतिहासिक पारस्परिकता और सामूहिक संघर्षों ने हमारी अनेकता और एकता दोनों के स्वरूप को बनाया है। हिन्दुस्तान के संदर्भ में देखें तो एक बात साफ जाहिर होती है, कि मध्ययुगीन भक्ति आंदोलन से लेकर आजादी हासिल करने तक के लम्बे दौर में--कुछ अपवादों को छोड़कर हमारे समाज से भाषा, जाति, धर्म, संप्रदाय आदि की बहुस्तरीय विविधताओं के बीच जो व्यावहारिक जीवनगत् सामरस्य पाया था, उसे हम आजादी के बाद बहुत तेजी से खोते रहे हैं। मध्ययुग में यह सामरस्य धार्मिक-सांस्कृतिक था, भारतीय नवजागरण के वैचारिक संघर्ष ने इसे बौद्धिक-वैचारिक आयाम दिया और स्वाधीनता आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय चेतना के बहुस्तरीय संघर्ष द्वारा, इसे राष्ट्र की एकीकृत राजनीतिक मुख्यधारा में तब्दील किया। यह सामरस्य हमने लोक जीवन में एक लम्बे समय तक साथ रहने के संस्कारों से अर्जित किया था, एक-दूसरे को काटते रक्त रंजित इतिहास के तथ्यों से नहीं, अपनी गंगा-जमुनी परंपरा से लगातार सींचे गये सामूहिक अंतर्मन के अनुभव-साक्ष्यों में खोजा था। किसी लेखक ने ठीक लिखा है कि इस लम्बे दौर में हम किसी तात्कालिक उद्देश्य की ऐतिहासिक अनिवार्यता या राजनीतिक मजबूरी की रस्सी से जबर्दस्ती बांधे गये लकड़ियों के गठ्ठर की तरह एक नहीं थे बल्कि हाथ की पांच अंगुलियों की तरह एक थे--अविभाज्य और एक-दूसरे पर अवलंबित। पांचों अंगुलियां एक-दूसरे से बराबर सटी ही नहीं रहतीं, न एक-सी होती हैं पर एक को कुछ होता है तो सभी
उससे प्रभावित हो जाती हैं। सभी अलग-अलग हरकत कर सकती हैं और मिल कर भी हरकत कर सकती हैं। संगठित प्रतिरोध के लिए मुट्ठी बन कर तन सकती हैं। संस्कृति के ऐसे ही विवेकपूर्ण सामाजिक सोच पर बल देते हुए, पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने ‘भारत एक खोज’ मंे लिखा है--‘‘हिन्दुस्तानी अवाम की जिन्दगी....नस्ली, मजहबी और भाषाई फ़र्क या विविधता के बावजूद एक ही सांस्कृतिक आत्मा से सम्बद्ध है। उत्तर भारत की सारी आबादी जात-पात और मज़हब में भिन्नता से उत्पन्न कुछ पाबंन्दियों के बावजूद--एक जैसे नैतिक मूल्यों और सामाजिक रस्म और रिवाज़ को मानती है, एक भाषा बोलती है, अपने सामूहिक सर्जक श्रम, यातनाओं और एक बेहतर जिन्दगी के लिए अपने साझे सक्रिय संघर्ष की लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया मंे उसने जिस तहजीबी स्वभाव को पोषित किया है वह एक है, उनकी मेहनत और मशक्कत ही उनकी संस्कृति और शक्ति का स्रोत है।’’
रोमिला थापर का कहना है कि अतीत मंे एक ऐसे एकरूप धार्मिक समुदाय की अवधारणा अनुपस्थित दिखाई देती है जिसकी सहज पहचान एक हिन्दू के रूप में की जाए। उपनिवेशपूर्ण समाज उप-जातियांे और स्थानीय निष्ठाओं के कारण इस क़दर विभाजित था कि वह बृहत धार्मिक निष्ठाओं के उभरने की इजाजत नहीं दे सकता था। कुछ विद्वान यह मानते हैं कि उपनिवेश पूर्व काल में समुदायों के बीच सीमाओं की अस्पष्टता इसलिए थी क्योंकि आधुनिक समुदायों की तरह परंपरागत समुदायों को वर्गीकृत नहीं किया गया था।
उससे प्रभावित हो जाती हैं। सभी अलग-अलग हरकत कर सकती हैं और मिल कर भी हरकत कर सकती हैं। संगठित प्रतिरोध के लिए मुट्ठी बन कर तन सकती हैं। संस्कृति के ऐसे ही विवेकपूर्ण सामाजिक सोच पर बल देते हुए, पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने ‘भारत एक खोज’ मंे लिखा है--‘‘हिन्दुस्तानी अवाम की जिन्दगी....नस्ली, मजहबी और भाषाई फ़र्क या विविधता के बावजूद एक ही सांस्कृतिक आत्मा से सम्बद्ध है। उत्तर भारत की सारी आबादी जात-पात और मज़हब में भिन्नता से उत्पन्न कुछ पाबंन्दियों के बावजूद--एक जैसे नैतिक मूल्यों और सामाजिक रस्म और रिवाज़ को मानती है, एक भाषा बोलती है, अपने सामूहिक सर्जक श्रम, यातनाओं और एक बेहतर जिन्दगी के लिए अपने साझे सक्रिय संघर्ष की लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया मंे उसने जिस तहजीबी स्वभाव को पोषित किया है वह एक है, उनकी मेहनत और मशक्कत ही उनकी संस्कृति और शक्ति का स्रोत है।’’
रोमिला थापर का कहना है कि अतीत मंे एक ऐसे एकरूप धार्मिक समुदाय की अवधारणा अनुपस्थित दिखाई देती है जिसकी सहज पहचान एक हिन्दू के रूप में की जाए। उपनिवेशपूर्ण समाज उप-जातियांे और स्थानीय निष्ठाओं के कारण इस क़दर विभाजित था कि वह बृहत धार्मिक निष्ठाओं के उभरने की इजाजत नहीं दे सकता था। कुछ विद्वान यह मानते हैं कि उपनिवेश पूर्व काल में समुदायों के बीच सीमाओं की अस्पष्टता इसलिए थी क्योंकि आधुनिक समुदायों की तरह परंपरागत समुदायों को वर्गीकृत नहीं किया गया था।
No comments:
Post a Comment