"क्रांति से हमारा अभिप्राय है -- अन्याय पर आधारित मौजूद समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन । समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं । दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने दाने के लिए मोहताज हैं । दुनियाभर के बाजारों को कपड़ा मुहैया करानेवाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढकने भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है । सुन्दर महलों का निर्माण वाले राजगीर , लोहार तथा बढ़ई स्वयं गंदे बाड़ों में रहकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर जाते हैं । इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूंजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वारा -न्यारा कर देते हैं । यह भयानक असमानता और जबरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल पुथल की तरफ लिए जा रहा है । यह स्तिथि बहुत दिनों तक कायम नहीं रह सकती । स्पष्ट है की आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरलियां मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं ।
( भगत सिंह और उनके साथियों के उपलब्ध सम्पूर्ण दस्तावेज ,सं -- सत्यम , पृष्ठ 338 )
( भगत सिंह और उनके साथियों के उपलब्ध सम्पूर्ण दस्तावेज ,सं -- सत्यम , पृष्ठ 338 )
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