हरियाणा में दलितों की हालात
भारतीय लोकतंत्र देश के वंचितों को सुरक्षित और सम्मानपूर्ण जीवन मुहैया कराने में सफल होता नहीं दिख रहा।उनकी समस्याएं, उनके सवाल, उनका दर्द, उनका विकास, उनकी शिक्षा, सम्मान, रोजी-रोटी, रोजगार सब कुछ पहले भी हाशिए पर था, लेकिन अब तो उन्हें हाशिए से भी बाहर मान लिया गया है।
मिर्चपुर में एक वाल्मीकि परिवार का पालतू कुत्ता जाट युवकों पर भौंकता है तो उसे जाट बर्दाश्त नहीं कर सके और बदले में उन्होंने बर्बरता का नंगा नाच किया। इस हादसे के बाद 150 से ज्यादा वाल्मीकि परिवारों ने मिर्चपुर गांव को छोड़ दिया। हरियाणा से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मच गया।
23 मार्च 2014 को जब देश शहीद भगत सिंह की कुर्बानी को याद कर रहा था, हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गांव में दलित समुदाय की चार बच्चियों को एक दबंग जाति के लड़के जबरन कार में खींच ले गए। रुमाल सुंघाकर उन्हें बेहोश किया और फिर सामूहिक बलात्कार। बच्चियां भटिंडा रेलवे स्टेशन पर पड़ी मिलीं।
23 मार्च 2014 को जब देश शहीद भगत सिंह की कुर्बानी को याद कर रहा था, हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गांव में दलित समुदाय की चार बच्चियों को एक दबंग जाति के लड़के जबरन कार में खींच ले गए। रुमाल सुंघाकर उन्हें बेहोश किया और फिर सामूहिक बलात्कार। बच्चियां भटिंडा रेलवे स्टेशन पर पड़ी मिलीं।
दलित और कमजोर तबकों को तो जीवन-पर्यंत सवर्णों की दया और मेहरबानी के बोझ तले ही रहना पड़ता है। अगर दलित थोड़ा सा भी उपर उठने की कोशिश करते हैं या किसी तरह की ‘एहसानफरामोशी’ करते हैं तो फिर शुरू हो जाता है उन पर यातनाओं और दमन का बर्बर दौर। राजनीतिक व्यवस्था या प्रणाली चाहे अभिजनवादी हो या बहुजनवादी, दोनो ही दलित चेतना और उभार का इस्तेमाल सिर्फ अपनी सत्ता के लिए खड़ा करते हैं। कांग्रेस हो या बीजेपी या चाहे मायावती की बसपा कोई भी दलितों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान की चिंता तभी तक ही करती है जब तक उन्हें दलितों के जरिये सत्ता नहीं मिल जाती।
इंदिरा गांधी ने जिस बीज को बोया, आडवाणी-मोदी की बीजेपी उसी का फसल काट रही है। इंदिरा गांधी के सांप्रदायीकरण और आडवाणी के मंडल विरोधी और मोदी के अवसरपरक मंडल समर्थक रुपांतरण में कोई खास अंतर नहीं है। ऐसी स्थिति में गुजरात हो या हरियाणा, वहां दलितों के साथ न्याय की उम्मीद रखना ही बेईमानी है। बीजेपी के दलित सांसद भी इसे बखूबी जानते हैं, इसलिए वे पार्टी और संघ के ब्राह्मणवादी सनातन संस्कृति के खिलाफ नहीं जा सकते।
NACDOR के अनुसार पिछले 10 सालों में दलितों के खिलाफ हिंसा के मामले 271 प्रतिशत बढ़े हैं। NCRB के 2014 के डेटा के अनुसार दलितों पर अपराध के 92.3 प्रतिशत मामलों में चार्जशीट हो जाती है, लेकिन सिर्फ 28.8 प्रतिशत को ही सजा मिलती है।
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