Monday, June 12, 2017

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दो प्रमुख चिंतन-परंपराएं

किसी भी देश के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में कोई भी परंपरा एक-आयामी या इकहरी नहीं होती। किसी भी देशकाल के समाज में दो चिंतन परंपराओं को मुख्य रूप से पहचाना जा सकता है-- एक रूढ़िवादी और दूसरी प्रगतिकामी। प्रगतिकामी परंपरा समाज के अनिवार्य विकास के लिए संघर्षकारी रास्ता खोजती हुई निरंतर गतिशील होती है, परन्तु रूढ़िवादी, समाज के पांवों की बेड़ियां बनकर परिवर्तन की संभावनाओं को अवरुद्ध करने का हर संभव प्रयास करती हैं। रूढ़िवादी सोच से निर्मित संस्थाएं रूढ़िवादी परंपराओं को जीवित रखने के लिए जन-समूहों को संगठित करती हैं। रूढ़िवादी सोच संकीर्णतावादी होती है और मंताधता पर पलती है। यह मतांधता, वह चाहे हिंदुओं में हो या मुसलमानों में, लोगों को कट्टर बनाती है, सामाजिक सोच पर पहरे लगाती है और व्यवस्था में परिवर्तन की विरोधी होती है। वह मिथक गढ़ती है जिससे समाज में अलगाव पैदा होता है। प्रगतिकामी शक्तियां प्रायः आलोचनात्मक होती हैं, समाज को उसकी बेड़ियों से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्षरत रहती हैं, और इसी कारण से उन पर अंधविश्वासी लोग, जो जनता को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं, हमला करते हैं। दाभोलकर, कलबुर्गी या पानसरे की हत्या इसीलिए की गई क्योंकि वे समाज में अंधविश्वासी, रूढ़िवादी परंपराओं के विरुद्ध जन-जन में जाकर प्रगतिकामी सोच के लिए प्रचार-प्रसार करते थे। ये हत्याएं उन लोगों द्वारा की गईं जो समाज में धर्म और संस्कृति के उन रूढ़िवादी, जर्जर और अलगाववादी पक्षों का वर्चस्व
स्थापित करना चाहती हैं, जो हमें अपनी जंजीरों से प्रेम करना सिखाते हैं। ये प्रतिक्रियावादी ताकतें जनता के बीच कोई ऐसा समावेशी विचार उछाल देती हैं जिनसे वे सामंती व पूंजीवादी शक्तियों के खिलाफ संगठित न होकर राष्ट्र, धर्म और संस्कृति को लेकर एक उन्मादी भीड़ में बदल जाएं। ये ताकतें राज्य सत्ता में धर्म का पूरा दखल चाहती हैं।
भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जो इस तथ्य के साक्षी हैं कि इस धरती पर जब भी राज्य
सत्ता और धर्म का अपवित्रा गठबन्धन हुआ है तब हजारों बेगुनाहों के खून के छींटे मानव संस्कृति के पन्नों पर पड़े
हैं। हिन्दू इतिहास में कम से कम तीन प्रमाण इस स्थिति की पुष्टि करते हैं। एक तो, षड्यंत्रा द्वारा अशोक के
कुल से मगध की गद्दी छीनकर ब्राह्मण राजकुल की स्थापना करने वाले शुंग सम्राट पुष्यमित्रा जिसने पाटलीपुत्रा और जालन्धर के बीच के सारे बौद्ध विहार जला डाले थे और ग्रीकराज बौद्ध मिलिन्द की राजधानी स्यालकोट में घोषणा की थी, ‘‘जो मुझे एक बौद्ध भिक्षु का सिर काट कर देगा उसे मैं सौ सोने की दीनार दूंगा।’’ दूसरा उदाहरण श्री हर्ष से पहले के शैव राजा शशांक का है जिसने बौद्ध मठों और भिक्षुओं पर बड़े अत्याचार किये थे। शशांक ने संघ के अनेक विहार अग्नि की लपटों को समर्पित कर दिए थे और बोधगया के बोधिवृक्ष को कटवाकर उसकी जड़ों में अंगार रखवा दिए थे ताकि वह वृक्ष फिर पनप न सके। तीसरा उदाहरण उसी शती के पांड्य राजा नेडूरमान् का है जिसने शैवों के इशारे पर दक्षिण में आठ हजार जैन साधुओं को जान से मार डाला था। लेकिन भारतीय जनमानस ने संगठित धर्म द्वारा इन राजनीतिक हिंसाओं को आदर्श नहीं माना। ये तीनों--पुष्यमित्रा शुंग, शशांक और नेडूरमान--भारतीय इतिहास के खलनायकों के रूप में ही विख्यात हुए।
ऐसी स्थिति में भारतीय जनता के एक बड़े हिस्से को संकीर्णता और स्मृति लोप से बचाकर उदार और सहिष्णु
सोच की एक समान्तर संस्कृति को विकसित करना आज के राजनीतिक, सामाजिक संदर्भ में बेहद जरूरी है। 

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इसी ऐतिहासिक पारस्परिकता और सामूहिक संघर्षों ने हमारी अनेकता और एकता दोनों के स्वरूप को बनाया है। हिन्दुस्तान के संदर्भ में देखें तो एक बात साफ जाहिर होती है, कि मध्ययुगीन भक्ति आंदोलन से लेकर आजादी हासिल करने तक के लम्बे दौर में--कुछ अपवादों को छोड़कर हमारे समाज से भाषा, जाति, धर्म, संप्रदाय आदि की बहुस्तरीय विविधताओं के बीच जो व्यावहारिक जीवनगत् सामरस्य पाया था, उसे हम आजादी के बाद बहुत तेजी से खोते रहे हैं। मध्ययुग में यह सामरस्य धार्मिक-सांस्कृतिक था, भारतीय नवजागरण के वैचारिक संघर्ष ने इसे बौद्धिक-वैचारिक आयाम दिया और स्वाधीनता आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय चेतना के बहुस्तरीय संघर्ष द्वारा, इसे राष्ट्र की एकीकृत राजनीतिक मुख्यधारा में तब्दील किया। यह सामरस्य हमने लोक जीवन में एक लम्बे समय तक साथ रहने के संस्कारों से अर्जित किया था, एक-दूसरे को काटते रक्त रंजित इतिहास के तथ्यों से नहीं, अपनी गंगा-जमुनी परंपरा से लगातार सींचे गये सामूहिक अंतर्मन के अनुभव-साक्ष्यों में खोजा था। किसी लेखक ने ठीक लिखा है कि इस लम्बे दौर में हम किसी तात्कालिक उद्देश्य की ऐतिहासिक अनिवार्यता या राजनीतिक मजबूरी की रस्सी से जबर्दस्ती बांधे गये लकड़ियों के गठ्ठर की तरह एक नहीं थे बल्कि हाथ की पांच अंगुलियों की तरह एक थे--अविभाज्य और एक-दूसरे पर अवलंबित। पांचों अंगुलियां एक-दूसरे से बराबर सटी ही नहीं रहतीं, न एक-सी होती हैं पर एक को कुछ होता है तो सभी
उससे प्रभावित हो जाती हैं। सभी अलग-अलग हरकत कर सकती हैं और मिल कर भी हरकत कर सकती हैं। संगठित प्रतिरोध के लिए मुट्ठी बन कर तन सकती हैं। संस्कृति के ऐसे ही विवेकपूर्ण सामाजिक सोच पर बल देते हुए, पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने ‘भारत एक खोज’ मंे लिखा है--‘‘हिन्दुस्तानी अवाम की जिन्दगी....नस्ली, मजहबी और भाषाई फ़र्क या विविधता के बावजूद एक ही सांस्कृतिक आत्मा से सम्बद्ध है। उत्तर भारत की सारी आबादी जात-पात और मज़हब में  भिन्नता से उत्पन्न कुछ पाबंन्दियों के बावजूद--एक जैसे नैतिक मूल्यों और सामाजिक रस्म और रिवाज़ को मानती है, एक भाषा बोलती है, अपने सामूहिक सर्जक श्रम, यातनाओं और एक बेहतर जिन्दगी के लिए अपने साझे सक्रिय संघर्ष की लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया मंे उसने जिस तहजीबी स्वभाव को पोषित किया है वह एक है, उनकी मेहनत और मशक्कत ही उनकी संस्कृति और शक्ति का स्रोत है।’’
रोमिला थापर का कहना है कि अतीत मंे एक ऐसे एकरूप धार्मिक समुदाय की अवधारणा अनुपस्थित दिखाई देती है जिसकी सहज पहचान एक हिन्दू के रूप में की जाए। उपनिवेशपूर्ण समाज उप-जातियांे और स्थानीय निष्ठाओं के कारण इस क़दर विभाजित था कि वह बृहत धार्मिक निष्ठाओं के उभरने की इजाजत नहीं दे सकता था। कुछ विद्वान यह मानते हैं कि उपनिवेश पूर्व काल में समुदायों के बीच सीमाओं की अस्पष्टता इसलिए थी क्योंकि आधुनिक समुदायों की तरह परंपरागत समुदायों को वर्गीकृत नहीं किया गया था।

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भारतीय संस्कृति की विशेषताएं--
एंथ्रोपोलिजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने भारत में 4258 समुदायों के सर्वेक्षण के आधार पर भारतीय समाज, संस्कृति
और परंपराओं के बारे में ‘‘भारत के लोग’’ शृंखला प्रकाशित की है जिसके प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं--
-- हमारा समाज इस दुनिया का सबसे वैविध्यमय समाज है। हमारे देश में 4635 विभिन्न समुदाय हैं जिनकी अपनी-अपनी आनुवंशिक विशेषताएं, भाषाएं, पहनावे, आराधना की विधियां, खानपान और रिश्तेदारी और शादी ब्याह की रीतियां हैं। इन्हीं समुदायों की मौलिक जीवनशैली से हमारे राष्ट्रीय आम जनजीवन की मुख्यधारा बनी है।
-- भारत के लोगों की उत्पत्ति मुख्यतः निम्नलिखित नस्लों के मिलन से हुई हैः प्रोटो-आस्टेªलाइड, पैलियो-मेडिटरेनियन, काकेशसाइड, नीग्रोइड और मंगोलीय। विभिन्न जातीयताएं मुख्यतः इस प्रकार हैं: आर्य, फारसी, यूनानी, हूण, अरब, तुर्क, अफ्रीकी, मंगोली, यूरोपीय। ये सब एक दूसरे से इस तरह घुल मिल गई हैं कि किसी भी जातीयता का शुद्ध रूप कहीं भी आज उपलब्ध नहीं है।
-- ऐसा पाया गया है कि विभिन्न समुदायों के बीच रंग रूप, कद काठी, और आनुवंशिक विशेषताओं का जितना
फर्क है, उससे कहीं ज्यादा फर्क एक ही समुदाय के लोगों के बीच देखने मंे आता है। एकरूपता जाति और धर्म के आधार पर काम, क्षेत्रा विशेष में रहने वाले लोगों के बीच ज्यादा होती है। इस बात को वैज्ञानिक निष्कर्षों ने नकार दिया है कि ऊँची जाति और निम्न जाति के अलग-अलग वंशक्रम हैं। मिसाल के तौर पर तमिल ब्राह्मणों की जातीय विशेषता का उत्तर भारत के अथवा कश्मीरी पंडितों से कोई तालमेल नहीं है। करीब-करीब सभी जगह प्रदेश विशेष मंे
ब्राह्मणों  और निम्न जाति के लोगों के बीच गजब की समरूपता पाई जाती है। मुसलमान समुदाय की बड़ी आबादी में ऐसे कोई विशेष गुण नहीं पाए जाते जिनके आधार पर उन्हें प्रवासी करार दिया जा सके। उनकी उत्पत्ति मुख्य रूप से स्थानीय आबादी के बीच से हुई है।
-- जहाँ तक मान्यताओं का सवाल है, बहुत कम ऐसे समुदाय हैं जो अपने को आप्रवासी अथवा बाहर से आया
, नहीं मानते। हर समुदाय के लोग अपने पलायन या ‘हिजरत’ के दिनों को अपने लोकगीतों, इतिहास और सामूहिक स्मृति में सुरक्षित रखते हैं। जो जहां निवास करता है उसने उस क्षेत्रा विशेष की स्थानीय परंपराओं के निर्वाह में अपना योगदान दिया है और स्थानीय लोकाचार को स्वीकारा है। यहां तक कि आक्रमणकारी भी प्रवासी बन गए। अनेक हिंदू मतावलंबी ऐसे हैं जो इस देश में उन लोगों से बहुत बाद में आए जो आज इस्लाम को मानते हैं। उदाहरणार्थ, केरल के मुसलमान छठी सदी में भी पहले से मालाबार तट पर रहते आए हैं। ये सभी व्यापार और वाणिज्य से जुड़े लोग थे।
-- हमारी अनेकता और एकता का एक बड़ा माध्यम हमारी भाषा है। यहां करीब 325 भाषाएं और 25 लिपियां
प्रचलन में हैं। ये समय-समय पर विभिन्न भाषाई परिवारों, हिंद आर्य, तिब्बती बर्मी, हिंद यूरोपीय, द्रविड़ आस्त्रो एशियाई, अंडमानी और हिंद-ईरानी से उपजी हैं। हमारे यहां के लगभग 65 फीसदी समुदाय द्विभाषी हैं और लगभग सभी आदिवासी समुदाय के लोक त्रिभाषीय हैं। इस प्रकार नाना प्रकार की मातृभाषाएं हमारी स्थानीय संस्कृति और विविधिता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण औजार हैं। व्यापक पैमाने पर दो भाषाओं के इस्तेमाल की वजह से लोगों के बीच अच्छा संपर्क हो पाया है और यह सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल को बढ़ाता है।
-- भारत के लोगबाग आपस में अलग-थलग नहीं रहे। उनका अपने आसपास के प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश में घनिष्ठ रिश्ता रहा है और सदियों से वे आपसी जीवन और संघर्षों में एक दूसरे के साझीदार बनते रहे हैं। 

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संस्कृति कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे हम जीवन और जीवन से जुड़ी दैनिक गतिविधियों से काटकर देख सकें। संस्कृति मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्रिया-कलाप से प्रतिबिंबित होती है। मनुष्य के पहनने-ओढ़ने, खाने-पीने, बोलने-लिखने, सोचने-समझने इत्यादि में संस्कृति अभिव्यक्त होती है और इन्हीं से संस्कृति का निर्माण होता है। बेशक धर्म का प्रभाव महत्त्वपूर्ण होता है परन्तु केवल धर्म संस्कृति का जन्मदाता नहीं। जो लोग शुद्ध ‘हिंदू’ या शुद्ध ‘इस्लामिक’ संस्कृति की बात करते हैं, वास्तव में वे लोग संस्कृति का सांप्रदायीकरण कर रहे होते हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे वे राजनीति का सांप्रदायीकरण करते हैं। प्रत्येक जातीय समुदाय की अपनी एक लंबी सांस्कृतिक परपंरा होती है। उसी परंपरा से उसकी संस्कृति का विशिष्ट स्वरूप झलकता है। एक समुदाय जब अपनी संस्कृति को विकसित कर रहा होता है, तो यह स्वाभाविक है कि वह दूसरे जातीय समुदायों के संपर्क में आता है और इस प्रक्रिया में एक दूसरे पर अपने सांस्कृतिक प्रभाव छोड़ता है। इस लेन-देन में कुछ पुराना छूट जाता है और कुछ नया ग्रहण किया जाता है। बौद्ध धर्म कई देशों जैसे श्रीलंका, चीन, थाइलैंड, तिब्बत, कंबोडिया, वियतनाम, जापान इत्यादि में फैला, परन्तु क्या हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि श्रीलंका की संस्कृति तिब्बत या जापान की संस्कृति के समान है बेशक इन सबमें बौद्ध धर्म मौजूद है। इसी तरह, इस्लाम जिस अरब में जन्मा था, वहां से यह इंडोनेशिया, मलेशिया, थाइलैंड, भारत, श्रीलंका, ईरान, मध्य-एशिया, मिस्र, सूडान, मोरोक्को, तुर्की,.... कहां-कहां नहीं फैला, परन्तु देखने की बात यह है कि इन तमाम देशों की संस्कृतियां एकदम भिन्न हैं, बेशक उनका धर्म एक है। हमारे देश में, जहाँ इतनी जातियां, व भाषाएं व धर्म हैं, सभी संस्कृतियों की स्वायतत्ता को मानते हुए हमें परस्पर संबंधता और निर्भरता को स्वीकार करना होगा।