फौजी मेहर सिंह ने समाज में फैली हर बुराई को अपनी रागनियों के माध्यम से उठाया
सोनीपत जिले के बरोणा गांव में जन्म फौजी मेहर सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उन्हें हरियाणा का बच्चा-बच्चा जानता है। सुप्रसिद्ध स्वतंत्राता सेनानी और लोक-कवि मेहर सिंह जो ‘‘फौजी’’ मेहर सिंह के नाम से विख्यात हुए। उनका जन्म एक आर्य समाजी परिवार में हुआ था। सुरीली आवाज मानों उन्हें तोहफे में मिली थी। बचपन में उन्होंने डांगर-ढोर चराये हैं। वे पेड़ों की टहनियों पर बैठकर रागनी गाते थे। घर में रागनी गाने पर सख्त पाबन्दी थी। आर्यसमाजी पिता नन्द राम का मानना था कि रागनी जाटों का काम नहीं है। उन्होंने किसानी परिवार में पैदा होकर किसानी जीवन जीया था। किसान के दुर्ख-दर्द को नज़दीक से देखा और अनुभव किया था। ठिठुरती सदी या चिलचिलाती धूप में अनथक परिश्रम करने वाले इस बेचारे की जिन्दगी का चित्राण एक रागनी में इस प्रकार किया है-
देख रोंगटे खड़े होग्ये या मेरी छाती धड़कै।
गरीब किसान की ज़िन्दगी क्युकर बीतै सै मर-पड़कै।
उसके रागनी प्रेम से तंग आ कर उनके पिता ने मेहर सिंह की शादी की दी। यही नहीं उनकी इच्छा के विरूद्ध 1936 में उन्हें बरेली में जाट रेजीमेंट में भर्ती करवा दिया। गांव से दूर फौज में जाकर मेहर सिंह ने अनेक किस्से लिखेे। फौज में डन्हें अब पिता की मार का भी डर नहीं था। भर्ती होने के बाद उन्होंने संभवत पहली रागनी लिखी जिसकी दो लाईने दी गयी हैं।-
देश नगर, घर गाम छुटग्या, कितका गाणा गाया,
कहै जाट तै डूम हो लिया, बाप मेरा घबराया।
इसमें स्पष्ट है कि पिता ने रागनी गाने की वजह से उन्हें जबरन फौज में भर्ती करवा दिया। स्व0 फौजी मेहर सिंह ने समाज में फैली हर बुराई को अपनी रागनियों के माध्यम से उठाया। उनकी रागनियों में प्रेम, विरह, सुख-दुख सभी का चित्राण है। उनकी रागनियों ने तीखापन, आक्रामकता और चुलबुलाहट भी है। उन्होनंे उस जमींदारी प्रथा को भी देखा जिसमें बटाईदारी एवं कर्ज के बदले बंधुआ बनाने का रिवाज था। उन्होंने किसान को अपनी तकरीबन हर रागनी में कहीं न कहीं जोड़ा है। फौज में रहकर उन्होंने सैकड़ों रागनी व लगभग 10 किस्से लिखे। 9 साल की नौकरी के दौरान वे घर बहुत कम आये। आखिरी बार जब वे छुटटी पर आये तो वापिस जाने से पहले उन्होंने यह रागनी लिखी-
छुट्टी के दिन पूरे हो लिए, फिकर करण लाग्या मन में।
बांध बिस्तरा चाल पड़ा, जब बाकी के रहगी तन में।।
आज जरूरत है उन द्वारा लिखे गये किस्सों, रागनियों को इक्टठा करने की। लक्ष्मण साहित्य प्रकाशन, रोहतक ने मेहर सिंह के बारे के एक किताब छापी है। इसके लेखक रघुबीर सिंह मथाना व रामफल चहल ने कुछ किस्से व रागनियों को छाप कर इस दिशा में एक सार्थक प्रयास किया है।