Thursday, July 9, 2026

मेहर सिंह

फौजी मेहर सिंह ने समाज में फैली हर बुराई को अपनी रागनियों के माध्यम से उठाया 

सोनीपत जिले के बरोणा गांव में जन्म फौजी मेहर सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उन्हें हरियाणा का बच्चा-बच्चा जानता है। सुप्रसिद्ध स्वतंत्राता सेनानी और लोक-कवि मेहर सिंह जो ‘‘फौजी’’  मेहर सिंह के नाम से विख्यात हुए। उनका जन्म एक आर्य समाजी परिवार में हुआ था।  सुरीली आवाज मानों उन्हें तोहफे में मिली थी। बचपन में उन्होंने डांगर-ढोर चराये हैं। वे पेड़ों की टहनियों पर बैठकर रागनी गाते थे। घर में रागनी गाने पर सख्त पाबन्दी थी। आर्यसमाजी पिता नन्द राम का मानना था कि रागनी जाटों का काम नहीं है। उन्होंने किसानी परिवार में पैदा होकर किसानी जीवन जीया था। किसान के दुर्ख-दर्द को नज़दीक से देखा और अनुभव किया था। ठिठुरती सदी या चिलचिलाती धूप में अनथक परिश्रम करने वाले इस बेचारे की जिन्दगी का चित्राण एक रागनी में इस प्रकार किया है-
 देख रोंगटे खड़े होग्ये या मेरी छाती धड़कै।
 गरीब किसान की ज़िन्दगी क्युकर बीतै सै मर-पड़कै। 

 उसके रागनी प्रेम से तंग आ कर उनके पिता ने मेहर सिंह की शादी की दी। यही नहीं उनकी इच्छा के विरूद्ध 1936 में उन्हें बरेली में जाट रेजीमेंट में भर्ती करवा दिया। गांव से दूर फौज में जाकर मेहर सिंह ने अनेक किस्से लिखेे। फौज में डन्हें अब पिता की मार का भी डर नहीं था। भर्ती होने के बाद उन्होंने संभवत पहली रागनी लिखी जिसकी दो लाईने दी गयी हैं।-
 देश नगर, घर गाम छुटग्या, कितका गाणा गाया,
 कहै जाट तै डूम हो लिया, बाप मेरा घबराया।

 इसमें स्पष्ट है कि पिता ने रागनी गाने की वजह से उन्हें जबरन फौज में भर्ती करवा दिया। स्व0 फौजी मेहर सिंह ने समाज में फैली हर बुराई को अपनी रागनियों के माध्यम से उठाया। उनकी रागनियों में प्रेम, विरह, सुख-दुख सभी का चित्राण है। उनकी रागनियों ने तीखापन, आक्रामकता और चुलबुलाहट भी है। उन्होनंे उस जमींदारी प्रथा को भी देखा जिसमें बटाईदारी एवं कर्ज के बदले बंधुआ बनाने का रिवाज था। उन्होंने किसान को अपनी तकरीबन हर रागनी में कहीं न कहीं जोड़ा है। फौज में रहकर उन्होंने सैकड़ों रागनी व लगभग 10 किस्से लिखे। 9 साल की नौकरी के दौरान वे घर बहुत कम आये। आखिरी बार जब वे छुटटी पर आये तो वापिस जाने से पहले उन्होंने यह रागनी लिखी-
 छुट्टी के दिन पूरे हो लिए, फिकर करण लाग्या मन में।
 बांध बिस्तरा चाल पड़ा, जब बाकी के रहगी तन में।।
 
आज जरूरत है उन द्वारा लिखे गये किस्सों, रागनियों को इक्टठा करने की। लक्ष्मण साहित्य प्रकाशन, रोहतक ने मेहर सिंह के बारे के एक किताब छापी है। इसके लेखक रघुबीर सिंह मथाना व रामफल चहल ने कुछ किस्से व रागनियों को छाप कर इस दिशा में एक सार्थक प्रयास किया है।

आज 9जुलाई 2026

आज का दिन सबसे दुर्भाग्य पूर्ण दिन है मेरे लिए । पारिवारिक संदर्भ में

Friday, June 12, 2026

खयाल

धमकाया गया, मेरी बात ही नहीं सुनी। मेरे बचपन से लेकर अब तक के सारे गुण गिनवा दिए। सोच ही नहीं पा रहा आखिर ये सब क्यों?

शीतल

आज शीतल गई है जाते हुए मुझे काफी कुछ कहा और रिकॉर्ड किया हुआ मैटर दिखाया, पुरानी बातें मेरी सही फैसले न करने की कही। एक तरह से चेतावनी देकर गई। काफी परेशानी महसूस कर रहा हूं। काफी गुस्से में थी। क्या रास्ता अपनाउं समझ नहीं आ रहा 
13..06..2026

Friday, June 5, 2026

7कविता

[1
 कन्या भ्रूण हत्या समाज का बहुत  घटिया काम बताऊं।।
महिला थोड़ी पुरुष घणे इसका असर आज गिनाऊं।।
1
महिला को दोयम दर्जा दे राख्या म्हारे समाज नै 
हरेक जगां पाछै राखैं भूले बराबरी की आवाज नै 
और भी कई मामले सैं खोल कै सारे पत्ते दिखाऊं।।
2
भाई बाहण कोन्या बराबर भाई की जगां ऊंची सै 
कैहवण नै सैं बराबर पर असल मैं महिला नीची सै 
मानैं दोनों नै बराबर समाज नै मैं क्यूकर समझाऊं।।
3
समान काम कम भुगतान महिला तैं किया जावै 
अवैतनिक श्रम का भी फालतू बोझ दिया जावै 
श्रम बाजार मैं महिला की कैसे हिस्सेदारी बराबर ल्याऊं।।
4
गर्भावस्था के बख्त रणबीर महिला मौत ज्यादा बताई
पुरुष महिला अनुपात मैं महिला की कमी सै आई
बस छोरे के जन्म ऊपर छठ ना छोरी की छठ मनाऊं।।
[2
बढ़ती महंगाई नै आम जनता कै आज साँस चढ़ाई रै।।
नौकरी पेशा वर्ग किसान की मुशीबत और बढ़ाई रै ।।
1
छोटा व्यापारी भी इसके बोझ तलै आज दब लिया
रसोई गैस डीजल के बढ़े दाम नै समाज जकड़ दिया
घर के बजट कै फांसी इन बढ़े दामों नै आज लगाई रै ।।
2
घर चलाना मुश्किल होया तो रसोई खर्च बढ़ता जारया 
पेट भराई नहीं हो पाती करजा जावै यो चढ़ता भारया 
बालकों के कम खाने नै उनकी सेहत कसूती ढाई रै ।।
3
बढ़ती महंगाई नै मुश्किल करी बालकों की पढ़ाई 
स्वास्थ्य की देखभाल भी महंगी कई नै  ज्याण 
गंवाई
संकट कई ढाल के बढ़गे मुश्किल सबकी या गिनाई रै ।।
4
किसान का खेती करना घने घाटे का सौदा यो होग्या 
खेती की लागत बढ़गी एमएसपी किसान नै डबोग्या 
रणबीर की कविता पै भी या महंगाई कसूती छाई रै ।।
[3
आजादी

खतरे मैं आजादी म्हारी जिंदगी बणा मखौल दी।

इसकी खातर भगत सिंह नै जवानी लूटा निरोल दी।

आजादी पावण की खातर असली उठया तूफ़ान था

लाठी गोली बरस रही थी जेलां मैं नहीं उस्सान था

एक तरफ बापू गांधी दूजी तरफ मजदूर किसान था

कल्पना दत्त भगत सिंह नै किया खुल्ला ऐलान था

इंक़लाब जिंदाबाद की उणनै या ऊंची बोल दी ।

सत्तावन की असल बगावत ग़दर का इसे नाम दिया

करया दमन फिरंगी नै उदमी राम रूख पै टांग दिया

सैंतीस दिन रहया जूझता कोये ना मिलने जाण दिया

हंस हंस देग्या कुर्बानी हरियाणे का रख सम्मान दिया

हिन्दू मुस्लिम एकता नै गौरी फ़ौज या खंगोल दी।

भारतवासी अपने दिलां मैं नए नए सपने लेरे थे

नहीं भूख बीमारी रहने की नेता हमें लारे देरे थे

इस उम्मीद पै हजारों भाई गए जेलों के घेरे थे

दवाई पढ़ाई का हक मिलै ये नेक इरादे भतेरे थे

गौरे गए आगे काले रणबीर की छाती छोल दी।

फुट गेरो और राज करो ये नीति वाहे चाल रहे रै

कितै जात कितै धर्म नै ये बना अपनी ढाल रहे रै

आपस मैं लोग लड़ाए लूट की कर रूखाल रहे रै

वैज्ञानिक नजर जिसकी जी नै कर बबाल रहे रै

इक्कीसवीं की बात करैं राही छटी की खोल दी।

2003.2004
[4
*हरियाणे के वीरो जागो*

*हरियाणे के वीरो जागो तजो जात के बाणे नै।*
*ढेरयां आला कुड़ता  सै समझो इसके ताणे नै।*
1
गरीब माणस नै मरज्याणी गरीब भाई तैं दूर करै
अमीर होज्यां एक थाली मैं यो गरीब मजबूर फिरै
*अमीर इस्तेमाल भरपूर करै गरीबाँ नै बहकाणे नै।*
अमीरां का छोरा कोये बेरोजगार जमा ना पाणे का
पुलिस कचहरी सब उनके ख़ाली हुक्म ना जाणे का
*गरीब लूट कै खाणे का टोहया सै राह मरज्याने नै।*
मेहनत जात गरीबाँ की और कोये तो जात नहीं
जाट ब्राह्मण सिर फुड़वावें मिलै खान नै भात नहीं
*जात मिटा सकै दुभांत नहीं बात कही सै स्याणे नै।*
जात के ठेकेदारां की बांदी या करै इनकी ताबेदारी
आम आदमी जकड़ लिया अमीर करै पूरी पहरेदारी
*रणबीर करै नहीं चाटूकारी नहीं बेचै अपणे गाणे नै।*
[5
*नोएडा और गुड़गामा*
*आज के कारपोरेट की असलियत बताणी चाही।*
*युवा और युवतियों की या मजबूरी दिखाणी चाही।*
1
मियाँ बीबी ये दोनों मिलकै आज खूब कमावैं देखो
तीस लाख का पैकेज ये साल का दोनों पावैं देखो
तड़कै आठ बजे त्यार हो नौकरियां पर जावें देखो
रात के ग्यारह बजे ये वापिस घर नैं आवैं देखो
*इन कमेरयां की आज या पूरी कथा सुणानी चाही।*
आज के कारपोरेट की असलियत बताणी चाही।
2
अपने पारिवारिक रिश्ते बताओ कैसे चलावैं रै
ऐकले रैह रैह कै शहरां मैं ये कैरियर बनावैं रै
भीड़ मैं रैह कै भी अपने नै कतिअकेला पावैं रै
गांम गेल्याँ अपना रिश्ता बताओ कैसे निभावैं रै
*आज के दौर की या विरोधाभाष दिखाणी चाही।*
आज के कारपोरेट की असलियत बताणी चाही।
3
मोटे वेतन की नौकरी छोड नहीं पावैं देखो भाई
अपने बालकां नै घरां छोड़ कै नै जावैं देखो भाई
फुल टाइम की मेड एजेंसी तैं ये ल्यावैं देखो भाई
उसके धोरै बालक ये अपने पलवावैं देखो भाई
*मजबूरी या लाइफ आज इणनै अपनाणी चाही।*
आज के कारपोरेट की असलियत बताणी चाही।
4
मात पिता दूर रहवैं टाइम काढ़ नहीं पाते भाई
दादा दादी नाना नानी इनके बन्द हुए खाते भाई
घर मैं आवैं इस्तै पहले बालक तो सो जाते भाई
नॉएडा गुड़गामा का रणबीर यो हाल सुनाते भाई
*बदल गया जमाना हरयाणा ली अंगड़ाई चाही।*
आज के कारपोरेट की असलियत बताणी चाही।
[6
आजादी
देश पै खतरा मंडरावै लडां आजादी बचाने की लड़ाई।।
इसकी खातर ज्यान झोंकी हक म्हारा आजादी बताई।।
1
पूरे देश मैं फैल रहया खतरा यो मनुवाद का बताया 
चलता आवै खतरा देश मैं इबै सामंतवाद का बताया 
बढ़ता जावै सै शिकंजा  आज पूंजीवाद का बताया 
इन सब तैं बड्डा खतरा गया साम्राज्यवाद का बताया
संविधान नै पूरा खतरा आजादी इन खतरों तैं चाही।।
इसकी खातर ज्यान झोंकी हक म्हारा आजादी बताई।।
2
एक खतरा और बताया सै यो हिंदुत्ववाद का सुनियो
दूजा खतरा और छाया सै  तालिबानवाद का सुनियो
तीजा खतरा और दिखाया सै यो संघवाद का सुनियो
चौथा खतरा समझाया सै यो आतंकवाद का सुनियो
इन खतरयां तैं मिलकै या आजादी की आवाज लगाई।।
इसकी खातर ज्यान झोंकी हक म्हारा आजादी बताई।।
3
पितृ सत्ता बड़ी बीमारी इसतैं भी आजादी चाहिए सै
भ्रूण हत्या उधम मचारी इसतैं भी आजादी चाहिये सै
दहेज का उत्पीड़न भारी इसतैं भी आजादी चाहिए सै
बेरोजगारी बढ़ती जारी इसतैं भी आजादी चाहिए सै
आर्थिक संकट बढ़ता जावै इसकी बात गई छिपाई।।
इसकी खातर ज्यान झोंकी हक म्हारा आजादी बताई।।
4
हिदू राष्ट्र तैं आजादी हो यो सबका ही भाई चारा हो
इस्लामी राष्ट्र तैं आजादी हो पूरी दुनिया का नारा हो
जातपात से आजादी हो चाहवै अम्बेडकर म्हारा हो
अभिव्यक्ति की आजादी हो सबनै संविधान प्यारा हो
रणबीर बनती जावै सै नबै दस की पालेबन्दी भाई।।
इसकी खातर ज्यान झोंकी हक म्हारा आजादी बताई।।
[7
 अन्ध विश्वास का हमला सालो साल यो बढ़ता जावै ॥
कुम्म के मेले का खेल देखो हमने या बात सै समझावै ।।
1
एक सौ बयालीस साल पहले ठारा सौ बियासी मैं मनाया 
बीस हजार का कुल खर्चा यो आठ लाख आने आल्याँ पै बताया
महा कुम्म दो हजार पच्चीस का खर्च साढ़े सात हजार करोड़ आवै।।
2
ठारा सौ ब्यासी मैं कुंभ मैं कुल आठ लाख लोग नहाये कहते
 ठारा सौ चौरानवै मैं कुंभ मैं दस लाख लोग बताये कहते 
दो हजार पच्चीस मैं कुंभ मैं या चालीस करोड जनता नहावै ।। 
3
इन चालीस करोड़‌ लोगों का कितना खर्चा और आवैगा 
किराया भाड़ा रोटी राटी का खर्चा कितना और वो ठावैगा 
इतना बेजोड धन देश का जनता इस कुंभ के म्हां  गँवावै ।। 
4
इस सारी आवा जायी मैं जनता और भी कई दुख ठावै बताई 
इस सार धन तैं पूरी होज्या कईयों की पढाई और दवाई 
रणबीर सोच सोच कैभी ना बात पूरी इसपै लिख पावै।।