Sunday, November 24, 2019

NAITIKTA


मनुष्य एक सामाजिक जीव है। यह एक सर्व मान्य सच्चाई है। अपने जीवन के सामाजिक उत्पादन में मनुष्य ऐसे निश्चित सम्बन्धों में बन्धते हैं , जो एक प्रकार से जरुरी होते हैं और उनकी इच्छा से स्वतन्त्र होते हैं। उत्पादन के ये सम्बन्ध उत्पादन की भौतिक शक्तियों के विकास की एक निश्चित मंजिल के अनुरुप होते हैं। इन उत्पादन सम्बन्धों के पूर्ण योग को ही समाज के आर्थिक ढांचे की संज्ञा दी जाती है। यह आर्थिक ढांचा ही है जिस पर कानून और राजनीति का उपरी ढांचा अपना जामा पहनता है।ं इसके अनुकूल ही सामाजिक चेतना के निश्चित रुप होते हैं।
भौतिक जीवन की उत्पादन प्रणाली जीवन की आम सामाजिक , राजनीतिक और भौद्धिक प्रक्रिया को निर्धारित करती है। मनुष्यों की चेतना उनके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती, बल्कि उनका सामाजिक अस्तित्व ही उनकी चेतना को निर्धारित करता है।

सामाजिक उत्पादन प्रणाली विकास की एक खास मंजिल पर पहुंच कर उन सम्पति सम्बन्धों से टकराती है जिनके अर्न्तगत वह उस समय तक काम करती होती है। मुर्गी का बच्चा अन्ततः अन्डे के खोल को , जिसने उसे पलने बढ़ने में मदद की  तोड़ कर ही जीवन का विकास करता है। ये सम्पति सम्बन्ध उत्पादन प्रणाली के अनुरुप न रह कर उसके लिए बेड़ियां बन जाते हैं। उस वक्त सामाजिक क्रान्ति का युग शुरु होता है।
        आर्थिक बुनियाद के अन्दर बिना मूल भूत परिवर्तन किये समाज का आगे का विकास सम्भव नहीं रहता। इस मूल भूत बदलाव को ही समाज परिवर्तन कहा जा सकता है। इसके हिसाब से ही समाज की मान्यतांएं, कायदे कानून , रीति रिवाज भी बदलते हैं। परन्तु यह सब इतना सीधी रेखा में नहीं होता । यह काफी जटिल प्रक्रिया है। ऐसे बदलाव पर विचार करते समय एक भेद हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि कोई भी समाज व्यवस्था तब तक खत्म नहीं होती जब तक उसके अन्दर तमाम उत्पादन शक्तियां ;  जिनके लिए उसमें जगह है द्ध विकसित नहीं हो जाती और नये उच्चतर उत्पादन सम्बन्धों का आविर्भाव तब तक नहीं होता जब तककि उनके अस्तित्व की भौतिक परिस्थितियां पुराने समाज के गर्भ में ही पुष्ट नहीं हो चुकती।

जीवन चेतना द्वारा निर्धारित नहीं होता अपितु चेतना जीवन द्वारा निर्धारित होती है। अर्थात मनुष्य अपने भौतिक उत्पादन तथा अपने भौतिक संसर्ग का विकास करते हुए अपने इस वास्तविक अस्तित्व के साथ अपने चिन्तन के परिणामों का विकास करते हैं और बदलते भी हैं।

यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि जहां आर्थिक परिस्थिति बुनियाद है वहीं पर उपरी ढांचे के विविध तत्व -वर्ग संघर्ष के बाद संस्थापित राज्य प्रणाली , उसके परिणाम , धार्मिक मत और पद्धतियों रुप में उनका विकास ऐतिहासिक संघर्ष के प्रकरण पर अपना प्रभाव डालते हैं। बहुत जगह तो संघर्ष के रुप के निर्धारण में इनका ही पलड़ा भारी रहता है । यह अलग बात है कि आर्थिक गति अन्ततः अनिवार्य गति केरुप में प्रगट होती है। इस प्रकार सामाजिक उत्पादन प्रणाली तथा उसके उत्पादन पर स्वामित्व में दो तरफा संघर्ष चलता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि राजनीति ,न्याय, दर्शन, धर्म,साहित्य , कला आदि का विकास ‘आर्थिक विकास’ पर आश्रित होता है। परन्तु ये सब आपस में एक दूसरे को और ‘आर्थिक आधार’ को भी प्रभवित करते हैं।




Wednesday, July 24, 2019

आखिर कब तक ?

आज के दौर में बुद्धिजीवियों कीहत्याउन्हें डराने-धमकाने   और प्रैस को पूरी तरह से पालतू पने  में तब्दील करने का
रावना संगठित सिलसिला तो शुरू पहले हो ही गया था  बीफ़ और गोरक्षा के नाम पर मुसलमानों को डराने का  लव जिहाद केनाम पर मुसलमानों से संपर्क रखने वाले तमाम लोगों को धमकाने का काम भी पुरज़ोर चलने लगा और चल ही रहा है आखिर कब तक ? 
अरुण माहेश्वरी 

किसी भी सामाजिक-राजनीतिक परिघटना के पीछे कोई एक कारण नहीं होता है  यह जीवन के अनेक कारणों के समुच्चय का परिणाम होता है  इसे कहते है - कारणों का नानात्व  (Multiplicity of causality)

2014 में मोदी के उत्थान के पीछे एककारण नहीं था  वे मनमोहन सिंह केअतिरिक्त मौन व्यक्तित्व की तुलना मेंअतिरिक्त वाचाल थे  यूपीए-2 के काल मेंआम लोगों के बीच भ्रष्टाचार को लेकर कईकारणों से एक अलग प्रकार की बेचैनी पैदाहो गई थी  अन्ना हज़ारेअरविंद केजरीवालकी तब दिल्ली में धूम मची थी  लेकिनलाभ मिला मोदी को  

इसके अतिरिक्तगुजरात के जनसंहारों केबाद भी वहाँ सत्ता पर ने रहने के कारणलोगों को लगा कि यह आदमी कठिन समयमें भी अर्थ-व्यवस्था की बागडोर थाम सकताहै  गुजरात में पूँजीपतियों के सामूहिकप्रदर्शनों ने इसमें एक बड़ी भूमिका अदा की 

इनके अलावा जादू की छड़ी से देश काकायाकल्प कर देने का मोदी का ताबड़तोड़प्रचार भी एक नये स्तर का था  2014 मेंमोदी ने शासक कांग्रेस दल से दुगुना सेज़्यादा रुपये बहाये थे  

मोदी की भारी जीत के बाद कईउदारवादियों ने भी जनतांत्रिक नैतिकता केनाम पर इस उम्मीद में मोदी को मौक़ा देनेकी दलीलें शुरू कर दी थी कि सरकारचलाने की जिम्मेदारी इस ख़तरनाक प्राणीको भ्यता सिखा देगी। 

और देखते-देखते मोदी केंद्र के अलावा अन्यराज्यों में भी छा गये  वे भारतीय जनतंत्रकी राजनीति की एक ख़ास परिघटना बनगये  

लेकिन सच कहा जाए तो यह कहानीबमुश्किल दो साल चलीऔर इसी बीच साफ़ देने लगा था कि हर चीज़ की अपनीख़ास तात्विकता होती है  बबूल का बीजबदले हुए मौसम मेंकितने ही आनुवंशिकबदलावों से क्यों  गुज़रेशुद्ध रसीले मीठेआमों का पेड़ पैदा नहीं कर सकता है  

मोदी के आने के साथ ही बुद्धिजीवियों कीहत्याउन्हें डराने-धमकाने और प्रैस को पूरीतरह से पालतू कुत्ते में तब्दील करने कारावना संगठित सिलसिला तो शुरू हो हीगया था  बीफ़ और गोरक्षा के नाम परमुसलमानों को डराने का  लव जिहाद केनाम पर मुसलमानों से संपर्क रखने वालेतमाम लोगों को धमकाने का काम भीपुरज़ोर चलने लगा  

और तभीजनता पर मोदी के मूलभूत संघीफ़ासिस्ट विचारों कागुजरात के जनसंहारवाले हत्यारे अभियान का प्रभाव सबसेप्रकट रूप में पहली बार 8 नवंबर 2016 केदिन सामने आया जब मोदी ने तालियाँबजाते हुए नोटबंदी की घोषणा करके देभर में पूरी जनता को बदहवास होकर बैंकोंके सामने लाइनों में ड़ा होनेअसहाय दशामें रोने-कलपने के लिये उतार दिया  पूरे दोमहीने तक मोदी टेलिविज़न के पर्दे पर रोते-बिलखते लोगोंस्त्रियोंवृद्धजनोंकिसानों,मज़दूरों के दुखों पर पूरी अश्लीलता के साथनाचते रहे  

वह एक अजीब सा समय था  हर रोताहुआ आदमी अन्यों के रूदन को देख करखुद को दिलासा दे रहा था   अंदर हीअंदर शायद इस कल्पना से ख़ुश भी था किउसकी तरह ही सारे काला धन वाले भीअपने भाग्य पर रो रहे होंगे ! विपत्ति के कालके एक समताकारी प्रभाव की ख़ुशफ़हमी मेंलोग उस महा ठगी के झटके को झेल गये  

और कहना  होगाउसी जन-उद्वेलन कीपरिस्थिति में मोदी ने उत्तर प्रदेश में भी भारीजीत हासिल  लीं  

मोदी को खुद को